कृषि भूमि पर सरकार की तिरछी नजर

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(अतुल सक्सेना)
भोपाल। देश के प्रधानमंत्री का सपना है वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सपना है, खेती को लाभ का धंधा बनाना। परंतु यह लोक लुभावन सपने कैसे पूरे होंगे जब कृषि भूमि पर खेती ही नहीं होगी, बल्कि उसका उपयोग अन्य कार्यों के लिये किया जाएगा। सपने किसानों के प्रति हमदर्दी नहीं, मात्र छलावा है क्योंकि प्रदेश सरकार की व्यवसायिक नजर कृषि प्रक्षेत्र, कृषि संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों एवं कृषि से संबंधित अन्य प्रतिष्ठानों की उर्वर जमीन पर है जहां किसानों के लिये बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रयोग किए जाते हैं। शासन द्वारा इन कृषि प्रतिष्ठानों की जमीन कहीं कोर्ट भवन के लिये, कहीं स्टेडियम, प्रधानमंत्री आवास योजना  के लिये आवंटित की जा रही है जो किसानों के हित में नहीं है।

हाल में इंदौर कृषि महाविद्यालय की 20 एकड़ जमीन कोर्ट भवन के लिये आवंटित करने का मामला ठंडा नहीं हुआ कि गत दिनों कृषि विभाग के रेहटी फार्म की 10 एकड़ जमीन नगर परिषद रेहटी को आवंटित कर दी गई जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान, इंड़ोर स्टेडियम तथा अन्य आयोजन किए जाएंगे।
इंदौर कृषि महाविद्यालय की जमीन देने के विरोध में तो कृषि महा. के छात्र-छात्राएं, प्रोफेसर, वैज्ञानिकों एवं आम जनता ने विरोध कर प्रदेश व्यापी आंदोलन किया। राष्ट्रपति से राज्यपाल तक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा तब स्थिति संभली और मामला अब तक यथावत है परंतु रेहटी फार्म की जमीन तो बिना किसी शोर-शराबे के नगर परिषद को सौंप दी गई। इधर गत दो सप्ताह पूर्व कैबिनेट की बैठक में भी मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश नियम 2012 के नियम 15 में संशोधन का निर्णय लिया गया। संशोधन में नियम 15 की प्रक्रिया को सरल करते हुए पीएसपी में भूमि उपांतरण के लिए लेव्ही कर में कमी की गई है। यह निर्णय ग्लोबल इनवेस्टर्स समिति 2016 में मुख्यमंत्री की घोषणा शहरों में कृषि भूमि को पीएसपी अर्थात स्वास्थ्य शिक्षा जैसे उपयोग में परिवर्तन के नियमों को सरल कर समय सीमा में अनुमति दी जाएगी और इसके लिए फीस भी नाममात्र ही ली जाएगी, इसके परिपालन में लिया गया।
यहां ज्वलंत प्रश्न यह है कि कृषि संस्थानों की भूमि यदि इसी प्रकार अन्य विभागों को दी जाती रहेगी तो किसान की आय दोगुनी या खेती लाभ का धंधा कैसे बनेगी। एक ओर तो प्रदेश के अन्नदाता की मेहनत से लगातार पांचवी बार कृषि कर्मण अवार्ड मिलने पर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, प्रदेश की कृषि विकास दर लगभग 25 फीसदी हो गई है, मुख्यमंत्री नीति आयोग में आय दोगुनी करने का प्रधानमंत्री के सामने प्रजेन्टेशन  दे रहे हैं, अन्य राज्यों द्वारा इसे मॉडल के रूप में अपनाया जा रहा है। दूसरी तरफ राज्य के कृषि संस्थानों  की भूमि अन्य प्रायोजनों के लिये धड़ल्ले से दी जा रही है। जिससे किसान की तरक्की के लिये किए जाने वाले कार्यों जैसे अनुसंधान, प्रदर्शन आदि पर विपरीत असर होगा। सरकार यदि इसी तरह कृषि भूमि बांटती रही तो राज्य के किसानों का भविष्य क्या होगा यह एक गंभीर प्रश्न है? इसी प्रकार भोपाल के निकट फंदा कृषि फार्म की जमीन पर भी भू-गिद्धों की नजर है। राजमार्ग पर होने के कारण यह फार्म बेशकीमती भूखण्ड में तब्दील हो गया है। जबकि कृषि से संबंधित होने के कारण पूर्व में ही कृषि अनुसंधान केंद्र को जमीन आवंटित कर दी गई है अब और जमीन की मांग फार्म के साथ अन्याय नहीं  तो और क्या है।

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