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( विशेष प्रतिनिधि )

17 जून 2021, इंदौरज्वार की नई किस्म आरवीजे- 2357 – 40 साल पहले मध्य प्रदेश में ज्वार का रकबा  करीब 20 -25 लाख  हेक्टेयर था , जिसमें मालवा और निमाड़ का भी बड़ा योगदान था।  रोटी के रूप में ज्वार का ही उपयोग होता था , लेकिन अब यह रकबा घटकर करीब ढाई लाख हेक्टेयर रह गया है।  मध्य प्रदेश के झाबुआ , आलीराजपुर , बैतूल , छिंदवाड़ा और महाराष्ट्र क्षेत्र से जुड़े जिलों में अब भी ज्वार बोने की परम्परा का निर्वाह किया जा रहा है। ज्वार के लगातार घटते रकबे से चिंतित होकर अखिल भारतीय ज्वार सुधार परियोजना के कृषि महाविद्यालय इंदौर स्थित केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों ने ज्वार की अधिक उत्पादन देने वाली नई प्रजाति राज विजय 2357 ( आरवीजे –2357 ) विकसित की है , जो द्विउद्देश्यीय है।  यह मानव के लिए तो प्रोटीन युक्त होगी ही, पशु आहार के रूप में इसका चारा पशु चाव से खाएंगे और जल्दी भी पचेगा। राज्य स्तरीय बीज समिति ने इस प्रजाति को मध्य प्रदेश में उगाने की अनुमति दी है, लेकिन अभी इसकी अधिसूचना जारी नहीं की है।

ज्वार सुधार  परियोजना के केंद्र की ज्वार प्रजनक श्रीमती उषा सक्सेना ने कृषक जगत को बताया कि पहले मध्यप्रदेश में खरीफ में ज्वार का रकबा 20 -25 लाख हेक्टेयर था , जो 1980 के दशक के बाद कम होता गया, जो अब करीब ढाई लाख हेक्टेयर रह गया है । इसीसे  चिंतित होकर अखिल भारतीय ज्वार सुधार परियोजना से जुड़े कृषि वैज्ञानिक निरंतर अनुसंधान में रत रहे और ज्वार की कई प्रजातियां प्रस्तुत की जिसमें जेजे 1041  (1999  ) ,आरवीजे 1862 (2015 ) आदि प्रमुख है। अब सात साल बाद  2021 में इंदौर केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों , जिसमें  डॉ एमके सक्सेना ,डॉ सी अरुणा ,डॉ एके बड़ाया, डॉ बीबी कुशवाह और डॉ आरके चौधरी शामिल थे ,ने नई प्रजाति आरवीजे –2357 विकसित की है। इस केंद्र के पास ज्वार किस्म आरवीजे- 2357 का  5  क्विंटल  प्रजनक बीज तैयार हुआ है, जिसे अलग अलग  कृषि विज्ञान केंद्रों को उगाने के लिए दिया गया है, ताकि अधिक मात्रा में इसका आधार और प्रामाणिक बीज तैयार हो सके। प्रामाणिक बीज तैयार होने पर किसानों को बोने के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

ज्वार किस्म आरवीजे- 2357  की विशेषताएं  

डॉ सक्सेना ने कहा कि  यह जल्दी (105 -108 ) दिन में पकने वाली प्रजाति है। पौधों की ऊंचाई करीब 165 सेमी है । इसका उत्पादन 35 -43 क्विंटल /हेक्टेयर है। दाने में प्रोटीन 12.45 ,एनडीएफ 58.7 और एडीएफ 38.1 प्रतिशत है। स्टार्च 61.7, आयरन 20.6  पीपीएम और ज़िंक 11.8 पीपीएम है । चारे का उत्पादन 130 -140 क्विंटल /हेक्टेयर  है। यह तना छेदक मक्खियों के लिए मध्यम सहनशील है और पर्ण धब्बों  के लिए सहनशील होने से पत्तियों वाली बीमारियां भी कम लगती हैं।  पत्तियां भी धीरे सूखती हैं। प्रोटीन युक्त इसके चारे की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती ह।  पशु इसे चाव से खाते हैं और यह जल्दी पच भी जाता है।

पूर्व परियोजना प्रभारी डॉ एके बड़ाया ने इस द्विउद्देश्यीय किस्म की तारीफ़ करते हुए कहा कि इसका प्रोटीन युक्त दाना मानव के लिए उत्तम है, वहीं  इसका चारा पशुओं के लिए सुपाच्य है। अनुसन्धान के दौरान यह बीज भारतीय लघुधान्य अनुसंधान संस्थान , हैदराबाद को भेजा गया था , जिसे उन्होंने अलग-अलग ज्वार सुधार केंद्रों को प्रदर्शन के लिए भेजा था ,जहां दो साल तो इसका प्रदर्शन अच्छा रहा , लेकिन तीसरे साल कम होने से इसे देश के प्रत्येक राज्य के लिए स्वीकृति नहीं मिल पाई ,लेकिन मध्य प्रदेश में  राज्य स्तर पर इसे मंजूर किया गया है।

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