किसान आंदोलन सुलगते सवाल

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  • श्रीकान्त काबरा, मो. : 9406523699
    मध्य प्रदेश में किसानों से हमदर्र्दी जताने के लिए सत्तारूढ़ और विपक्षी दल के राजनेता आरोप प्रत्यारोपण, उपवास-प्रति उपवास-सत्याग्रह की राजनीति कर रहे हैं। किसनों की समस्याओं का समाधान हो या न हो लेकिन सत्ता में बने रहने की और सत्ता में नये सिरे से विराजमान होने की ललक और उसके लिए प्रयत्न गति पकड़ते दिखाई दे रहे हंै। मुख्यमंत्री ने फिर एक बार किसनों से हमदर्दी दिखाते हुए कई घोषणायें-आश्वासन दे डाले हैं, अब ये मूर्तरूप किस हद तक लेंगे या पुरानी अनेक घोषणाओं की तरह छलावे बन कर रह जायेंगे, यह तो भविष्य ही बतायेगा। फिर भी वर्तमान घटनाक्रम का अन्वेषण जरूरी है।

मुआवजे के लिए प्रेरक है मुख्यमंत्री का संदेश
मुख्यमंत्री ने किसान आंदोलनकारियों को अराजक तत्व बताया ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि मारे गये व्यक्ति अराजक तत्व थे तब मुआवजा देने की घोषणा क्यों की और मारे गये व्यक्ति किसान थे तो उन पर गोली क्यों चलाई गई, मुआवजे की राशि भी एक करोड़ रूपये प्रति व्यक्ति दी गई। उस भारी-भरकम राशि की घोषणा के क्या निहितार्थ है, खेती करके तो कर्ज के जाल में किसान भाई फंसकर आत्महत्या कर रहे हैं उससे तो अच्छा है, उग्र आंदोलन करो बसें जलाओं, तोड़-फोड़ कर संपत्ति का नुकसान करों और आत्महत्या की बजाए पुलिस की गोली खाकर मारे जाओं एक करोड़ रूपये और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी पक्की। क्या बढिय़ा नीति है और किसानों के लिए कितना प्रेरक मुख्यमंत्री का संदेश है।
शिवराज का पलायनवाद
दूसरी तरफ शासकीय कर्मचारी, पुलिस वाले कानून व्यवस्था बनाये रखने में पिटे, हाथ पैर तुड़वाये उनको तबादले का पुरस्कार, प्रजातंत्र में यही तो वोट बैंक साधने की सत्ता में बने रहने की कुंजी है।
शासन के विरूद्ध विपक्षी दल सत्याग्रह करें, उपवास करें वह तो ठीक है लेमिन प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता ने जिस व्यक्ति को शासन की बागडोर थामने, नीति बनाने व उसके क्रियान्वयन की जिम्मेवारी सौंपी है वही सत्ताशीर्ष पर विराजमान होकर निरूपाय उपवास करने लगे तो उस गैर जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार अथवा नौटंकी नहीं तो क्या कहा जाए, रेल दुर्घटना के समय जिम्मेदारी लेने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी आपको याद नहीं आये, किसान आंदोलन के संघर्ष के पलों में अशांत क्षेत्र में जाकर जन सहयोग से शांति कायम करने की बजाए केन्द्र शासन से कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल मांगना कौन सा राजनैतिक आदर्श है। राम राज्य की दुहाई देने वाले को यह भी याद करना चाहिए कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने जनभावना को जानकर ही साीता माता को वनवास दे दिया था उग्र किसान आंदोलन तथा उसके कारण मरने वाले किसान भाईयों की भावना समझते हुए आप राजसत्ता त्यागने की बजाए अतिरिक्त पुलिस बल कीे मांग कर निहत्थे किसानों के प्रति दमनकारी नीति अपनाने के लिए उद्यत हो गये।
पंछी की पीड़ा और तंदूरी मुर्गा
मौके का फायदा उठाने में विपक्ष ने ही कौन सी जिम्मेदारी निभाई, विपक्ष के विधायक ने सरेआम पुलिस थाने में आग लगाने का आव्हान कर डाला और कृषि मंत्री तथा उनक क्षेत्रीय संासद की तू-तू मैं-मैं कौन सा मर्यादित आचरण है, सही मायने में राजनेताओं की किसानों के प्रति पीड़ा की सच्चाई कुछ इस प्रकार है:-
भरी सभा में पंछी की पीड़ा का जिसने हाल सुनाया है,
अभी-अभी तंदूरी मुर्गा खाकर ही वह आया है।
प्याज 8 रूपये खरीदें-बौखलायी सरकार
बौखलाये मुख्यमंत्री ने किसानों का दिल जीतने के लिए आठ रूपये प्रतिकिलो के दाम पर प्याज खरीदने की घोषणा कर दी। आठ रूपये किलो प्याज का मूल्य निर्धारित किस आधार पर किया गया। पिछले वर्ष ही छ: रूपये किलो प्याज खरीदने पर शासन को करोड़ों रूपये का घाटा हुआ था। शासन के पास सुरक्षित भंडारण की भी व्यवस्था नहीं है फिर कर के रूप में वसूली गई जनता की गाढ़ी कमाई की ऐसी बर्बादी क्यों कर रहे हंै। गिरते बाजार को थामने के लिए प्रचलित बाजार मूल्य से 20-25 प्रतिशत राशि बढ़ा कर दी जा सकती थी इससे किसान को भी आस बँधती और कम मार्जिन के कारण व्यापारी भी पिछले दरवाजे से आकर किसान के नाम पर छद्म रूप से शासन को प्याज नहीं बेचता।

दूसरी प्रक्रिया में आप आगामी महीनों के लिए क्रमिक रूप से प्याज के शासकीय खरीद के बढ़ते दामों की घोषणा कर देते। इससे शासन को संग्रहण की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती किसान को भी उचित दाम मिलने का भरोसा बना रहता। भारत सरकारी जब पेट्रोल डीजल के विक्रय मूल्यों को रोज बदलने की व्यवस्था कर सकती है तो माहवार कृषि जिंसों के समर्थन मूल्य में क्यों निर्धारित नहीं किये जा सकते। समर्थन मूल्य से कम दाम पर व्यापारियों द्वारा कृषि उपज खरीदे जाने पर आपराधिक प्रकरण कायम किये जाने की घोषणा व्यापारियों की धमकी के कारण पहले ही दम तोड़ चुकी है।दूसरी प्रक्रिया में आप आगामी महीनों के लिए क्रमिक रूप से प्याज के शासकीय खरीद के बढ़ते दामों की घोषणा कर देते। इससे शासन को संग्रहण की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती किसान को भी उचित दाम मिलने का भरोसा बना रहता। भारत सरकारी जब पेट्रोल डीजल के विक्रय मूल्यों को रोज बदलने की व्यवस्था कर सकती है तो माहवार कृषि जिंसों के समर्थन मूल्य में क्यों निर्धारित नहीं किये जा सकते। समर्थन मूल्य से कम दाम पर व्यापारियों द्वारा कृषि उपज खरीदे जाने पर आपराधिक प्रकरण कायम किये जाने की घोषणा व्यापारियों की धमकी के कारण पहले ही दम तोड़ चुकी है।समितियों की सरकार नतीजा बेकारलागत मूल्य के आधार पर कृषि उपज के मूल्य निर्धारण के लिए समिति बनाई जाने की घोषणा भी केवल छलावा है। किसी जानकार का कथन है, समिति याने अनिच्छुक लोगों का एक समूह जिन्हे अयोग्य लोगों में से चुना गया है, एक ऐसा काम करने के लिए जो पूरी तरह अनावश्यक है। नई समिति बनाने की बजाए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें मानकर भारत सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का 50 प्रतिशत अधिक दाम किसानों को दे दीजिए। लेकिन मुख्यमंत्री पूर्व में केन्द्र के एक इशारे पर ही गेहूं के समर्थन मूल्य पर सौ रूपये बोनस दिये जाने की घोषण से पीछे हट चुके हंै। वैसे बाजार में कृषि जिंसों का मूल्य निर्धारण प्रदेश शासन के हाथ में भी नहीं है। केन्द्र सरकार की आयात-निर्यात नीति, आयात शूल्क का निर्धारण और भारतीय करंसी में डालर का मूल्य, कमोडिटी एक्सचेंज की धारणा कृषि उत्पाद के पैदावार का अनुमान आदि अनेक घटक हैं जिनसे बाजार मूल्य निर्धारित होता है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के संदर्भ में मध्य प्रदेश मानव अधिकार आयोग की अनुशंसाओं की भी तो प्रदेश सरकार ने अनदेखी की ऐसी स्थिति में एक और कमेटी गठित करने का औचित्य क्या जबकि क्रियान्वयन की राजनैतिक इच्छा शक्ति ही न हो।

 

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