जैव-उर्वरकों एवं जैव-कारकों का धान की उन्नत खेती में उपयोग एवं महत्व

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  • डॉ. आर. पी. अहिरवार , डॉ. विशाल मेश्राम, डॉ. प्रणय भारती
  • डॉ. नीलकमल पन्द्रे, केतकी धूमकेती
    कृषि विज्ञान केंद्र, मंडला

 

13 सितम्बर 2021, जैव-उर्वरकों एवं जैव-कारकों का धान की उन्नत खेती में उपयोग एवं महत्व – जैव-उर्वरक लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं का जीवित मिश्रण है जो कि चारकोल, मिट्टी, गोबर की खाद या लिग्नाइट के चूर्ण में मिश्रित होता है इससे बीज, जड़ों और मिट्टी को उपचार करने पर पौधों को आवश्यक पोषक तत्व आसानी से एवं अधिक मात्रा मिलने लगते हैं और मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता एवं मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

धान की फसल के लिए क्यों जरुरी है जैव उर्वरक?

पोषण जीवन का आधार है जो कि पौधों की वृद्धि के लिये अति आवश्यक है। पोषक तत्वों में नत्रजन का स्थान सर्वोपरि है जो रसायनिक उर्वरकों, खादों तथा जैव उर्वरक द्वारा पौधों को प्राप्त होता है। हरित क्रांति के पश्चात् धान की फसल में अधिक एवं असंतुलित मात्रा में रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग होने से मृदा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा है जिसकी वजह से फसल उत्पादन स्थिर हो गया है, रसायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग ने कार्बनिक कार्बन में कमी, मिट्टी के माइक्रोबियल वनस्पति में कमी, अम्लता और क्षारीयता में वृद्धि और मिट्टी सख्त होने पर मिट्टी को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। इसके अलावा, नाइट्रोजेनस उर्वरक का अत्यधिक उपयोग जल निकायों को दूषित कर रहा है, इस प्रकार जलीय जीवों को प्रभावित करता है और मनुष्यों और जानवरों के स्वास्थ्य के लिए खतरे पैदा करता है। इसको ध्यान में रखते हुए जैव उर्वरकों का उपयोग करना आवश्यक हो गया है क्योंकि इसके प्रयोग से लागत कम आती है उत्पादन में वृद्धि हो जाती है एवं उच्च गुणवत्तायुक्त चावल प्राप्त होता है मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है एवं भूमि, भूजल तथा पर्यावरण प्रदूषित होने से बच जाता है।

एजोस्पिरिलम

एजोस्पाइरिलम नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एक सूक्ष्म जीवाणु यह एक सिंबियोटिक बैक्टीरिया है और धान में उपयोग किए जाने वाला एक महत्वपूर्ण जैव-उर्वरक हैं। यह जैव उर्वरक एजोस्पाइरिलम ब्रैजिलेंस या लिपोफैरम जीवाणु से बनती है। यह जीवाणु मृदा में जड़ों के समीप पाया जाता है। सूक्ष्म जीवाणु भी यह नत्रजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पादप वृद्धिकारक हार्मोंस का स्राव करते हैं जो अंकुरण से लेकर पौधे की वृद्धि तक में लाभकारी होते हैं। एजोस्पाइरिलम के प्रयोग से नत्रजन की पूर्ति के साथ-साथ वृद्धि हार्मोन्स, विटामिन तथा अन्य बहुत से फायदे हंै। जो कि फसलोत्पादन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। तथा नत्रजन की एक तिहाई मांग की पूर्ति करने में सहायक है। एजोस्पाइरिलम की नत्रजन स्थिरीकरण क्षमता 15-38 किलो प्रति हेक्टेयर है माइक्रोएरियोफिलिक (अल्पवायवीय) जीवाणु होने के कारण यह कल्चर जलमग्न खेतों में अन्य जैव उर्वरकों की अपेक्षा सुगमतापूर्वक कार्य करता है। अत: धान व गन्ने जैसी फसलों के लिये यह विशेष रूप से उपयोगी है। एजोस्पाइरिलम का उपयोग करने से 30-35 प्रतिशत तक रसायनिक खाद की बचत करता है साथ में आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करता है। एजोस्पाइरिलम से उपचारित करने पर धान की उपज में औसत 14.7 प्रतिशत वृद्धि हो जाती है। एजोस्पाइरिलम से बीज, पौधे की जड़ और मिट्टी को उपचार करने की सिफारिश की जाती है। एजोस्पाइरिलम कुछ मात्रा में फास्फोरस और सिलिकॉन को भी घुलनशील बनाता है। सिंचाई या वर्षा में देरी होने पर यह सूखे की कमी में मदद करता है।

नील हरित शैवाल

यह एक शैवाल है, जो एक अन्य प्रकार का जैव-उर्वरक है यह अल्गल के रूप में उपयोग किया जाता है। इसकी महत्वपूर्ण प्रजातियां साइनोबैक्टेरिया, अनाबेना, नोस्टोक और टोलिपोथ्रिक्स हैं। बीजीए द्वारा एक मौसम में लगभग 15 किलोग्राम नत्रजन/ हेक्टेयर स्थिर होती है जो पौधों को आसानी से उपलब्ध हो जाती है। बीजीए विटामिन्स और वृद्धि कारकों को विस्तारित करता है जिससे पौधे तेजी से वृद्धि करते हैं। यह कार्बनिक अम्ल निकलता है जो फास्फोरस को घुलनशील बनाने में मदद करता है। यह 20-30 किलो नत्रजन/ हेक्टेयर स्थिर करता है। इसके उपयोग से चावल उत्पादन में 15-20 प्रतिशत वृद्धि हो जाती है।

अजोला

अजोला एक जलिय फर्न है। अनाबेना अजोला यह सिम्बियोसिस प्रक्रिया द्वारा नीले हरे शैवाल की मदद से मिट्टी में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को फिक्स करता है यह नत्रजन पौधों को आसानी से उपलब्ध हो जाती है। अजोला अपने विकास के दौरान पानी में कार्बनिक नत्रजन उत्सर्जित करता है यह सिंचाई के पानी से पोटेशियम को अवशोषित करता है। अत: अजोला नाइट्रोजन, पोटेशियम एवं कार्बनिक कार्बन आदि प्रदान करता है। यह चावल के खेत में खरपतवार वृद्धि को रोकता है। चावल के रोपण से पहले इसे हरी खाद के रूप में लागू किया जा सकता है या चावल के साथ दोहरी फसल के रूप में उगाया जा सकता है। लगभग 10 टन ताजा अजोला प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नत्रजन/हेक्टेयर के बराबर होता है।

स्फुर घोलक जैव उर्वरक

यह फॉस्फो बैक्टीरिया, फॉस्फोरस सोलुब्लाएजिंग बैक्टेरिया (पी.एस.बी.) के नाम से जाना जाता है इसके उपयोग से मृदा में उपस्थित अघुलनशील/ अनुपलब्ध स्फुर को घुलनशील बनाता है जिससे पौधों को आसानी से उपलब्ध हो जाता है। ये जीवाणु हार्मोन्स एवं विटामिन्स भी उपलब्ध कराते हैं। जड़ों में रोग कम लगते हैं तथा तना मजबूत होता है सुपर फॉस्फेट में उपस्थित स्फुर की उपलब्धता में वृद्धि करता है। दहलनी फसलों में गठानें अधिक प्रभावी होती हैं जिससे नत्रजन स्थिरीकरण एवं उपज अधिक प्राप्त होती है तथा प्रति हेक्टर 20-30 किलोग्राम सुपर फास्फेट, स्फुरधारी उर्वरकों की बचत की जा सकती है। पी.एस.बी अन्य जैव उर्वरकों के साथ मिलाकर इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके उपयोग के बाद में बोई गई फसल को भी लाभ मिलता है।

माइकोराइजा

यह एक कवक/फफूंद है जो बाजार में वैम (वेसिकुलर आरवास्कुलर माइकोराइजा) के नाम से मिलता है यह जड़ के साथ सह-सम्बंध स्थापित करके फास्फोरस मोब्लाइजिंग का काम करता है। माइकोराइजा का प्रयोग निचली और ऊपरी जमीन में भी चावल उत्पादन में कर सकते हैं। इस फंगस का उपयोग करने से पौधों की जड़ों का विस्तार होता है तथा फास्फोरस को जोड़ता है। धान नर्सरी में माइकोराइजा इनोक्यूलेशन प्रयास अभी भी भारत के कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा अध्ययन में है।

धान की खेती में जैव-कारकों का उपयोग

ट्राइकोडर्मा : ट्राइकोडर्मा एक कवक (फफूंद) है। धान/चावल की खेती के लिए ट्राइकोडर्मा कल्चर का उपयोग अति आवश्यक है, क्योंकि ये कार्बनिक पदार्थो का विच्छेदन करके एमीनो अम्ल, अमोनिया बनाने की क्षमता रखते हंै और ह्यूमस के निर्माण में भाग लेती है, और शर्करायें एव एल्कोहल उत्पादन के रूप में पैदा होकर पौधों के लिए पोषक तत्वों की प्राप्यता बढ़ाते हैं। यह लगभग सभी प्रकार के कृषि योग्य भूमि में पाया जाता है। मृदा जनित पादप रोगों के नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग किया जाता है। ट्राइकोडर्मा पादप रोग प्रबंधन हेतु बहुत की प्रभावशाली जैविक विधि है। हमारे देश में फसलों को बीमारियों से होने वाले कुल नुकसान का 50 प्रतिशत से भी अधिक मृदा- जनित पादप रोग कारकों से होता हैं, जिसका नियंत्रण अन्य विधियों द्वारा सफलतापूर्वक नहीं हो पा रहा है। इसलिए ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियों से रोगों का नियंत्रण प्रभावशाली रूप से किया जाता हैं इनमें से ट्राइकोडर्मा हरजेनियम एवं ट्राइकोडर्मा विरिडी का प्रयोग होता है। ये मृदा जनित रोग कारकों जैसे राइजोक्टोनिया, स्केलेरोशियम, स्केलेरोटीनिया, मैक्रोफोमिना, पीथियम, फाइटोप्थोरा एवं फ्यूजेरियम आदि का पूर्ण रूपेण अथवा आंशिक रूप से विनाश करके उनके द्वारा होने वाली विभिन्न बीमारियों जैसे बीज सडऩ, आद्र्रगलन, मूल विगलन, अंगमारी एवं म्लानि रोग के नियंत्रण में सहायक सिद्ध हुई है। फसलों में लगने वाले जड़ गलन, उखटा, तना गलन आदि मृदा जनित फफूंद रोगों की रोकथाम के लिए ट्राइकोडर्मा नामक मित्र फफंूद बहुत उपयोगी है।
स्यूडोमोनास : धान की फसल में लगने बाले जीवाणु जनित रोग मुख्य रूप से धान विस्फोट (ब्लास्ट) और शीथ ब्लाइट रोग के नियंत्रण के लिए स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस के कल्चर से बीज, पौध की जड़ या मृदा उपचार अवश्य करें।

जैव-उर्वरकों के उपयोग से लाभ
  • जैव उर्वरकों से फसल उत्पादन में 10-30 प्रतिशत वृद्धि हो जाती है।
  • रसायनिक खादों का 25 प्रतिशत तक प्रयोग में बचत हो जाती है जिससे लागत में कमी आती है।
  • पौधों की वृद्धि, विकास में सहायक है।
  • चमकदार एवं उच्च गुणवत्ता की फसल प्राप्त होती है।
  • मृदा में लाभदायक जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि हो कर मिट्टी की क्रियाशीलता मेंं वृद्धि हो जाती है।
  • मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ जाती है। मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है
  • जैव-उर्वरक मृदा में कार्बनिक अम्ल छोड़ते जिससे मृदा में अनुपलब्ध फास्फोरस पौधों को उपलब्ध होने लगता है।
  • जैव-उर्वरक रसायनिक खादों की तुलना में बहुत सस्ता है जिसे छोटे व गरीब किसान भी उपयोग कर सकते हंै।
  • रसायनिक खादों की जगह जैव-उर्वरकों का प्रयोग करने से भूमि, भूजल एवं वातावरण प्रदूषित होने से बच जाता है जिससे मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
जैव-उर्वरकों उपयोग के समय सावधानियां
  • हमेशा ताजे कल्चर का प्रयोग करें।
  • हमेशा बीजोपचार छाया में करें।
  • जैव उर्वरक को सीधे धूप एवं गर्मी वाले स्थान से बचाकर रखें।
  • धान के लिये एजेटोबैक्टर या एजोस्पाइरिलम या फिर दोनों की आधी-आधी मात्रा का प्रयोग मिलाकर करें।
  • जैव उर्वरकों को किसी भी कीटनाशक अथवा रसायन या उर्वरकों के साथ सीधे मिलाकर प्रयोग न करें।
  • जैव उर्वरकों तथा रसायनिक उर्वरकों को अलग-अलग एवं समुचित मात्रा में ही प्रयोग करें।
  • जैव उर्वरक को रसायनिक खाद तथा अन्य कीट फफूंदनाशक दवाओं के सीधे संपर्क में न आने दें।
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