कांचनमुक्ति : मथुरा में पैसा है तो कंस भी है

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें

आज ‘केशलेस’ याने नकद रहित से लेकर ‘लेसकेश'(कम नगदी) की बात जोर-शोर से चल रही है। अतएव मुझे आचार्य विनोबा भावे द्वारा श्रम और प्रेम के आधार पर प्रतिपादित कांचनमुक्ति सिद्धांत और प्रयोग विचारणीय लगा। विनोबा ने कहा था ‘दुनिया में श्रम और प्रेम की प्रतिष्ठा बढऩे से कांचनमुक्ति होगी।’ श्रम नहीं होगा तो अन्नोत्पादन पूरा नहीं होगा। कुछ लोग ज्यादा छीन लेने की  कोशिश करेंगे और झगड़ा चलता ही रहेगा। इसी के लिये प्रेम भी चाहिए, ताकि जो पैदा हुआ उसे बांटकर खायें। जैसे परिवार में सब अलग-अलग कमाते हैं, फिर भी सब बांटकर खाते हैं, क्योंकि उनमें प्रेम है। वैसा ही प्रेम समाज में होने पर बांटकर खाने का सामाजिक अमल होगा। इन दोनों चीजों में बढऩे से पैसे का जोर नहीं चलेगा और समाज कांचनमुक्त होगा।’ विनोबा के आश्रम में वैसे ही अन्न और वस्त्र स्वावलंबन चल ही रहा था। सूत खुद कातकर, कपड़े की बुनाई करना तथा अपने परिश्रम से पैदा अन्न का सेवन करना ही आश्रम का व्रत था। इसलिए बाजार में कपड़े के या अनाज के भाव गिरें या बढ़ें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। इस स्वावलंबन प्रक्रिया के दो भाग किये गये थे। एक था स्वयं का स्वावलंबन और दूसरा समूह का याने आश्रम का स्वावलंबन। इसे कांचन मोचन की उपासना कहा गया था। आश्रम में कुछ बहनें ऐसी थीं जिन्होंने कई सालों से पैसों का स्पर्श ही नहीं किया था।
वर्तमान परावलंबी समाज रचना के कारण पैसा विनिमय का साधन बना है। इस संदर्भ में विनोबा ने कहा है जैसे किसान परावलंबी है। इसलिए पैसे को प्रतिष्ठा मान बैठा है वैसे ही हमारी सरकार भी परावलंबी यानी परदेशावलंबी बनी है। वह भी पैसे को ही प्रतिष्ठा मान बैठी है। सरकार के सामने यह समस्या रहती है कि परदेस से फलां-फलां सामान हमें चाहिए और उसे खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तो जिस मोहपाश में किसान फंसा हुआ है उसी मोहपाश में सरकार भी फंसी है। व्यापारी तो उसमें फंसे हुए हैं ही। मध्यमवर्गीय, समाज जो कुछ उत्पादन नहीं करते वे तो पैसे रूपी पानी की मछलियां हैं। नतीजा यह हुआ है कि क्या व्यापारी, क्या मध्यमवर्ग और क्या किसान यानी जनता और सरकार, चारों मिलकर पैसे का गुणगान कर रहे हैं।
एक दिन यशोदा ने कृष्ण से कहा कि मक्खन को मथुरा  में जाकर बेचना चाहिए। कृष्ण का जवाब था नहीं उसे गांव में ही खाना चाहिए। यशोदा बोलीं मथुरा में मक्खन बेचने से पैसा मिलेगा। तो कृष्ण बोले मथुरा में अगर पैसा है तो कंस भी है। मथुरा के पैसे का लोभ रखोगे तो कंस का राज्य भी मान्य करना पड़ेगा। इसीलिये पैसे से मुक्त होकर गांव-गांव में ग्रामस्वराज्य स्थापित करना चाहिए।
विनोबा ने ब्याजखोरी के बारे में कहा है कि ‘ब्याज को आज व्यापार में मान्य किया गया है। आज की मान्यता के अनुसार इतना ही कह सकते हैं कि अतिरिक्त ब्याज नहीं। इस मान्यता पर पुनर्विचार होना चाहिए। इस्लाम ने ब्याज का पूर्ण निषेध किया है। अगर ब्याज का निषेध हो जाये, तो संग्रह की मात्रा काफी घट जायेगी। कांचनमुक्ति जीव मूल्यों के परिवर्तन का प्रयोग है। हमको परिश्रम से निर्माण करना है और परस्पर सहकार से जीवन का नियमन करना है। इस तरह निर्माण और नियमन दोनों इस प्रयोग का हिस्सा हैं। चलन परिवर्तन पैसे में नहीं करना है। इसी से जीवन में नियमन दोनों इस प्रयोग का हिस्सा हैं। चलन का परिवर्तन पैसे से नहीं करना है। इसी से जीवन में नियमन आयेगा, लेकिन निर्माण पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। यह सिर्फ शब्दों की हेराफेरी नहीं है। यह तो अर्थविज्ञान या अर्थनीति का बुनियादी सिद्धांत है।
महाराष्ट्र के कॉकण जिले के गांधी के नाम से प्रसिद्ध अप्पासाहब पटवर्धन जो महात्मा गांधी के सचिव भी रहे थे के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत की प्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा योजना आयोग के अध्यक्ष धनंजय राव गाडगिल ने भी सराहना की थी और कहा था कि वह सिद्धांत इतना दूरगामी हैं कि वह हमें आज पसंद नहीं आयेगा। लेकिन इसका मूल्य हम पांच सौ साल के बाद समझ सकेंगे। नकद पैसे की खोज के पहले वस्तु नियमन (बार्टर) की पद्धति उपयोग में लाई जाती थी। फिर ‘चलन’ में पैसा और नोटों का आविष्कार हुआ। जिनका संग्रह किया जा सकता है। ईश्वर निर्मित सम्पत्ति नश्वर और मानव निर्मित पैसा ‘अमर’। यह उल्टा न्याय प्रस्तापित हुआ। इसी के कारण ब्याज और डिवीडेंड को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। यह सिद्धांत अव्यवहारिक या हास्यास्पद  लग सकता है लेकिन यही हमारे संविधान के उद्देशिका की आर्थिक समता के तत्व के अनुकूल है। इसी के कारण सामाजिक विषमता समाप्त करने में मदद मिलेगी। वैसे भी किसी प्रकार का उत्पादन या परिश्रम न करते हुए ब्याज और डिविडेंड पर आधारित अर्थशास्त्र सिर्फ स्वार्थशास्त्र या अनर्थशास्त्र ही नहीं है बल्कि वह तो शोषण पर आधारित विपत्तिशास्त्र है। आज तो एक की विपत्ति दूसरों को संपत्ति कमाने का सुअवसर देती है। गांधी जी ने जब नमक-सत्याग्रह शुरू किया था तब उन्हें मूर्ख और पागल ही कहा गया था। लोग मानते थे कि मुट्ठी भर नमक उठाने से अंग्रेज साम्राज्य कैसे खत्म हो सकेगा? लेकिन वह सत्याग्रह अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने का प्रथम तथा सशक्त कदम साबित हुआ। जो इस तरह के प्रयोग नहीं करते वे परिवर्तन करने में भी कामयाब नहीं होते। विचारपूर्वक कदम उठाना ही आज के युग की अनिवार्यता है।                                       (सप्रेस)

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

thirteen − 6 =

Open chat
1
आपको यह खबर अपने किसान मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। ऊपर दिए गए 'शेयर' बटन पर क्लिक करें।