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संपादकीय (Editorial)

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, लक्षण व उनका प्रबंधन

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, लक्षण व उनका प्रबंधन

कमी के लक्षण व प्रबंधन

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, लक्षण व उनका प्रबंधन – जिंक : जस्ते की कमी सामान्य रूप से नई व पुरानी सभी पत्तियों में दिखाई देती है। क्लोरेटिक भागों में पत्तियाँ मर जाती है। जि़ंक की कमी के कारण दानें पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते, पौधे बौने रह जाते हैं तथा बीज भराव भी पूर्ण रूप से नहीं होता। जि़ंक की कमी को दूर करने के लिए जि़ंक सल्फ़ेट का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी में 25 किग्रा प्रति हे. की दर से जस्ता फसल की बिजाई के समय डालना चाहिए। यदि फसल में कमी के लक्षण दिखाई दें तो 0.5% जि़ंक का घोल बनाकर यूरिया के साथ छिड़काव करना चाहिए। यह छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर 2-3 बार करना चाहिए।

लोहा : यह पौधे में प्रकाश संलेषण व श्वसन के लिए महत्वपूर्ण है। लोहे की कमी के कारण नई व छोटी पत्तियों पर पीलापन व अनियमित आकार के पीले धब्बे विकसित हो जाते हैं। लोहे की कमी क्लोरोफिल, पौधे की वृद्धि व अनाज उत्पादन कम कर देती है। फेरस सल्फ़ेट ( 19% लोहा) व आइरन चीलेट (12% लोहा ) का प्रयोग मिट्टी व पौधों दोनों में किया जा सकता है। फेरस सल्फेट का प्रयोग प्रमुख रूप से पत्तियों पर छिड़काव करने के लिए ही करना चाहिए। अम्लीय मृदा में आइरन फ्रिट्स (22% लोहा ) व चावल की नर्सरी में 1-2त्न फेरस सल्फ़ेट का छिड़काव 5-7 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।

तांबा : तांबे की कमी के कारण रुका हुआ विकास, विलंबित परिपक्वता, बीज भराव में कमी, भूरे रंग का मलिनीकरण तथा नई पत्तियों में पीलापन हो जाता है। इसकी आवश्यकता क्लोरोफिल उत्पादन, श्वसन और प्रोटीन संश्लेषण के लिए होती है। तांबे की कमी कों पूरा करने के लिए मुख्य रूप से कॉपर सल्फ़ेट (24% तांबा) का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग मिट्टी व पौधों पर छिड़काव दोनों के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा कॉपर चीलेट का प्रयोग भी किया जा सकता है। कॉपर सल्फ़ेट को मृदा में डालना इसके पत्तियों पर छिड़काव से अधिक लाभकारी है।

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मैंगनीज : इसकी कमी के कारण गेहूँ में सफ़ेद लकीर व जौ में ब्राउन स्पॉट हो जाते हैं । मैंगनीज़ की कमी का एक सामान्य लक्षण नई पत्तियों में शिराओं के बीच का पीलापन भी है। इसकी कमी को पूरा करने के लिए सबसे अधिक उर्वरक मैंगनीज़ सल्फ़ेट (25% मैंगनीज ) है। इसके अतिरिक्त मैंगनीज चीलेट (12% मैंगनीज़) तथा मैंगनीज़फ्रिट्स (10-25% मैंगनीज ) का प्रयोग भी किया जा सकता है। पत्तियों पर छिड़काव के लिए 0.05-0.1त्न घोल का 3-4 बार प्रयोग करना चाहिए।

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मॉलिब्डेनम : यह पौधों में नत्रजन की गतिविधि के लिए आवश्यक है। इसकी कमी के कारण पौधों के विकास में रुकावट, पत्तियाँ मोटी या भंगुर तथा पीलापन जैसे लक्षण पाए जाते हैं। खाद्य फसलों के अलावा मोलिब्डेनम की कमी सब्जियों, दलहनी व तिलहनी फसलों में भी पाई जाती है। इसकी कमी को दूर करने के लिए अमोनियम मॉलिब्डेट, सोडियम मॉलिब्डेट ट्राईऑक्साइड का प्रयोग करना चाहिए । इनका प्रयोग मिट्टी व पत्तियों पर छिड़काव दोनों के लिए किया जा सकता है।

बोरान : बोरान की कमी के कारण पौधों में अंतिम कली और नई पत्तियों में पीलापन आ जाता है। इसके अलावा पत्ते गहरे भूरे, सफ़ेद पीले धब्बे व गलन हो जाती है। इसकी कमी को पूरा करने के लिए बोरेक्स का प्रयोग करना चाहिए। इसमें 11% बोरान होती है। रेतीली मिट्टी में बोरोसिलिकेट के 0.2त्न घोल का प्रयोग करना चाहिए।