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फसल की खेती (Crop Cultivation)

आया गर्मियों की मूंग लगाने का समय

दलहनी फसलों में मूंग एक महत्वपूर्ण फसल है। पौष्टिक गुणवत्ता के कारण इसे अधिक पसंद किया जाता है। मूंग में प्रोटीन बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज तत्व एवं विटामिन्स भी होते हैं कम समय में ही पकने के कारण इसे बहुफसलीय चक्र में आसानी से सम्मिलित किया जा सकता है। मूंग की फसल से फलियों की तुड़ाई के बाद खेत में मिट्टी पलटने वाले हल से फसल को पलटकर मिट्टी में दबा देने से यह हरी खाद का काम करती है। मंूग की खेती करने से मृदा में उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है। मूंग को खरीफ, रबी एवं जायद तीनों मौसम में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर जायद/ ग्रीष्मकाल में मूंग की खेती सफलतापूर्वक लाभकारी हो सकती है।

भूमि की तैयारी:

दो या तीन बार हल या बखर से जुताई कर खेत अच्छी तरह तैयार करना चाहिए तथा पाटा चलाकर खेत को समतल बना लेना चाहिये। दीमक से बचाव हेतु क्लोरोपायरीफॉस चूर्ण 20 किग्रा प्रति हेक्टर की दर से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलाना चाहिये।

बीज का चुनाव:

उन्नत किस्म का बीज बोने से अधिक पैदावार मिलती है। प्रति हेक्टर 25-30 किलो बीज की बुवाई के लिए पर्याप्त होगा ताकि पौधों की संख्या 4 से 4.5 लाख तक हो सके।

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उन्नत किस्मों का विवरण:

के.-851, पूसा 105, पी.डी.एम. 44, एम.एल.-131, जवाहर मूंग 721, पी.एस.-16, एच.यू.एम.-1, किस्म टार्म 1, टी.जे.एम.-3।
निजी कम्पनियों की किस्में : शक्तिवर्धक : विराट गोल्ड, अभय, एसव्हीएम 98, एसव्हीएम 88, एसव्हीएम 66

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बोने का समय एवं तरीका:

सीडड्रिल की सहायता से कतारों में बोनी करें। कतारों के बीच की दूरी 30-45 से.मी. रखते हुए 3 से 5 से.मी. गहराई पर बीज बोना चाहिए। मूंग के बीज उत्पादन का प्रक्षेत्र किसी दूसरी प्रजाति के मूंग के प्रक्षेत्र से 3 मीटर दूर होना चाहिये।

बीजोपचार:

बोने से पहले बीज फफूंद नाशक दवा तथा कल्चर से उपचारित करें। फफूंद नाशक दवा से उपचारित करने के लिए प्रति किलोग्राम बीज कार्बेन्डाजिम की 2.5 ग्राम मात्रा पयाप्त होती है। इसके बाद राइजोबियम तथा पी.एस.बी. कल्चर 10 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज के मान से उपचारित कर तुरंत बोनी करें।

रसायनिक खाद:

प्रति हेक्टर 20 किलोग्राम नत्रजन तथा 50 किलो ग्राम स्फुर बीज को बोते समय उपयोग में लायें इस हेतु प्रति हेक्टर एक क्ंिवटल डायअमोनियम फास्फेट डी.ए.पी. खाद दिया जा सकता है। पोटाश एवं गंधक की कमी वाले क्षेत्र में 20 किग्रा. प्रति हेक्टर पोटाश एवं गंधक देना लाभकारी होता है।

निंदाई-गुड़ाई:

जब पौधा 6 इंच का हो तो एक बार डोरा चलाकर निंदाई करें। आवश्यकतानुसार 1-2 निंदाई करना चाहिए।

सिंचाई एवं जल निकास:

प्राय: खरीफ में मूंग की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती परंतु जायद/ग्रीष्मकालीन फसल में 10-15 दिन के अंतर पर 4-5 सिंचाईयां की जानी चाहिये। सिंचाई के लिये उन्नत तकनीकों फब्बारा या रेनगन का प्रयोग किया जा सकता है।

पौध संरक्षण:

कीट: मूंग में विभिन्न रस चूसक कीटों जैसे माहो, सफेद मक्खी, जैसिड के प्रकोप से बचाव के लिए डायमिथिएट 30 ई.सी. की 800 मि.ली. मात्रा में 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
2. फली छेदक इल्ली के लिए ट्राइजोफॉस 40 ई.सी. दवा की 800 मि.ली. मात्रा 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

बीमारियां:
  • पावडरी मिल्डयू रोग के लिए गंधक चूर्ण का 25 किलो प्रति हेक्टर के हिसाब से भुरकाव करें या केराथन 0.2 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम 0.15 प्रतिशत का घोल का छिड़काव 12-15 दिन के अंतर से करना चाहिए।
  • पीला मोजेक रोग सफेद मक्खी कीट द्वारा संचारित होता है। इसके लिए निम्न उपाय करें-
  • (अ) सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए डायमिथिएट 30 ई.सी. की 800 मि.ली. मात्रा 600 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतर से छिड़काव करें।
    (ब) रोगी पौधे को उखाड़कर जला दें।
    (स) रोगरोधी जातियां लगाए।
    (घ) पर्ण चित्ती व चारकोल विगलन रोग के बचाव के लिए थीरम दवा से बीजोपचार करें फसल चक्र अपनायें।
फसल चक्र:

सिंचित खेतों में मूंग की जायद में फसल लेने के लिये धान- गेहूं फसल चक्र में उपयुक्त फसल के रूप में पाई गई है। जिससे मृदा में हरी खाद के रूप में उर्वराशक्ति बढ़ाने में सहायता मिलती है।

फसल कटाई:

जब फसल दैहिक परिपक्वता अवस्था में आ जाये जिसमें फलियों का रंग हरे से भूरा होने लगे तब फलियों की तुड़ाई तथा एक साथ पकने वाली प्रजातियों में कटाई कर लेना चाहिये तथा शेष फसल की मिट्टी में जुताई करने से हरी खाद की पूर्ति भी होती है।