राज्य कृषि समाचार (State News)

धान-परती भूमि से समृद्धि की ओर: छत्तीसगढ़ में राई-सरसों खेती का उभरता अवसर

15 फरवरी 2026, रायपुर: धान-परती भूमि से समृद्धि की ओर: छत्तीसगढ़ में राई-सरसों खेती का उभरता अवसर – छत्तीसगढ़, जिसे “मध्य भारत का धान का कटोरा” कहते है, अपनी कृषि अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार के रूप में खरीफ धान पर निर्भर रहा है। धान न केवल राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि सरकारी खरीद व्यवस्था के माध्यम से किसानों को स्थिर आय भी प्रदान करता है।हालांकि, धान की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों जैसी तिलहन फसलें इस परती भूमि को उत्पादक बनाने में मदद कर सकती हैं।धान परती भूमि को उत्पादक बनाने के लिए राई-सरसों की खेती अपनाना कई लाभ प्रदान कर सकता है, जैसे-

  • किसानों की आय में वृद्धि
  • फसल सघनता में सुधार
  • खाद्य तेलों की आत्मनिर्भरता में योगदान
  • टिकाऊ कृषि को बढ़ावा

इस तरह का बदलाव न केवल छत्तीसगढ़ की कृषि संरचना में सुधार करके और उपजाऊ बना सकता है, बल्कि पूरे भारत को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।छत्तीसगढ़ का कुल कृषियोग्य क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 35% है। इस क्षेत्र का केवल 23% सिंचित है। यहाँ की प्रमुख मृदाएँ लाल और पीली हैं। राज्य में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1,190 मिमी है, जिसमें से लगभग 88% वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। राज्य की फसल सघनता लगभग 119% है और प्रमुख फसलों में धान, गेहूँ, मोटे अनाज, दलहन तथा तिलहन का उत्पादन होता है। छत्तीसगढ़ कृषि और जलवायु के दृष्टिकोण से तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित है:

  1. छत्तीसगढ़ मैदानी क्षेत्र
  2. बस्तर पठार
  3. उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र

राज्य की जलवायु मुख्यतः शुष्क उप-आर्द्र प्रकृति की है, जिसमें मध्यम शीतकालीन तापमान और स्पष्ट मानसूनोत्तर मौसम देखा जाता है। यह जलवायु रबी तिलहन फसलों के लिए विशेष रूप से अनुकूल है, बशर्ते खरीफ मौसम के बाद मृदा में शेष नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। इस प्रकार, धान कटाई के बाद खाली रह जाने वाली भूमि में राई-सरसों की खेती न केवल किसानों के लिए नई आय का स्रोत बन सकती है, बल्कि राज्य और देश की कृषि एवं खाद्य सुरक्षारणनीति में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

धान का प्रभुत्व और परती भूमि की चुनौती

छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जो मुख्यतः वर्षा आधारित परिस्थितियों में ऊँचे भूभाग और निचले क्षेत्रों में फैली है। राज्य का धान उत्पादन लगभग 9.8मिलियन टन है। खरीफ ऋतु में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है,  लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है।धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32% भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद लगभग 40–60% खेतपरती रह जाते हैं, मुख्यत: वर्षा आधारित ऊँचे क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों में।

भूमि के परती रहने के प्रमुख कारण हैं:

  • मानसून के बाद मिट्टी की नमी का तेजी से कम हो जाना।
  • निचले तल क्षेत्रों में जलभराव की समस्या।
  • लंबी अवधि वाली धान किस्मों की देर से कटाई
  • अल्पावधि वाली किस्मों तिलहन व दलहन के बीजो की कमी
  • आवारा पशुओं द्वारा नुकसान
  • किसानो की सीमित तकनीकी जानकारी और जोखिम न ले पाना

यह अनुमान है कि, खरीफ धान क्षेत्र का लगभग 50% भाग रबी मौसम में परती रह जाता है, जो की फसल विविधीकरण के लिए बहुत अच्छा है।

राई-सरसों: धान परती भूमि के लिए रणनीतिक विकल्प

रबी फसलों में राई-सरसों धान परती भूमि के लिए सबसे उपयुक्त फसल के रूप में उभर रही है। क्योंकि इसे कम पानी में उगाया जा सकता है, अल्प अवधि में पक जाती है और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में अनुकूलन क्षमता रखती है।भारत में राई-सरसों देश की सबसे महत्वपूर्ण तिलहन फसलों में से एक है, जो कुल तिलहन क्षेत्रफल का 30% है, और कुल उत्पादन का 33% योगदान देती है। वर्ष 2023–24 में भारत में इसका उत्पादन लगभग 13.2 मिलियन टन रहा, जिससे यह देश की मुख्य तिलहन फसल बन गई राई-सरसों की कई जैविक और कृषि संबंधी विशेषताएँ इसे छत्तीसगढ़ के धान परती भूमि के लिए आदर्श बनाती हैं:

राई-सरसों की विशेषताएँ:

  • मृदा की शेष नमी का कुशल उपयोग: सरसों बिना सिंचाई या सीमित नमी में भी उगाई जा सकती है।
  • कम अवधि की फसल: अधिकांश किस्में 90–120 दिनों में पक जाती हैं। जो धान की कटाई के बाद उपयुक्त है।
  • जलवायु सहनशीलता: सरसों मध्यम सूखे और तापमान में उतार-चढ़ाव सहन कर सकती है।
  • बाजार मांग: सरसों का तेल पूर्वी और मध्य भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, जिससे  तेल की स्थिर मांग और मूल्य स्थिरता बनी रहती है।

राई-सरसों छत्तीसगढ़ की धान-परती पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत उपयुक्त फसल है।

फसल बुवाई की अवधि नवंबर के दुसरे पखवाड़े से लेकर दिसंबर के पहले सप्ताह तक होती  है, जो 25–30°C के अनुकुलित शीतकालीन तापमान के लिए उपयुक्त है। यह तापमान राई-सरसों तथा तोरिया की वृद्धि और विकास के लिए आदर्श है। कम पानी और कम लागत वाली फसल होने के कारण राई-सरसों को अन्य अनाज फसलों की तुलना में बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसे धान की कटाई के तुरंत बाद शून्य जुताई (जीरो टिलेज) या न्यूनतम जुताई के साथ सफलतापूर्वक बोया जा सकता है। इसकी 90–120 दिनों की अल्प अवधि इसे खरीफ के बाद नमी रहित या कम नमी वाले खेतों में बिना फसल चक्र को प्रभावित किए आसानी से समायोजित होने की सुविधा देती है। इसके अतिरिक्त, चना के साथ एकल या मिश्रित फसल के रूप इसका उत्पादन संभव है।

आर्थिक दृष्टि से भी राई-सरसों किसानों के लिए स्पष्ट लाभ प्रदान करती है। इसकी खेती की लागत अपेक्षाकृत कम है और आकर्षक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से मूल्य समर्थन सुनिश्चित होता है। वर्तमान में राज्य में राई-सरसों का सीमित क्षेत्रफल लगभग 31,000 हेक्टेयर है, जिसमें लगभग 17,260 टन उत्पादन और 563 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता दर्ज की गई है। राई-सरसों की लाभप्रदता और अनुकूलन क्षमता धान-परती क्षेत्रों में इसके व्यापक विस्तार की प्रबल संभावनाओं को दर्शाती है। अनुसंधान परीक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि उन्नत राई-सरसों उत्पादन तकनीकों को अपनाने से पारंपरिक किसान पद्धतियों की तुलना में धान-परती परिस्थितियों में 20% से अधिक उपज वृद्धि संभव है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की भूमिका

अखिल भारतीय समन्वित राई-सरसों अनुसंधान परियोजना– (AICRP-RM) के माध्यम से उच्च उत्पादकता एवं रोग-प्रतिरोधी किस्मों के विकास और प्रसार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, धान-परती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त शून्य जुताई (ज़ीरो टिलेज) तकनीकों को बढ़ावा देने के साथ विविध कृषि-पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु-सहिष्णु किस्मों की पहचान करके उत्पादन को बढाना आईसीएआर के प्रमुख उद्देश्य हैं।इन प्रयासों को अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन) और व्यापक किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों द्वारा सुदृढ़ किया जाता है, ताकि खेत स्तर पर तकनीकों को शीघ्र अपनाया जा सके। साथ ही AICRP-RM के अंतर्गत छत्तीसगढ़ (कृषि-जलवायु क्षेत्र–V) के लिए देरी से बुवाई की परिस्थितियों में उपयुक्त तथा उच्च उत्पादन एवं उत्पादकता वाली विभिन्न किस्मों का विकास किया गया है।

उपयुक्त किस्में:

किस्म का नामअधिसूचना वर्षपरिपक्वता (दिन)औसत उपज (किग्रा/हे.)तेल प्रतिशत (%)
छत्तीसगढ़ सरसों2010120115039
टीबीएम-2092019112165041
एनआरसीएचबी-1012009115145040
डीआरएमआर 150-352020110150040
बीबीएम-12022115160041

आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर की पहल

धान-परती भूमि को उत्पादक बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान –राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थागत हस्तक्षेपों के माध्यम से उल्लेखनीय पहल की है। विशेष रूप से एससीएसपी (SCSP) और टीएसपी (TSP) योजनाओं के अंतर्गत आयोजित प्रदर्शनों ने यह सिद्ध किया है कि राई-सरसों की उन्नत किस्में धान-परती क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त और लाभकारी विकल्प बन सकती हैं। आईसीएआर-एनआईबीएसएम ने पिछले तीन वर्षों से संस्थान में खेत-स्तर पर संभावित राई-सरसों किस्मों का व्यवस्थित मूल्यांकन किया गया। इन परीक्षणों में डीआरएमआर-150-35 किस्म ने अत्यंत उत्साहजनक परिणाम दिए।यह किस्म 95–110 दिनों में परिपक्व हो जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है।

विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि एफिड (चैंपा) को छोड़कर प्रमुख कीट एवं रोगों का कोई गंभीर प्रकोप नहीं देखा गया। यह इसकी जैविक तनाव सहनशीलता और स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किस्मों को अपनाकर किसान कम जोखिम में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

आर्थिक लाभ और आजीविका सुरक्षा

धान-परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई प्रणाली के अंतर्गत राई-सरसों की खेती से 8–14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। अल्प अवधि में प्रति हेक्टेयर ₹27,000 से अधिक का शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जो खरीफ फसल पर निर्भर रहते हैं, राई-सरसों की खेती कई दृष्टियों से लाभकारी सिद्ध हो रही है-

  • रबी मौसम में अतिरिक्त आय का स्रोत
  • फसल प्रणाली का विविधीकरण
  • ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर
  • फसल विफलता की स्थिति में वित्तीय जोखिम में कमी

आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान के निदेशक एवं पूर्व निदेशक, आईसीएआर–भारतीय राई-सरसों अनुसंधान संस्थान, डॉ. पी. के. राय तथा संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा, जो असम में राई-सरसों क्षेत्र विस्तार हेतु विश्व बैंक समर्थित असम एग्रीबिजनेस एंड रूरल ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट (APART) के सफल क्रियान्वयन में मुख्य सलाहकार एवं प्रमुख विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं, ने बल देकर कहा कि छत्तीसगढ़ के धान-परती क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती को उन्नत किस्मों के व्यापक प्रसार, शून्य जुताई एवं नमी संरक्षण तकनीकों के प्रोत्साहन से तथा समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्धता सुनिश्चित करने के माध्यम से बड़े स्तर  पर विस्तारित किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि, छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती करने से किसानो को त्रिस्तरीय लाभ प्रदान करती है जैसे —किसानों की आय में वृद्धि, धान-परती भूमि का बेहतर उपयोग तथा राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उपयुक्त किस्मों, आईसीएआर के सशक्त तकनीकी सहयोग और अनुकूल नीतिगत समर्थन के साथ, धान कटाई के बाद परती रहने वाले खेतों को उत्पादक और लाभकारी कृषि परिदृश्य में परिवर्तित किया जा सकता है।

निष्कर्ष: “धान-परती” से “कृषि का सोना” तक

छत्तीसगढ़ के विशाल धान-परती क्षेत्र वास्तव में एक छिपा हुआ कृषि खजाना हैं। राई-सरसों की वैज्ञानिक खेती इन अनुपयोगी भूमि को उत्पादक संपत्ति में परिवर्तित करने का व्यावहारिक, आर्थिक रूप से लाभकारी और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ समाधान प्रस्तुत करती है।मजबूत नीतिगत समर्थन, तकनीकी नवाचार और किसानों की सक्रिय भागीदारी के साथ राई-सरसों की खेती छत्तीसगढ़ में कृषि समृद्धि के नए युग की शुरुआत कर सकती है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य तेल सुरक्षा टिकाऊ कृषि पद्धतियों और पोषण सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।

वास्तव में, सही रणनीति तकनीकी नवाचार और किसानों की सक्रिय भागीदारी के साथ राई-सरसों की खेती छत्तीसगढ़ में कृषि समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत कर सकती है तथा किसानो और वैज्ञानिको के सामूहिक प्रयासों से धान-परती भूमि को “कृषि का सोना” बनाया जा सकता है।

खाद्य तेल उद्योगों को प्रोत्साहन

धान-परती क्षेत्रों में राई-सरसों के विस्तार से स्थानीय तेल प्रसंस्करण उद्योगों के लिए मजबूत मांग उत्पन्न होगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे और मध्यम स्तर के ऑयल एक्सपेलर एवं रिफाइनिंग इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा मिलेगा। स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं (वैल्यू चेन) के विकास से ग्रामीण उद्यमिता और कृषि-औद्योगिक प्रगति को नई गति मिल सकती है।

मधुमक्खी पालन (Apiculture)

धान-परती क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती के विस्तार से मधुमक्खी पालन के लिए एक मजबूत आधार तैयार होगा, क्योंकि ये फसलें रबी मौसम में अच्छा नेक्टर (nectar) और परागकण प्रदान करती हैं। इससे सहायक उद्यम के रूप में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा मिलेगा, जो ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और छोटे किसानों के लिए रोजगार सृजित करेगा। परागण में वृद्धि से फसलों की उपज और गुणवत्ता में भी सुधार होगा। यह एक समग्र प्रणाली न केवल आजीविका को सुदृढ़ करेगी, बल्कि पारिस्थितिकीय स्थिरता को भी समर्थन देगी।

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