राज्य कृषि समाचार (State News)

ग्वालियर जिले में बेलर मशीन बना रही पराली के बंडल

भितरवार क्षेत्र में 100 एकड़ रकबे के बनाए बंडल

21 नवंबर 2025, भोपाल: ग्वालियर जिले में बेलर मशीन बना रही पराली के बंडल – ग्वालियर जिले में पराली प्रबंधन के लिये जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किसानों को अनुदान के आधार पर पराली प्रबंधन में कारगर बेलर, सुपर सीडर व हैपी सीडर उपलब्ध कराए गए हैं। जिले के विकासखंड भितरवार के अंतर्गत विभिन्न ग्रामों में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री सोजान सिंह रावत ने गाँव के किसानों की मौजूदगी में धान के खेतों में कटाई के बाद बेलर मशीन के माध्यम से पराली के बंडल बनवाकर दिखवाए।

भितरवार क्षेत्र में धान के खेतों में कटाई के बाद अब तक लगभग 100 एकड़ रकबे के पराली के बंडल बेलर मशीन के माध्यम से बनवाए जा चुके हैं। इस मौके पर बेलर मशीन से पराली हटाने के बाद खेतों में सुपर सीडर ,हैपी सीडर के जरिए पराली प्रबंधन की प्रक्रिया का प्रदर्शन भी कराया गया। कृषि अभियांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी कि बेलर मशीन से पराली हटाने के बाद खेतों में सुपर सीडर या हैपी सीडर का उपयोग करने से मिट्टी में नमी बनी रहती है। साथ ही कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता व गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। जाहिर है किसानों को कम लागत में अधिक पैदावार मिलती है। धान की कटाई के बाद बेलर मशीन का प्रदर्शन देखने आए भितरवार क्षेत्र के किसानों को बताया गया कि आसपास के 10 किलोमीटर के दायरे में वर्तमान में 4 बेलर यूनिट कार्यरत हैं। इन बेलर के माध्यम से अब तक लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में पराली के बंडल बनाए जा चुके हैं।

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जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री रावत ने इस मौके पर किसानों का आह्वान किया कि वे अनुदान का लाभ उठाकर बेलर मशीन अवश्य खरीदें। इससे किसान भाई स्वयं के खेत में तो पराली प्रबंधन करने के साथ-साथ दूसरों के खेतों में बेलर मशीन चलाकर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर सकेंगे। पराली जलाने से घट जाती है पैदावार जिले के किसानों से अपील की गई है कि वे अपने खेतों में पराली व नरवाई इत्यादि फसल अवशेष न जलाएं, इससे पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचती है। साथ ही खेत की मिट्टी के लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु मर जाते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से भूमि में अम्लीयता बढती है, जिससे मृदा को अत्यधिक क्षति पहुँचती है । सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता घटने लगती है एवं भूमि की जलधारण क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पडता है । इससे खेत की पैदावार घट जाती है।

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