ऐसे करें अलसी की खेती

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ऐसे करें अलसी की खेती – जलवायु- अलसी की फसल को ठंडे व शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती है। अलसी के उचित अंकुरण हेतु 25-30 डिग्री से.ग्रे. तापमान तथा बीज बनते समय तापमान 15-20 डिग्री से.ग्रे. होना चाहिए। अलसी के वृद्धि काल में भारी वर्षा व बादल छाये रहना बहुत ही हानिकारक साबित होते हैं। परिपक्वन अवस्था पर उच्च तापमान, कम नमी तथा शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है ।

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भूमि का चुनाव – अलसी की उफसल के लिये काली भारी एवं दोमट (मटियार) मिट्टियां उपयुक्त होती है। अधिक उपजाऊ मृदाओं की अपेक्षा मध्यम उपजाऊ मृदायें अच्छी समझी जाती हैं। भूमि में उचित जल निकास का प्रबंध होना चाहिए।

खेत की तैयारी- अलसी का अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिये खेत भुरभुरा एवं खरपतवार रहित होना चाहिये। अत: खेत को 2-3 बार हैरो चलाकर पाटा लगाना आवश्यक है जिससे नमी संरक्षित रह सके। अलसी का दाना छोटा एवं महीन होता है, अत: अच्छे अंकुरण हेतु खेत का भुरभुरा होना अति आवश्यक है ।

उन्नतशील प्रजातियां- जवाहर अलसी-23, जवाहर अलसी-9 जे.एल.एस.-66, जे.एल.एस.-67, जे.एल.एस.-73।

बुवाई समय- अंिसंचित क्षेत्रों में अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में तथा सिंचित क्षेत्रों में नवम्बर के प्रथम पखवाड़े में बुवाई करना चाहिये। उतेरा जल्दी बोनी करने पर अलसी की फसल को फली मक्खी एवं पाउडरी मिल्डयू आदि से बचाया जा सकता है ।

बीज दर एवं अंतरण- अलसी की बुवाई 25-30 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से करें। कतार से कतार के बीच की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 5-7 सेमी रखें। बीज को भूमि में 2-3 सेमी की गहराई पर बोना चाहिये।

बीजोपचार- बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें अथवा ट्राइकोडर्मा विरीडी की 5 ग्राम मात्रा अथवा ट्राइकोडर्मा हरजिएनम की 5 ग्राम एवं कार्बोक्सिन की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर बुवाई करें।

पोषक तत्व प्रबंधन- अलसी के बेहतर उत्पादन हेतु अच्छी तरह से पकी हुई गोबर खाद 4-5 टन/हे. अन्तिम जुताई के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देें। मिट्टी परीक्षण अनुसार उर्वरकों का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है। अलसी को असिंचित अवस्था में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश की क्रमश: 40:20:20 किग्रा./हे. देें। बोने के पहले सीडड्रिल से 2-3 से.मी. की गहराई पर उर्वरकों की पूरी मात्रा देें। सिंचित अवस्था में अलसी फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की क्रमश: 60-80:40:20 कि.ग्रा./हे. दें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोने के पहले तथा बची हुई नाईट्रोजन की मात्रा प्रथम सिंचाई के तुरन्त बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में दें।

खरपतवार प्रबंधन- खरपतवार प्रबंधन के लिये बुवाई के 20 से 25 दिन पश्चात पहली निंदाई-गुड़ाई एवं 40-45 दिन पश्चात दूसरी निंदाई-गुड़ाई करेें। अलसी में रसायनिक विधि से खरपतवार प्रबंधन हेतु पेंडीमिथालीन 1 किलोग्राम सक्रिय तत्व को बुवाई के पश्चात एवं अंकुरण पूर्व 500-600 लीटर पानी में मिलाकर खेत में छिड़काव करें।

जल प्रबंधन- अलसी के अच्छे उत्पादन के लिये विभिन्न क्रांतिक अवस्थाओं पर 2 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। यदि दो सिंचाई उपलब्ध हो तो प्रथम सिंचाई बुवाई के एक माह बाद एवं द्वितीय सिंचाई फल आने से पहले करें। सिंचाई के साथ-साथ प्रक्षेत्र में जल निकास का भी उचित प्रबंध होना चाहिये। प्रथम एवं द्वितीय सिंचाई क्रमश: 30-35 व 60 से 65 दिन की फसल अवस्था पर करें।

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