सब्जी की जैविक खेती में बीज उपचार महत्वपूर्ण

व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें

बीज शोधन क्यों जरूरी है –
हमारे देश में फसल का लगभग 35-50 प्रतिशत प्रतिवर्ष रोगों अथवा कीटों के कारण नष्ट हो जाता है। यह यह रोगाणु की बाहरी सतह पर अथवा बीज के भीतर अथवा मृदा में सूखी पत्तियों या जड़ों के अवशेष पर सुषुप्तवस्था में रहते हैं और बुवाई के पश्चात से ही नई फसल को नष्ट करते हैं। जिसने न केवल बीज का जमाव कम होता है, परन्तु किसान भाइयों को आर्थिक हानि होती है, और इससे संपत्ति की भी हानी होती है। इसलिए ये अवश्यक है कि भरपूर स्वस्थ उत्पाद खेती से पाने के लिए केवल बीज विकसित एवं उन्नतिशील प्रजाति का होना अवश्यक है, परन्तु वह रोग कारकों से भी रहित होना चाहिए। एक कहावत बहुत मशहूर है- जैसा बोओगे वैसा काटोगे

बीज शोधन से लाभ-

  • इससे बीज कि सडऩ कम होती है।
  • बीज की सतह पर रसायन उसके इर्द-गिर्द की मिट्टी में मौजूद रोग कारकों/ कीटों आदि को नष्ट कर देता है ।
  • बीज का जमाव अच्छा व समान प्रकार से होता है। जब बीज सडऩे से बच जाता है। तब पौधा स्वस्थ होता है। और बीज अंकुरण की संख्या में इजाफा होता है।
  • बीज से फैलने वाली बीमारियाँ कम हो जाती हंै।
  • फसल मजबूत व स्वस्थ होती है और पैदावार में वृद्धि होती है। किसानों को आर्थिक लाभ होता है।
  • मिट्टी में रहने वाले पोषक तत्व घुलनशील बनते हैं।
  • इससे वायुमंडल में नाइट्रोजन की स्थिरीकरण होता है।
  • उर्वरकता व उत्पादकता बढ़ता है।
  • पर्यावरण प्रदूषण कम होता है।

बीज शोधन का उद्देश्य –
मृदा में बीज द्वारा बीज जनित रोगों को शोधित कर बीज एवं मृदा में पाये जाने वाले बीमारियों के रोगाणुओं को नष्ट करना होता है। इसके अतिरिक्त मिट्टी में पाये जाने वाले रोगाणुओं के संक्रमण के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।

बीज शोधन का महत्व –
फसल की पौध अवस्था में लागने वाले रोग जैसे- उकठा आद्र्रपतन, पौधगलन, सडऩ, पदगलन आदि रोगों से छुटकारा मिलता है। कंडुवा आदि रोग जो फसल के पकने पर ही दिखाई देते हैं। उनका भी बीज शोधन से नियंत्रण किया जा सकता है। स्वस्थ फसल पाने के लिए बीज शोधन एक बहुत ही उपयोगी सस्ता, अच्छा, सरल और आवश्यक कदम है। इस विधि द्वारा कम स्थान, कम लागत अथवा कम मजदूरी में ही लाखो एकड़ में बोये जाने वाले बीज को उपचारित कर सकते हैं।

बीज शोधन की विधियां –

भौतिक संसाधनों द्वारा –
तृप्त जल उपचार द्वारा सबसे पहले बीज को साफ सुथरे व ठंडे पानी में 3-4 घंटे भिगो देते हैं फिर निश्चित तापमान (55-58 डिग्री) के जल में 10 मिनट के लिए डुबो देते हैं और भंडारण से पहले अच्छी तरह से सुखा लेते हैं, खुली धूप में। यदि यह उपचार बुवाई से पहले किया जा रहा हो तब हल्का सूखा कर बुवाई कर सकते हैं। जैसे गेंहुन का अनावृत कंडुवा रोग आदि- तृप्त, वायु, उपचार, विषैली गैस द्वारा धूमन, इरेडिएशान किरणों द्वारा भी बीज शोधन किया जा जाता है।

रसायनिक संसाधनों द्वारा-
बीज रक्षक रसायन जो बीज की बाहरी सतह पर पाये गए रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। जैसे- थीरम, और कर्बेंडाजिम (2.5 ग्राम/किग्रा. बीज) द्वारा उपचरित करने से बीज सडऩ, पौधगलन, आद्र्रपतन जैसी नर्सरी और पौधावस्था के रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है। एगलाल, कैप्टोन द्वारा गन्ने, आलू आदि के बीज को उपचरित करते हैं। 2.5 ग्राम उपयुक्त रसायन का घोल बनाकर बीज को 10 मिनट डुबोकर तथा सुखा कर बुवाई करना चाहिए। सर्वांगी करकना जैसे बीटावैक्स, वावेस्टिन 25 ग्राम से बीज उपचारित करने से भीतरी व बाहरी सतह पर पाये जाने वाले रोगाणु नष्ट हो जाते हैं ।

जैविक द्वारा बीज शोधन विधि-
आम तौर पर बीज उपचार एक से अधिक प्रकार से कवकनाशी तथा कीटनाशी द्वारा किया जाता है। इसके अलावा उर्वरक प्रबंधन के लिए राईजोबियम कल्चर द्वारा भी दलहनी फसलों के बीज को उपचारित करना लाभदायक होता है। इसके लिए क्रमानुसार एफआईआर का तरीका अपनाना चाहिए।

सावधानियाँ –

  • रसायनिक विधि में रसायन की निर्धारित मात्रा का ही उपयोग करना।
  • रसायनिक और जैविक विधि में से किसी एक विधि को ही अपनाना चाहिए।
  • जैव द्वारा उपचारित करने के पश्चात बीज को सूर्य कि गर्मी और सीधी धूप से बचाना चाहिए।
  • दीमक अथवा चींटी से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए 3 मिली/ किलोग्राम बीज कि दर से क्लोरोपायरीफॉस से उपचारित कए बोना चाहिए।
  • बायोएजेंट द्वारा उपचारित बीज को रसायन के साथ नहीं मिलाना चाहिए।
जैविक विधियों द्वारा बीज शोधन-
ट्राईकोडर्मा, स्यूडोमोनास, बैसिलस और राईज़ोबियम आदि जैविक रोगनाशियों द्वारा बीज उपचारित करना फसलों को मृदोढ़ फफूंदी जनित रोगों से बचाने का एक प्रभावी उपाय है। 4 ग्राम प्रति किलो कि दर से उपचारित करने के लिए केवल रोग की रोकथाम होती है, अपितु बीज का जमाव भी अच्छा होता है। इतना ही नही ट्राइकोडर्मा से एक स्राव भी निकलता है जिससे फसलों कि अच्छी बढ़वार भी होती है। परंतु ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे जैविक कीटनाशी उत्पाद अच्छी गुणवत्ता के होने आवश्यक हैं, तथा निर्माण तिथि और प्रयोग कर सकने की अंतिम तिथि देखकर ही प्रयोग करना चाहिए।
व्हाट्सएप या फेसबुक पर शेयर करने के लिए नीचे क्लिक करें
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 × four =

Open chat
1
आपको यह खबर अपने किसान मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। ऊपर दिए गए 'शेयर' बटन पर क्लिक करें।