बेल लगाएं धन कमाएं

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जलवायु :- बेल एक उपोष्ण जलवायु का पौधा है, फिर भी इसे उष्ण जलवायु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसकी ख्ेाती समुद्र तल से 1200 मीटर ऊँचाई तक और 7-46 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तक की जा सकती है। फूल एवं फल के विकास के समय पर्याप्त वर्षा व नमी का होना आवश्यक है। इसके लिए शुष्क एवं गर्म वातावरण उपयुक्त होता हैं।
भूमि:– बेल की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती हैं, परन्तु उपयुक्त जल निकास युक्त बलुई दोमट भूमि, इसकी ख्ेाती के लिये अधिक उपयुक्त हैं, भूमि की पी.एच. मान 6-8 तक अधिक उपयुक्त रहता हैं पड़ती एवं शुष्क भूमि में लगाने के लिए उपयुक्त पौधा है।
किस्में:- सिवान, देवरिया, बड़ा, कागजी इटावा, चकिया, मिर्जापुरी, कागजी, गोण्डा, नरेन्द्र बेल- 5, नरेन्द्र बेल- 7, नरेन्द्र बेल – 9, पंत सिवानी, पंत अर्पणा पंत उर्वशी और पंत सुजाता नेल की उपयुक्त किस्में हैं।
प्रवर्धन या बडिंग:- बेल के पौधों का प्रवर्धन लैंगिक एवं वानस्पतिक दोनों विधियों से किया जाता है। बीजों की बुवाई फलों से निकालने के तुरन्त बाद 15-20 सेमी. की ऊंची एवं 13 10 मी. की बैड में 1-2 सेमी. की गहराई 15-20 सेमी. की ऊँची एवं 1 मी. की बैड में 1-2 सेमी. की गहराई पर फरवरी- मार्च एवं जून- जुलाई के महिने में की जाती है। जब पौधे एक वर्ष के हो जाएं अथवा तना पेंसिल की मोटाई के आकार का हो जाए तो कलिकायन करने के योग्य हो जाते हैं। जुलाई – अगस्त या फरवरी माह कलिकायन के लिए उपयुक्त समय है। बेल में पेंच कलिकायन विधि सर्वोत्तम रहती है।

बेल हमारे देश में उगाये जाने वाला एक पौराणिक वृक्ष है। कम सिंचित भूमि में भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है भगवान शिव की आराधाना में बेल पत्र एवं फल का विशेष स्थान है। बेल फल के पंचांग (जड़, छाल, पत्ते, शाख एवं फल) औषधि रूप में मानव जीवन के लिये उपयोगी एवं उदर रोगों में बहुतायत से किया जाता है। राजस्थान में इसकी खेती सभी जिलों में की जा सकती है।

पौधा रोपण:– कलिकायन किये हुये पौधों के रोपण का सर्वोत्तम समय जुलाई- अगस्त है। इसके लिए जून माह में 1 3 1 3 1 मीटर के गड्ढे 8-10 मीटर की दूरी पर खोदें। इन गड्ढों को 20-30 दिनों तक खुला छोड़ कर 10-15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद तथा क्लोरोपायरीफॉस 4 प्रतिशत चूर्णत प्रति गड्ढा मिलाकर भर देंं।
खाद एवं उर्वरक:– एक वर्ष के पौधे को 10 किग्रा. गोबर खाद, 100 ग्राम यूरिया, 150 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश देंं। यह मात्र इसी दर से 8 वर्ष तक बढ़ाते रहें। पौधों में उर्वरकों का उपयोग मार्च-अप्रैल में तथा गोबर खाद का प्रयोग जुलाई माह में करें।
सिंचाई:– बेल के नये स्थापित बगीचों में गर्मी से सात दिन के अन्तराल पर व शीतकाल में 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें। गर्मियों में बेल का पौधा अपनी पत्तियां गिरा कर सुषुप्तावस्था में चला जाता है। सिंचाई की सुविधा होने पर मई – जून के महीने में नई पत्तियां आने के बाद 20-30 दिनों के अन्तराल पर दो सिंचाई करें।
निराई – गुड़ाई:- बेल के थालों में खाद एवं उर्वरक के प्रयोग के समय गुड़ाई करें।
पौधों की कटाई – छंटाई:- पौधों की साफ – सुथरी प्ररोह विधि से करना उत्तम होता है। सधाई का कार्य शुरू के 4-5 वर्षो में ही करें। मुख्य तने को 75 सेमी. तक अकेला रखें। तत्पश्चात 4-6 शाखायें चारों दिशाओं में बढऩे दें। सूखी तथा कीड़ों एवं बीमारियों से ग्रसित टहनियों को समय-समय पर निकालते रहें।
अन्त फसलें:- शुरू के वर्षों में नये पौधों के बीच खाली जगह का प्रयेाग अन्त: फसल लगा कर करें। इसके लिए दलहनी फसलें- मटर, ग्वार, लोबिया, मूंग, उड़द एवं सब्जियों- बैंगन, टमाटर, पालक, धनिया, मिर्च व लहसुन आदि को उगाया जा सकता है।
फसलों की तुड़ाई व उपज:- फसल अप्रैल- मई माह मे तोडऩे योग्य हो जाते हैं जब फलों का रंग गहरे हरे रंग में बदल कर पीला हरा होने लगे तब फलों की तुड़ाई 2 सेमी. डण्ठल के साथ करें। कलमें पौधों में 3-4 वर्षो में फलत प्रारम्भ हो जाती है, जबकि बीजू पेड़ों में फलत 7-8 वर्ष में होती है। पूर्ण विकसित वृक्ष (10-15 वर्ष ) की उन्नत प्रजाति के पौधे से 200-400 बड़े फल एवं बीजू पौधों से प्रति पेड़ 100- 200 छोटे फल प्राप्त होते हैं।

  • सज्जन चौधरी
    email: sajjanchoudhary30@gmail.com
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