एफपीओ- कृषि उपज व मार्केटिंग के लिए उम्मीद की किरण

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कृषि तथा ऐसी ही गतिविधियों से अपनी आजीविका कमाने वाले 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या वाला, भारत देश एक कृषि अर्थव्यवस्था वाला देश है। पिछले दो वर्षों में देश बीजों सहित खाद्यान्न उत्पादन की उत्तरोत्तर प्रगति का साक्षी रहा है। वर्ष 2017-18 में 316.14 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन तथा 314.79 मिलियन टन का अनुमानित उत्पादन। जबकि उत्पादन के इन स्तरों ने कई प्राइमरी फसलों में उत्पादन को घाटे के उत्पादन से अधिकता की ओर बढऩे में सहायता की है, साथ ही किसानों के लिए अलाभकर भावों की चुनौतियां भी खड़ी की हैं। ऐसी परिस्थिति में फॉर्म गेड स्तर पर कुछ कमियों को हटाने के लिए नये तरीकों के बारे में सोचना आवश्यक हो गया है।

हमारे किसान भाइयों में अधिक उत्पादन करने की क्षमता है मगर उचित आजीविका कमाना अब भी एक कठिन कार्य है। अपनी छोटी भूसंपदा से सीमित उपज उनकी मोलभाव करने के अधिकार को कम कर देती है तथा उन्हें गांव के एग्रेग्रेटर या स्थानीय मंडी में अपने उत्पादन बेचने पर मजबूर कर देती है। इनके साथ नकद की त्वरित आवश्यकता बिक्री निर्णयों को प्रभावित करती है तथा उनके मुनाफे को भी सीमित कर देती है।

इन समस्याओं से निपटने के लिए फॉर्मर प्रोड्यूसर कंपनी (एफपीसीओ) के रूप में फॉर्मर एसोसिएशंस एक अगले कदम के रूप में सोचा गया है। किसान की आय को दुगुनी करने तथा ‘मेक इन इंडिया’ में सार्थक अंशदान देने के सरकार के दूरदर्शी विचारों को पूरा करने में एफपीओ एक महत्वपूर्ण संबल के रूप में कार्य कर सकते हैं। खाद्यान्न संसाधन (फूड प्रोसेसिंग) के जरिए मूल्य-संवर्धन में आय तथा रोजगार निर्माण करते हुए किसानों की आजीविका को बढ़ाने की संभावना है। इसे पूरा करने के लिए एफपीओ को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए तथा उन्हें गांव, तहसील, जिला स्तर पर फूड प्रोसेसिंग इकाईयां स्थापित करने में सहायता दी जानी चाहिए, जिसके लिए प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना जैसी पॉलिसियां तैयार की जानी चाहिए और/या उपलब्ध करायी जानी चाहिए ताकि उसमें उनकी प्रतिभागिता सुनिश्चित की जा सके। सरकार द्वारा स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने, प्रशिक्षण और सपोर्ट तथा पर्याप्त मार्केटिंग गतिविधियों के जरिए खरीददारों से प्रोसेस्ड क्रॉप्स के लिए लगातार स्थानीय मांग सुनिश्चित की जानी चाहिए। 

किसानों को उनके कच्चे माल के लिए वैकल्पिक बाजार का पता लगाना यह दूसरी प्रमुख चुनौती है। एफपीओ किसानों की तरफ से उत्पादों को एकत्र करके उसे बड़े व्यापारियों, संसाधकों, निर्यातकर्ताओं या कोमोडिटी एक्सचेंज प्लेटफॉर्मों पर बिक्री के लिए उसे बड़े लॉट बनाते हुए इस समस्या के लिए समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। एग्रेग्रेटर के रूप में एफपीसीओ के जरिए किसानों के बाजार संयोजन से मार्केटिंग की लागत को कम किया जा सकता है और बेहतर भाव वसूली की जा सकती है। वित्तीय वर्ष 2019-20 के बजट में ऐसी और 10,000 कंपनियां निर्मित की जाएंगी।

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि एफपीसीओ द्वारा बेहतर भाव की वसूली के लिए किसानों से उत्पादों को प्राप्त करके उन्हें बड़े व्यापारियों तथा एग्रो प्रोसेसिंग कंपनियों को बेचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। 

इन कठिनाइयों को नाबार्ड, एसएफएसी जैसी सरकारी एजेंसियों ने अच्छी तरह से पहचाना है और इनसीडीईएक्स तथा अन्य जैसे एक्सचेंजों ने एफपीओ से आरंभिक प्रतिक्रिया से उर्जित होकर देशभर में जागरुकता तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों को आरंभ किया है। लाभकारी भाव के लिए वैकल्पिक बाजार स्थान का पता लगाने के लिए 13 राज्यों से 2,66,617 किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले 233 से अधिक एफपीओ एनसीडीईएक्स से संबद्ध जुड़े हुए हैं। अब उनके पास विकल्प है। बाजार की चुनौतियां हैं, परन्तु यदि उचित बाजार संयोजन वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता का निर्माण तथा भाव जोखिम को समझने के जरिए एफपीसीओ को सपोर्ट उपलब्ध कराया जाय तो, एफपीसी सही प्रकार का एग्रेग्रेटर बन सकता है जो फॉर्म गेट पर आर्थिक संतुलन ला सकता है और अपने लाभ को उनके शेयरधारक किसानों के साथ साझा कर सकता है। फॉर्म उत्पादों के एकत्रीकरण तथा एफपीसी माध्यम से सही बाजार का पता लगाने से भारत के छोटे किसान के लाभ को बढ़ाया जा सकता है। बाजार पहुंच में सहायक प्रशिक्षण और विकास में निवेश से पहचाने गये एफपीओ के 3 से 5 वर्ष के समय में एक अच्छी कारोबारी हस्ती बन सकने की संभावना है।

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