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अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस

  • डॉ. एम. के. भार्गव, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख
  • डॉ. पुष्पेंद्र सिंह, वैज्ञानिक, रा.वि.सिं.कृ.वि.वि.-कृषि विज्ञान केन्द्र शिवपुरी (मप्र)
    डॉ. कीर्ति गुप्ता, वरिष्ठ अध्यापक एवं परियोजना अनवेशक (जैवविविधता), शा. मॉडल उ. मा. विद्यालय शिवपुरी (मप्र)

25  मई 2021, भोपाल ।  जैव विविधता और कृषि – सभी जीवों पर दया तथा प्रकृति के साथ तारतम्य स्थापित करने की अवधारणा भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अंग रही है। जैवविविधता के परिप्रेक्ष्य में वैदिक काल में सोच बहुत व्यापक, सहिष्णुतापूर्ण और भावनात्मक थी। वह सभी जीव-जंतुओं के कल्याण की कामना करते थे। परवर्तीकाल में जैवविविधता को संरक्षित और संवर्धित करने की प्रक्रिया में परिष्कार आया तथा विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को धर्म से जोड़कर विभिन्न देवी-देवताओं को इनसे अंतसंबंधित कर दिया गया। स्मृतिकाल में बड़े-बड़े उद्यान लागये जाने की प्रथा आरंभ हुई। वृक्षारोपण और जीव-जंतुओं को पानी पीने के लिए तालाब और जलाशय बनवाना धार्मिक पुण्य का कार्य माना जाता था।

जैव विविधता के लिए जैविक उद्यान

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में जैवविविधता के संरक्षण के लिए खेती के लिए अनुपयोगी जमीन में जैविक उद्यान बनाए जाने का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार दो कोस परिमाण में मृगवन बनवाने का विधान है। इसमें स्वादिष्ट फल, लता, गुल्म एवं वृक्ष हो। पीपल, गूलर, पाकड़, आम और बरगद यह पंच पल्लव के रूप से जाने जाते हैं। भौगोलिक दृष्टिकोण से भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति जैवविविधता संपन्न क्षेत्र में आती है। समशीतोष्णीय जलवायु होने के कारण इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में जैविक विविधता पायी जाती है। हिमालय पर्वत को विश्व का सर्वाधिक जैवविविधता वाला क्षेत्र माना जाता है। कृषि योग्य अनेक फसलों को उद्गम इसी क्षेत्र में हुआ है, इसके अलावा अनेक जड़ी-बूटियों का विशाल भंडार हिमालय में विद्यमान रहा है। वास्तव में प्रारंभ में विभिन्न फसलों का उद्गम पृथ्वी के कुछ निश्चित क्षेत्रों में हुआ था। इन क्षेत्रों को उद्गम केन्द्र कहे हैं। उद्गम केन्द्रों की अवधारण सर्वप्रथम रूसी वैज्ञानिक बेवीलोव ने की थी। इनके अनुसार विश्व में निम्नलिखित 8 मुख्य उद्गम केन्द्र हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत कृषि जन्य फसलों के उद्गम का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। हिमालय से कन्याकुमारी तथा हिन्दुकुश से कामरूप तक विस्तृत इस महाद्वीप में जैव विविधता का प्रचुर भण्डार रहा है।

जैव विविधता संरक्षण एवं पर्यावरणीय प्रबंध

जैव विविधता संरक्षण एवं पर्यावरणीय प्रबंध एक-दूसरे के पर्यायवाची समझे जा सकते हैं ”वसुधैव कुटम्बकम् की भावना एवं जियो और जीने दो” के सिद्वांत की अनुकरणीय पहल के साथ विकास की गति को बढाना होगा। एक तरफा दबाव, हमेशा हानिकारक होता है । वर्तमान युग में मनुष्य ने प्रकृति से दूर जा रहा है, आधुनिकता और शहरीकरण के अंधानुकरण के दवाब में हमने खुद को प्रकृति से दूर कर दिया है विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ का खेल खतरनाक स्तर पर पहुँच गया पेड़ों की जगह गगन चुंबी इमारतों ने ले ली। हाइवे और फलाइओवर के चक्कर में हजारों पेड़ काटे गये। हमने नीम, पीपल और बरगद के पेड़ हटाकर फैशनेबल पेड लगाने आरंभ कर दिये बगैर यह सोचे कि इसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। हम आधुनिकता की दौड़ में इस कदर शामिल हो गए कि अपने भारतीय मूल्यों को भूलते चले गए हमारे पेड़ों और प्रकृति से प्राचीनकाल से एक अनुराग रहा है, हमारे समाज में प्रकृति को भगवान मानकर पूजने की परंपरा रही है। हमारे पौराणिक गं्रथो में पौधों और वृक्षों को लेकर कई मान्यताएँ रही है। पीपल, बड और तुलसी को हमारे धर्म में आदिकाल से पूजा जा रहा है।

हर त्यौहार प्रकृति से जुड़ा

हिंदु धर्म में हर त्यौहार प्रकृति से जुड़ा हुआ जैसे आज भी नागपंचमी के दिन बेरिया और वाहमी की पूजा की जाती है नाग देवता को दूध अर्पित किया जाता है श्रावण के महीने में राखी के त्योहार के अगले दिन गेहूँ के भुजरिया की पूजा की जाती है फिर आपस में वितरित कर प्रेम एवं सद्भाव की कामना की जाती है इसी तरह हर छठ के दिन होलिया, मक्का, चना, बाजरा, ज्वार आदि की पूजा की जाती है आंवलिया ग्यारस के दिन आंवले और बढ़पूजनी अमावस के दिन बट (बरगद) की पूजा की जाती है देवउठनी एकादशी के दिन गन्ने की पूजा एवं उस ऋतु के सभी फलों को देवताओं को अर्पित करने की परंपरा रही है। हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म में भी वृ़क्षों की पूजा की एक पंरपरा रही है, बुद्व और तीर्थकर के नाम के साथ एक पवित्र वृक्ष भी जुड़ा हुआ है, जिसे बोधि वृ़क्ष कहते हैं। यदि हम पौधों के अतिरिक्त जंतुओं की बात करें तो वो भी किसी न किसी भगवान का प्रतीक हैं जैसे चूहा गणेश जी का प्रतीक, मोर भगवान कार्तिकेय का तथा वीणावादिनी सरस्वती देवी का प्रतीक हंस है, इसके अतिरिक्त जैन धर्म में भी 24 तीर्थकर में से 17 तीर्थकर का चिन्ह जंतु ही है।

इस वर्ष की थीम

इस वर्ष की थीम अनुसार हम ही जैवविविधता के संरक्षण के लिए हल ढूंढ सकते हंै सबसे पहले प्रदूषण को रोकने के लिए हमारी गतिविधियों को कम करना होगा, प्रदूषण के कारण कई जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही है ण्कुछ वर्ष पूर्व हमारे आँगन में चहचहाती गौरैया जो झुंड में आती थी उसकी मधुर आवाज आज हमे इस भीड़ में कम सुनाई देती है ए रंगबिरंगी तितलियाँ जिन्हें हम बचपन में देख-देखकर बड़ा खुश होते थे और पकडऩे की कोशिश करते थे उसकी कई प्रजातियाँ प्रदूषण के कारण विलुप्त हो गई है। आज के युग में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधन न केवल हमारे लिए आवश्यक है, बल्कि अन्य प्रजातियों के अस्तित्व के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार हमें केवल उतना ही उपयोग करना चाहिए जितनी हमें आवश्यकता है ताकि ये भविष्य में उपयोग के लिए प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहे। प्रकृति में प्रत्येक जीव दूसरे जीव से जुड़ा है उस पर निर्भर है, इस कड़ी में यदि एक जीव किसी कारणवश विलुप्त हो जाता है तो दूसरा जीव स्वत: ही नष्ट होने लगता है, इस प्रकार प्रकृति का प्रत्येक जीव महत्वपूर्ण है इसलिए कहा है – जीवों जीवस्थ जीवनम्, इस तरह हमें प्रकृति में प्रत्येक जीव की जाति को इस धरती से विलुप्त होने से बचाना होगा।

फसलों के उद्गम केन्द्र

उद्गम केन्द्र          फसलें- 

चीन- सोयाबीन, मूली, बै्रसिका, नाशपाती, आडू, संतरा आदि।
हिन्दुस्तान– धान, अरहर, चना, लोबिया, मंूग, बैगन, भारतीय मूली, गन्ना, कपास (गोसीपियम आर्बोरियम) मिर्च, आम, नारियल, केला, हल्दी, आदि)
मध्य एशिया- गेहूं, सेम, अलसी, तिल, कुसुम, कपास, या अफगानिस्तान गाजर, खरबूज, प्याज, लहसुन, पालक, पिस्ता, अंगूर, सेब, बादाम आदि।
भूमध्य सागरीय– गेहूं, जई, जौ, मटर, मसूर, गोभी आदि।
एबीसिनि-यां ज्वार, बाजरा, अरंड, काफी, जौ, गेहूं, खेसारी, भिंडी
फारस- लूर्सन, गाजर, पत्तागोभी, सलाद, अंजीर, अनार,
मध्य अमेरिका– मक्का, राजमा, खीरा, शकरकंद, पपीता, अमरूद ।
दक्षिणी अमेरिका– आलू, मंूगफली, अनन्नास, तम्बाकू, टमाटर, रबर, कुनैन, कसावा आदि।

स्त्रोत: प्राचीन भारत में कृषि ज्ञान- डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय एवं अन्य, भा.कृ.अनु.प. कृषि सूचना एवं प्रकाशन निदेशालय नई दिल्ली प्रकाशन पृष्ठ संख्या 50

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