करेले की उन्नत खेती से महासमुंद के किसान नारायण प्रसाद वर्मा ने कमाया प्रति एकड़ एक लाख से ज्यादा मुनाफा
29 सितंबर 2026, महासमुंद (छत्तीसगढ़): करेले की उन्नत खेती से महासमुंद के किसान नारायण प्रसाद वर्मा ने कमाया प्रति एकड़ एक लाख से ज्यादा मुनाफा – पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों को बदलकर आधुनिक तकनीक अपनाने का फायदा कैसे मिलता है, इसकी मिसाल पेश की है महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड के ग्राम टेंगराही के किसान नारायण प्रसाद वर्मा ने। उन्होंने करेले की उन्नत खेती करके प्रति एकड़ करीब 1.07 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया है।
नारायण प्रसाद के पास कुल 1.06 हेक्टेयर जमीन है, जिसमें से एक हेक्टेयर में उन्होंने करेले की खेती की। उन्होंने पानी की बचत के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाई और खेत में प्लास्टिक मल्चिंग शीट बिछाई, जिससे खरपतवार कम उगे और नमी बनी रहे। इसके साथ ही उन्होंने मचान विधि से बेल चढ़ाई, जिससे फल जमीन के सीधे संपर्क में नहीं आए और सड़न की समस्या कम हुई।
आधुनिक तकनीक से बढ़ी उत्पादन क्षमता
आधुनिक कृषि यंत्रों और वैज्ञानिक तरीकों के इस्तेमाल से नारायण प्रसाद के खेत में प्रति एकड़ करीब 12 टन करेले का उत्पादन हुआ। इस उपज को स्थानीय मंडी में अच्छे दाम पर बेचकर उन्होंने प्रति एकड़ 1.07 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसानों की तुलना में काफी अधिक है।
इस सफलता में राष्ट्रीय बागवानी मिशन 2025-26 के तहत मिली सरकारी सहायता की भी अहम भूमिका रही। किसान को ड्रिप सिंचाई व्यवस्था के लिए 24,000 रुपये का अनुदान मिला, वहीं बेल को सहारा देने वाली संरचना (सपोर्ट सिस्टम) के लिए अतिरिक्त 5,000 रुपये सीधे उनके बैंक खाते में डीबीटी के माध्यम से भेजे गए। जिला उद्यानिकी विभाग की टीम ने पूरी प्रक्रिया के दौरान तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया।
दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा
नारायण प्रसाद की सफलता की कहानी अब जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सब्जियों की खेती में आधुनिक तकनीक और सिंचाई प्रबंधन अपनाने से कम जमीन में भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है। जिला प्रशासन अब आसपास के गांवों के किसानों को भी करेले जैसी नकदी फसलों की उन्नत खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
पारंपरिक तरीके से करेले की खेती में किसान अक्सर बिना मल्चिंग के सीधे जमीन पर बेल फैलने देते हैं, जिससे फल मिट्टी के संपर्क में आकर खराब होने लगते हैं और सिंचाई का पानी भी असमान रूप से खर्च होता है। मचान विधि अपनाने से न सिर्फ फल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है, बल्कि तुड़ाई करना भी आसान हो जाता है, जिससे मजदूरी में लगने वाला समय भी कम होता है। ड्रिप सिंचाई से पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है, जिससे परंपरागत सिंचाई की तुलना में काफी कम पानी में ही बेहतर उत्पादन मिल जाता है।
बागबाहरा क्षेत्र में सब्जी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए जिला उद्यानिकी विभाग लगातार किसानों को प्रशिक्षण शिविरों के जरिए ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और उन्नत बीज किस्मों की जानकारी दे रहा है। विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में जिले के अधिकाधिक किसान नकदी सब्जी फसलों की ओर रुख करें, ताकि पारंपरिक धान की तुलना में उन्हें बेहतर और नियमित आमदनी मिल सके।
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