कम पानी, ज्यादा मुनाफा: छत्तीसगढ़ के किसान ने धान छोड़ उगाए सूरजमुखी के फूल, 2-3 गुना तक बढ़ी आमदनी
12 अप्रैल 2026, रायपुर: कम पानी, ज्यादा मुनाफा: छत्तीसगढ़ के किसान ने धान छोड़ उगाए सूरजमुखी के फूल, 2-3 गुना तक बढ़ी आमदनी – छत्तीसगढ़ में ग्रीष्मकालीन धान के विकल्प के रूप में सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प बनकर उभर रही है। कम पानी में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफे के कारण किसान तेजी से इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। धान की तुलना में सूरजमुखी में पानी की आवश्यकता बहुत कम होती है, जिससे जल संरक्षण के साथ-साथ लागत भी घटती है। यही वजह है कि इसे 2-3 गुना तक अधिक लाभ देने वाली फसल माना जा रहा है और किसानों को इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इसी क्रम में कृषि विभाग द्वारा संचालित राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत बलौदाबाजार-भाठापारा जिले के विकासखंड सिमगा अंतर्गत ग्राम औरेंठी के कृषक आकाशदीप वर्मा और संजय वर्मा द्वारा 12 एकड़ क्षेत्र में सूरजमुखी की खेती की जा रही है। विभाग की ओर से उन्हें संकर बीज और अन्य आवश्यक कृषि आदान सामग्री उपलब्ध कराई गई है। किसानों ने बताया कि पिछले वर्ष उन्होंने ग्रीष्मकालीन धान की खेती की थी, लेकिन गिरते भूजल स्तर के कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। इस वर्ष सूरजमुखी की खेती अपनाने से कम पानी और कम लागत में बेहतर लाभ की संभावना बनी है।
उत्पादन और मुनाफे की बेहतर संभावना
कृषक आकाशदीप वर्मा के अनुसार सूरजमुखी की फसल वर्तमान में संतोषजनक स्थिति में है और प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल उत्पादन का अनुमान है। बाजार में सूरजमुखी बीज की मांग अच्छी होने के कारण किसान अपनी उपज को बेहतर दाम पर बेच सकते हैं। अनुमान है कि प्रति एकड़ 45 से 50 हजार रुपये तक शुद्ध आय प्राप्त हो सकती है, जो पारंपरिक धान की तुलना में अधिक है।
कम देखरेख और नुकसान की कम संभावना
किसान ने बताया कि सूरजमुखी की फसल को पशुओं और बंदरों से नुकसान नहीं होता, जिससे इसकी सुरक्षा आसान हो जाती है। साथ ही इसकी देखरेख में भी अपेक्षाकृत कम मेहनत लगती है। यह फसल लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे कम समय में आय प्राप्त करना संभव हो पाता है।
प्राकृतिक खेती और नवाचार से प्रेरणा
आकाशदीप वर्मा द्वारा सूरजमुखी की खेती के साथ-साथ पशुपालन भी किया जा रहा है। वे गोबर और गौमूत्र से जीवामृत, बीजामृत और घनजीवामृत जैसे उत्पाद तैयार कर प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं। उनके इस नवाचार से जिले के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहनी और तिलहनी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
कृषि विभाग की पहल और किसानों को सहयोग
उप संचालक कृषि ने बताया कि किसानों को दलहनी और तिलहनी फसलों की खेती के लिए उन्नत बीज, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण, फसल संरक्षण और पोषण संबंधी सलाह दी जा रही है। साथ ही विभिन्न शासकीय योजनाओं के तहत अनुदान का लाभ भी प्रदान किया जा रहा है। सूरजमुखी जैसी कम पानी वाली फसलों को अपनाने से फसल चक्र में विविधता आती है, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और कीट-रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
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