किसानों को हवाई सपने दिखाती सरकार

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म.प्र. में सत्तासीन होने के लिए कांग्रेस ने किसानों से ढेर सारे वायदे किये थे परंतु सत्ताशीर्ष पर विराजमान होने के लगभग ग्यारह महीने बाद भी उन वायदों/आश्वासनों की क्रियान्वयन के स्तर पर परिणति का आकलन करें तो यही कहा जा सकता है- कसमे वादे प्यार वफा सब वादे हैं वादों का क्या ? 

चुनाव के समय कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने सत्ता में आने पर दस दिन में दो लाख रू. तक किसानों के कर्ज माफी का वायदा किया था परंतु 21 लाख किसानों का पचास हजार रू. तक का कर्ज माफ हुआ। शेष लगभग तीस लाख किसानों का कर्ज माफ करने के लिये राज्य सरकार के खजाने में रूपये ही नहीं हैं। ऋण चुकाने में असमर्थ किसानों के खातों में धनराशि वसूली के लिये बैंक दंड ब्याज वसूल रहे हैं जो कि सहकारी बैंकिंग के अंतर्गत चौदह प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से आरोपित किया जा रहा है। ऐसे किसानों को फसल बीमा योजना के दायरे से बाहर रखा गया और उन्हें सोसायटी से नया ऋण खाद-बीज भी नहीं मिल रहा है बोनस राशि भी नहीं मिली।

बोनस लापता : मुख्यमंत्री ने किसानों को गेंहू की सरकारी खरीद पर एक सौ साठ रू. प्रति क्विंटल बोनस राशि देने की घोषणा की थी। प्रदेश के लगभग 55 लाख किसानों को 1453 करोड़ रू. की बोनस राशि वितरित होनी है परंतु इस मद में भी किसानों को अभी तक फूटी पाई नहीं मिली है अतिवर्षा से प्रभावित खरीफ फसलों की भी राजस्व परिपत्र के आधार पर कोई क्षतिपूर्ति राशि नहीं मिली है पिछले वर्ष शासन द्वारा क्रय की गई सोयाबीन पर भी 500 रू. प्रति क्विंटल की बोनस राशि नहीं मिली है। प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं का बार-बार यही कहना है कि केंद्र शासन प्रदेश से असहयोग कर रही है, किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति राशि नहीं दे रहा है। राज्य शासन का कोई भी काम रूक नहीं रहा है। मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी लगातार विदेशी दौरे कर रहे हैं, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री भी नित नई लोक लुभावन घोषणायें, वायदे कर रहे हैं परंतु किसानों तक राशि पंहुचाने में बार-बार तरह-तरह की बहाने बाजी की जा रही है। इस वर्ष अतिवर्षा से पहले ही फसलें क्षतिग्रस्त होने से किसान परेशान है और राजनैतिक रस्साकशी तथा शासन के खाली खजाने से किसान अभावग्रस्त जीवन जीने को लाचार है। 

पंप योजना बंद : इस वर्ष जून माह के बाद से किसानों को सिंचाई हेतु नये विद्युत कनेक्शन नहीं दिये जा रहे हैं। मुख्यमंत्री सिंचाई पंप विद्युत कनेक्शन अनुदान योजना बंद है। पिछले वर्ष तक पांच हार्सपावर के विद्युत कनेक्शन के लिए इस योजना में किसान का अंशदान लगभग 72 हजार रू. लिया जाता था जो इस योजना के अभाव में लगभग एक लाख पचास हजार तक पंहुच गया है। सोलर पंप सिंचाई योजना के अंतर्गत पिछले वर्ष तक 80 प्रतिशत तक राज सहायता मिलती थी, इस वर्ष इस योजना का अभी तक अता पता तक नहीं है। टेलीविजन पर इस योजना के विज्ञापन तो राज्य शासन द्वारा प्रसारित करवाये जा रहे हैं परंतु जमीनी स्तर पर इस योजना के क्रियान्वयन के कोई प्रमाण नहीं है।  

गौशाला बदहाल: आवारा गौ पशुओं से किसानों को छुटकारा दिलाने के लिये शासन ने हर पंचायत में गौशाला खोलने की घोषणा की थी बाद में सिमट कर एक हजार गौशाला खोलने तक सीमित हो गई उसमें भी करोड़ों रूपये की लागत की हाईटेक गौशालायें खोलने का सपना दिखाया गया परंतु अभी तक एक भी गौशाला खुल नहीं पाई है और रही बात सरपंचों के भरोसे गौशाला चलाने की तो पिछले दिनों की दिल दहलाने वाली घटना अभी तक भी विस्मृत नहीं हुई है जहां एक सरपंच ने लावारिस गौवंश को सरकारी स्कूल के एक कमरे में बंद कर दिया था व भूख-प्यास से तड़पकर सभी गायें मर गई थी। मृत गौवंश के शव सडऩे पर इससे फैली दुर्गंध से इस वाकये का पता लगा। प्रदेश में पशुओं की घर पंहुच मुफ्त इलाज की सुविधा राज्य शासन द्वारा बंद की जा चुकी है और अब चिकित्सक के आने पर फीस देना होगी। इसी प्रकार सिंचाई के लिए दिये जाने वाले पानी पर भी शुल्क बढ़ाने की तैयारी है। बचपन में ढपोरशंख की एक कहानी अभी भी याद है जिसमें ढपोरशंख जितना मांगों उससे दुगना देने का वादा करता था परंतु असल में देता कुछ भी नहीं था। कुछ इसी तर्ज पर राज्य शासन द्वारा किसानों के हित में दिये जाने वाले आश्वासन भी क्रियान्वयन के स्तर पर मात्र दिल बहलाने वाले ढपोरशंखी हवा-हवाई आश्वासन ही प्रतीत हो रहे हैं। प्रदेश का किसान केवल आश्वासनों के सहारे आधे पेट जीने को विवश हैं।

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