मृदा प्रदूषण में सूक्ष्म जीवों का महत्व

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मृदा प्रदूषण के विपरीत प्रभाव

अ. मानव एवं पशु स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव: कीटनाशक व भारी तत्वों का असर मृदा में लम्बे समय तक सक्रिय अवस्था में रहने से इसे पौधे एवं जन्तुओं द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है जो कि खाद्य श्रृंखला के माध्यम से ये हानिकारक प्रदूषक मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। दूषित मृदा में फसल, सब्जियाँ, फलों, आदि उगाने से भारी धातुओं का अवशोषण पौधे के द्वारा सामान्य स्तर से अधिक होता है, जिसके माध्यम (खाद्य पदार्थ) से ये मानव एवं पशुओं में पहुंचते हैं जिनके कारण विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ एवं व्याधियाँ उत्पन्न होती है जिसका तालिका में संक्षिप्त विवरण दिया गया है।
ब. पौध की वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव: भारी धातुओं एवं विषाक्त रसायनों का स्तर मृदा मे सामान्य से ज्यादा होने पर उसका प्रभाव मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों पर पड़ता है जिससे उनकी संख्या में कमी एवं जैव क्रियाओं में बाधा आती है। सूक्ष्म जीवों पर इस प्रकार के प्रभाव से मृदा तत्व खनिजीकरण बाधित होता है जिससे पौधों की वृद्धि एवं विकास पर सीधा प्रभाव पड़ता है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण बढ़ती खाद्य आपूर्ति हेतु अंधाधुंध रसायनिक उर्वरक, कृषि रसायन (कीटनाशक, खरपतवारनाशक आदि) का प्रयोग, औद्योगिक गतिविधियों के रसायन (पेट्रोलियम, हाईड्रोकार्बन, नेफ्थलीन, आदि) और अन्य भारी धातुओं के कारण मृदा एवं वातावरण पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
स. मृदा संरचना में परिवर्तन: मृदा में प्रदूषण के कारण अधिकतर मृदा जीवों (केंचुआ आदि) की मृत्यु होने से एवं कार्बनिक पदार्थों का समयानुसार अपघटन न होने से मृदा संरचना में भी परिवर्तन होता है।

मृदा प्रदूषक के प्रमुख कारण
औद्योगिक क्रियाविधि: पिछले लगभग एक शताब्दी से भौतिक वस्तुओं के निर्माण हेतु मृदा से धातुओं, खनिजों, आदि का खनन तेजी से हो रहा है जिससे मृदा में प्राकृतिक संपदाओं का संतुलन तेजी से बिगड़ा एवं औद्योगिक अपशिष्टों का मृदा, जल एवं वायुमंडल पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
कृषि क्रियाएं : कृषि में नई तकनीकी के साथ-साथ रसायनिक उर्वरकों एवं कृषि रसायनों का प्रयोग दर तेजी से बढ़ा है जिसके कारण मृदा में इनका संग्रह होता जा रहा है। इनके प्रभाव से मृदा सूक्ष्म जीवों, मृदा जैव क्रियाओं आदि में हृा्स होता है जिससे मृदा में विषाक्त तत्वों एवं धातुओं की विषाक्तता बढ़ जाती है। मृदा की भौतिक संरचना में कमीं के साथ-साथ मृदा उर्वरता भी घटती जा रही है।
अपशिष्ट व्यवस्था: दैनिक दिनचर्या में प्रयोग आने वाली वस्तुओं के अशिष्ट (प्लास्टिक, पालीथिन, रसोई कचरा, शहरी अपशिष्ट) आदि का सही तरीके से समापन व्यवस्था न होने से तथा खुले वातावरण जैसे खेत, नाले, पार्क, नदियों आदि में फेंकने से मृदा प्रदूषण मे निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है।
अम्ल वर्षा : वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा का एक मुख्य द्योतक है जो कि विभिन्न उद्योगों से निकले सल्फर युक्त धुओं आदि का वायुमंडल में इक होने से होती है। अम्ल वर्षा में उपस्थित तत्व मृदा तत्वों के संरचना को परिवर्तित कर देते हैं जिसका मृदा स्वास्थ्य एवं पौधों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
प्लास्टिक प्रदूषण: प्लास्टिक एक विदेशी दिमाग की उपज है जिसे सन् 1862 में अलेक्जेंडर पार्कीस ने लंदन में एक महान अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शिनी में प्रदर्शित किया इसके द्वारा बनी हुई वस्तुएं बहुत आकर्षक, टिकाऊ और कभी न सडऩे-गलने वाली होती है ये बात बिल्कुल ठीक है लेकिन प्लास्टिक से बनी हुई वस्तुएं आज हमारे जन जीवन व वातावरण के लिए कितनी घातक हो जायेंगी ये किसी ने नहीं सोचा।
प्रदूषण का सिलसिला तब आरंभ होता है जब काम में आने के बाद इन बोरी, बैगों एवं प्लास्टिक वस्तुओं को कचरे के रूप में जहाँ-तहाँ फेक दिया जाता है इन प्लास्टिकों का जैविक अपघटन बहुत अधिक धीरे या न होने के कारण प्लास्टिक जल्दी सड़ता नहीं है और पर्यावरण के लिए खतरा बन जाता है। पालीथिनपेट्रो-केमिकल का उत्पाद है जिसमें हानिकारक रसायनों का उपयोग होता है।
पालीथिन कचरा जलाने से कार्बन डाई-आक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड एवं डाईआक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती है। जिससे सांस, त्वचा आदि की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती हैं। पशु पक्षियों के कीटनाशकयुक्त विषाक्त भोजन एवं पॉलीथिन आदि खाने के कारण प्रतिवर्ष सैंकड़ों पशु-पक्षियों की मृत्यु हो रही है।

 

 

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