क्रॉपलाइफ इंडिया ने ‘मिथक बनाम तथ्य’ स्पष्टीकरण जारी किया
18 मार्च 2026, नई दिल्ली: क्रॉपलाइफ इंडिया ने ‘मिथक बनाम तथ्य’ स्पष्टीकरण जारी किया – क्रॉपलाइफ इंडिया ने आज कीटनाशकों पर ‘मिथक बनाम तथ्य’ स्पष्टीकरण जारी किया। संगठन ने कहा कि खाद्य अवशेष, पर्यावरणीय जोखिम और उत्पाद सुरक्षा को लेकर बढ़ती सार्वजनिक चिंताओं के बीच फसल संरक्षण के बारे में कई गलतफहमियां फैल रही हैं। दुरुपयोग की चिंताएं जायज हैं, लेकिन ये अफवाहें किसानों की असली मुश्किलों को छिपा देती हैं।
भारत में कृषि 9.3 करोड़ से अधिक परिवारों और लगभग 15 करोड़ किसानों की आजीविका का आधार है। यह देश की कार्यबल का करीब 46% हिस्सा है और जीडीपी में 16-18% योगदान देता है। सरकार के अनुमान के मुताबिक, कीट और रोग हर साल फसलों को 10-35% तक नुकसान पहुंचाते हैं। गंभीर प्रकोप में यह नुकसान और भी ज्यादा हो जाता है। फिर भी भारत प्रति हेक्टेयर कीटनाशक का सबसे कम इस्तेमाल करने वाले देशों में शामिल है। यहां किसान औसतन 0.3-0.6 किलो प्रति हेक्टेयर लगाते हैं, जबकि कई यूरोपीय देशों में 2-4 किलो, चीन में करीब 13 किलो और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में 10 किलो से ज्यादा। क्रॉपलाइफ इंडिया, जो प्रमुख रिसर्च-आधारित फसल विज्ञान कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती है, ने कहा कि फसल संरक्षण पर चर्चा इन हकीकतों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। साथ ही जिम्मेदार इस्तेमाल, किसान जागरूकता और मजबूत नियामक निगरानी पर भी जोर दिया जाना चाहिए।
क्रॉपलाइफ इंडिया के महासचिव श्री दुर्गेश चंद्रा ने कहा, “इस स्पष्टीकरण का मकसद कीटनाशकों पर संतुलित और तथ्य-आधारित बातचीत को बढ़ावा देना है। ये उत्पाद फसलों को कीटों-रोगों से बचाते हैं और किसानों को अच्छी पैदावार दिलाने में मदद करते हैं। उद्योग जिम्मेदार इस्तेमाल, स्टीवार्डशिप और भारत के सख्त नियमों का पूरा समर्थन करता है।”
संगठन ने बताया कि कीटनाशकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल या कोई नियंत्रण न होने जैसी गलतफहमियां भारत के कम उपयोग स्तर और उत्पाद मंजूरी की व्यवस्थित प्रक्रिया को नजरअंदाज करती हैं। यह स्पष्टीकरण वैज्ञानिक सबूतों और सरकारी आंकड़ों के आधार पर कीटनाशक सुरक्षा, अवशेष प्रबंधन, पर्यावरण प्रभाव और नियामक ढांचे से जुड़े मुद्दों को आसान भाषा में समझाता है। क्रॉपलाइफ इंडिया ने जोर दिया कि किसान प्रशिक्षण, बेहतर इस्तेमाल की प्रथाएं और लगातार नियामक निगरानी से ही सुरक्षित और प्रभावी फसल संरक्षण संभव है। संगठन ने किसानों का साथ देने, अच्छे तरीके सिखाने और भारत में सतत खेती को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है ।
मिथक बनाम तथ्य – आसान भाषा में
मिथक: कीटनाशक कैंसर का कारण बनते हैं। तथ्य: भारत में हर कीटनाशक को इस्तेमाल से पहले सरकार सख्ती से जांचती है। केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (CIB&RC) स्वास्थ्य जोखिम, पर्यावरण प्रभाव और खाद्य अवशेषों की जांच करती है। सही लेबल निर्देशों और तय सीमा में इस्तेमाल करने पर उपभोक्ताओं में कैंसर का जोखिम नहीं बढ़ता। किसानों को लेबल पढ़ना, सुरक्षा उपकरण (मास्क, दस्ताने) पहनना और ट्रेनिंग लेनी चाहिए – इससे जोखिम बहुत कम हो जाता है।
मिथक: कीटनाशक कभी खत्म नहीं होते। तथ्य: आजकल के ज्यादातर कीटनाशक मिट्टी और पानी में जल्दी टूट जाते हैं। यह उत्पाद, मिट्टी की स्थिति और मौसम पर निर्भर करता है। लेबल पर सही मात्रा और कटाई से पहले प्रतीक्षा अवधि साफ लिखी होती है।
मिथक: सारे कीटनाशक शुद्ध जहर हैं। तथ्य: हर उत्पाद की विषाक्तता अलग-अलग होती है। सबकी अलग जांच होती है और अलग सुरक्षा श्रेणी में रखा जाता है। लेबल पर सुरक्षित मात्रा, इस्तेमाल का तरीका और इंतजार समय स्पष्ट लिखा रहता है।
मिथक: जैविक खेती में कोई केमिकल नहीं होता। तथ्य: जैविक खेती में भी कुछ अनुमोदित कीटनाशक इस्तेमाल होते हैं – जैसे नीम का अर्क और पाइरेथ्रम। प्राकृतिक हो या सिंथेटिक, दोनों को सुरक्षा जांच पास करनी पड़ती है।
मिथक: कीटनाशक अच्छे कीड़ों को मार देते हैं। तथ्य: अब किसान समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाते हैं – जिसमें जैविक नियंत्रण, निगरानी और जरूरत पड़ने पर ही लक्षित कीटनाशक। सही समय और मात्रा में इस्तेमाल करने पर मधुमक्खी और फायदेमंद कीड़ों को कम नुकसान होता है।
मिथक: खाने में रसायन बचे तो खतरा है। तथ्य: भारत का खाद्य नियामक (FSSAI) अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) तय करता है। 2022-2025 में 86,000 से ज्यादा खाद्य सैंपल जांचे गए – लगभग 97% सीमा के अंदर मिले। धोने, छीलने और पकाने से अवशेष और कम हो जाते हैं।
मिथक: भूजल पूरी तरह खराब हो जाएगा। तथ्य: पर्यावरण पर असर ज्यादातर इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है। कई कीटनाशक मिट्टी से मजबूती से जुड़ जाते हैं, भूजल तक नहीं पहुंचते। ज्यादा मात्रा या गलत इस्तेमाल से ही समस्या होती है।
मिथक: बिना कीटनाशक के खेती हो सकती है। तथ्य: फसल संरक्षण के बिना कीट प्रकोप से 30-50% तक उपज खराब हो सकती है। इससे किसानों की कमाई घटती है और देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।
मिथक: किसान कीटनाशकों से जहर खा जाते हैं। तथ्य: सुरक्षित इस्तेमाल जरूरी है। सुरक्षा उपकरण, उचित ट्रेनिंग और लेबल के अनुसार इस्तेमाल से जोखिम बहुत कम हो जाता है।
मिथक: उद्योग सच्चाई छुपाता है। तथ्य: मंजूरी के लिए कंपनियां स्वास्थ्य, पर्यावरण और अवशेषों पर पूरी जानकारी देती हैं। नियामक सब जांच के बाद ही उत्पाद को हरी झंडी देते हैं। यह स्पष्टीकरण किसानों की वास्तविक चुनौतियों को समझते हुए जिम्मेदार फसल संरक्षण को बढ़ावा देने की कोशिश है।
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