प्राकृतिक एवं कृत्रिम विधि से भू-जल का संचयन एवं पुनर्भरण

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  • मंजू ध्रुव , श्रुति वर्मा
  • लव कुमार गुप्ता, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

22 फरवरी 2022, प्राकृतिक एवं कृत्रिम विधि से भू-जल का संचयन एवं पुनर्भरण  – पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जो बहूमूल्य संपदा एवं संसाधनों से भरी है। हमें यह विदित है कि पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुओं एवं प्राणियों का वास है। पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाने का कारण पृथ्वी के गर्भ में पाये जाने वाले एवं जीवन प्रदान करने वाली संपदाओं से है। जिसमें जल का अपना विशिष्ट स्थान है। इस सृष्टि में जल के बिना जीवन कहीं भी संभव नहीं है। नगरीकरण एवं औद्योगिकीकरण की वजह से वन क्षेत्र कमी, कारखानों से निकलने वाले विषैले गैसों एवं पेड़-पौधों की कमी से दिनों-दिन वातावरण के तापमान में वृद्धि हो रही है। गर्मी बढऩे से विश्व के कई क्षेत्रों में जल की कमी एवं उससे होने वाली परेशानियों को स्पष्ट देखा जा सकता है। विश्व स्तर पर जनसंख्या में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। ऐसे में जल की महत्ता समझना आवश्यक हो जाता है। यंू तो हमारी धरती का लगभग तीन चौथाई भाग जल मग्न है, लेकिन

पीने योग्य पानी की मात्रा केवल 3 प्रतिशत है। जिसमें से 2 प्रतिशत पानी हिमनदों, हिमखण्डों, सतही जल एवं भूमिगत जल के रूप में विद्यमान है।
शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता और जल संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं से अवगत होने के बावजूद भी विश्व की बड़ी आबादी जल संरक्षण के प्रति सचेत नजर नहीं आती है। भूमिगत जल स्तर में कमी होने से इसका दुष्प्रभाव जीवों एवं वनस्पतियों के साथ-साथ सांसारिक विकास कार्यों पर भी देखा जा सकता है। जल चक्र को नियमित बनाये रखने के लिए वन विनाश को रोका जाये और अधिक से अधिक वन रोपण किया जाए। पर्यावरण हितैषी प्रयासों से अवृष्टि, अतिवृष्टि और वर्षा जल के अंतराल को नियंत्रित किया जा सकता है। भूमिगत जल का संरक्षण करने से हम धरती पर जीवन को लम्बे समय के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। धरती में भूमिगत जल के पुनर्भरण से वर्तमान में होने वाली पानी की समस्या को दीर्घ काल के लिए टाल सकते हैं।

भूजल संचयन

भूजल संचयन का कार्य भारत में ही नहीं बल्कि विभिन्न देशों के छोटे-छोटे क्षेत्रों में आवश्यकतानुरूप जल का संचयन एवं प्रबंधन किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य में मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के पहल से भू-जल संरक्षण और संवर्धन के लिए संचालित नरवा (नाला) विकास योजना के जरिए राज्य के नदी-नालों और जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित किया जा रहा है। दरअसल, नरवा विकास योजना छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी सुराजी गंाव योजना के नरवा, गरवा, घुरवा अउ बारी का एक हिस्सा है। नरवा विकास के माध्यम से वर्षा जल को सहेजने के लिए तेजी से नालों का उपचार कराया जा रहा है। प्रथम चरण में छत्तीसगढ़ में 1385 नाले उपचार के लिए चिन्हित किए गए हैं। जिसमें से 1372 नालों में वर्षा जल की रोकथाम के लिए बोल्डर चेक, गली प्लग, ब्रश हुड, परकोलेशन टैंक जैसी संरचनाओं का निर्माण एवं उपचार कर पानी को रोकने और भू-जल स्तर बेहतर बनाने प्लान तैयार कर काम कराया जा रहा है। राज्य में अब तक 1310 नालों में वर्षा जल को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के 71 हजार 831 स्ट्रक्चर बनाए जाने की मंजूरी दी गई है, जिसमें से 51 हजार 742 स्ट्रक्चर का निर्माण हो चुका है। अभी भी 9685 स्ट्रक्चर निर्माणाधीन है। छत्तीसगढ़ के जिन-जिन क्षेत्रों में नरवा उपचार के काम हुए है। वहां भू-जल स्तर में आशातीत वृद्धि हुई है। नालों में जल भराव होने से किसान अब बेहतर तरीके से फसलोत्पादन के साथ साथ साग-सब्जी की भी खेती करने लगे हैं। नालों से पानी खिंचने से किसानों की सिंचाई की भी सुविधा मिली है। राज्य में पानी रोकने की इस मुहिम को केन्द्र सरकार ने न सिर्फ सराहा है, बल्कि सूरजपुर और बिलासपुर जिले को नेशनल वॉटर अवॉर्ड से सम्मानित भी किया है। यह नेशनल अवार्ड बिलासपुर जिले को नदी-नालों के पुनरूद्धार के लिए और सूरजपुर जिले को जल संरक्षण के उल्लेखनीय कार्यों के लिए भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की ओर से दिया गया है।

भूमि जल पुनर्भरण

भू-जल पुनर्भरण एक हाइड्रोलॉजिकल प्रक्रिया है। जहां पानी सतही जल से भूजल में नीचे की ओर जाता है। पुनर्भरण प्राथमिक विधि है। जिसके द्वारा जल जलभृत में प्रवेश करता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर पौधों की जड़ों के नीचे वडोज जोन में होती है और इसे अक्सर जल स्तर की सतह पर प्रवाह के रूप में व्यक्त किया जाता है। भूजल पुनर्भरण में जल स्तर से दूर संतृप्त क्षेत्र में जाने वाला जल भी शामिल है। पुनर्भरण स्वाभाविक रूप से (जल चक्र के माध्यम से) और मानवजनित प्रक्रियाओं (कृत्रिम भूजल पुनर्भरण) के माध्यम से होता है। जहां वर्षा जल और या पुन: प्राप्त पानी को उपसतह पर भेज दिया जाता है। भू-जल पुनर्भरण में जल चक्र का विशेष भूमिका अदा करता है। भूमि की सतह पर उपस्थित पानी वाष्पीकरण द्वारा एवं वनस्पतियों पर उपस्थित पानी वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया से वातावरण में पहुंच जाता है। यही पानी क्षोभमण्डल में बादल के रूप में मौजुद होता है। संघनन होने पर यही पानी वर्षा के रूप में पुन: धरती पर गिरता है, और कई माध्यमों से मिट्टी में समाहित होकर निस्यंदन ओर रिसाव होने से भूमिगत जल स्तर तक पहुंचता है। जिससे भूजल स्तर में वृद्धि होता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया भूमि जल पुनर्भरण कहलाती है।

 

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