लाभकारी और किफायती – हरी खाद

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लाभकारी और किफायती – हरी खाद

लाभकारी और किफायती – हरी खाद – हरी खाद का उपयोग भूमि तथा पौधों दोनों के लिये अत्यंत लाभकारी और उर्वरकों के मद में पैसा बचाकर खेती को लाभकारी बनाने का सबसे सस्ता, सुलभ एवं सरल तरीका है। पौधों के हरे भाग को खेत में मिलाना और जीवांश की आपूर्ति करना तथा प्राकृतिक खाद तैयार करना इसकी परिभाषा हो सकती है। उल्लेखनीय है कि भूमि की उर्वराशक्ति विविध प्रकार के जीवाणुओं की क्रियाशीलता पर निर्भर रहती है और हरी खाद का उपयोग इसकी सशक्त विधि हो सकती है। वास्तव में मिट्टी एक जीवित तंत्र है क्योंकि उसमें हजारों लाखों जीवाणु पनपते रहते है ।

इन जीवाणु के लिये कार्बनिक पदार्थ अच्छा भोजन है। जब भी मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की कमी होगी इन जीवाणुओं के जीवन एक क्रियाशीलता पर विपरीत असर पड़ेगा एक अनुसंधान के परिणाम से बात सामने आई है कि एक हेक्टर हरी खाद के उपयोग से भूमि में लगभग 80 किलो नत्रजन, 18 किलो स्फुर तथा 70 किलो पोटाश भूमि में एकत्रित हो जाता है जिसकी कीमत यदि रसायनिक उर्वरकों के उपयोग से लगाई जाये तो आज की स्थिति में 2000 से कम नहीं होगी।

हरी खाद के रूप में उपयोग के लिये ऐसी फसलों का उपयोग किया जाना चाहिए जो शीघ्रता से ऊग कर बढ़े भी और अधिक से अधिक पत्ते/शाखायें उपलब्ध करा सकें तना भी नरम रहे और विघटन जल्दी हो जाये। इसके लिये सनई सबसे अच्छी मानी गई है ढेंचा, मूंग, उड़द, ग्वार, लोबिया जैसी फसलों का उपयोग भी हरी खाद के रूप में सफलता से किया जा सकता है। ढेंचा की किस्म ‘सिसबेनिया रोस्ट्रेटा’ के परिणाम हरी खाद के रूप में अधिक अच्छे पाये गये हैं। इसके तनों पर ग्रन्थियां होती हैं। तथा तना मुलायम होता हैं जिसका विघटन जल्दी हो जाता है।

हरी खाद की अनेकों फसलों को खेतों की मेढ़ों पर भी लगाकर साल में तीन बार उसकी कटाई करके पर्याप्त मात्रा में हरा पदार्थ मिट्टी को उपलब्ध कराके उसकी दशा में परिवर्तन किया जा सकता है। अनुसंधानों के परिणाम बताते है कि बंजर से बंजर भूमि का भी उद्धार हरी खाद के सतत उपयोग से किया जाकर उसे खेती के लायक बनाया जा सकता है। हरी खाद का उपयोग खरीफ, रबी दोनों फसलों के लिये किया जा सकता है। खरीफ फसलों के लिये हरी खाद की फसल की बुआई पानी के साधनों पर निर्भर रहती है उसके अनुसार अप्रैल, मई माह में हरी खाद की फसल लगाई जा सकती है तथा एक माह बाद उसको भूमि में मिलाकर फसलों के लिये जैविक खाद को उपलब्ध कराया जा सकता है, साथ में रसायनिक उर्वरकों के उपयोग में कटौती करके पैसा बचाया जा सकता है।

ध्यान रहे खेती को लाभकारी बनाने की प्रथम सीढ़ी है उसकी लागत को कम किया जा सके इससे शुरूआत ही अच्छी बचत से हो जाती है तो खेती में हानि का सवाल ही नहीं उठता। सनई या ढेंचा की फसल को केला तथा कपास की बीच की दो कतारों के बीच भी लगाकर उसे एक माह में मोड़ा जाकर अच्छी जीवांश बढ़ाने वाली खाद फसल को उपलब्ध करके उत्पादन तो बढ़ाया जा सकता है साथ ही खेत की भूमि की दशा तथा दिशा दोनों में परिवर्तन लाया जा सकता है।

हरी खाद की उपयोगिता बढ़ाने के लिये 250 किलो रॉक पास्फेट/हेक्टर तथा 5 किलो पीएसबी कल्चर/हे. की दर से डालने से उसका विघटन तथा भूमि में स्थगित स्फुर की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। वर्तमान में दो फसली/तीन फसली फसल चक्र के चलते भूमि में पोषक तत्वों का क्षरण तेजी से हो रहा है जिसको संतुलित करने के लिये हरी खाद का उपयोग एक महत्वपूर्ण एवं सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है।

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