किसानों को सटीक खेती के बारे में कौन बताएगा ?

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  • शशिकांत त्रिवेदी,
    वरिष्ठ पत्रकार

26 अक्टूबर 2021, किसानों को सटीक खेती के बारे में कौन बताएगा ? – हाल ही में हुई बेमौसम बरसात ने मध्यप्रदेश के कई जिलों में फसलों को चौपट कर दिया। हो सकता है नकसान बहुत ज़्यादा न हो किसी सीमान्त किसान के पूरे परिवार के लिए ये किसी आपदा से कम नहीं है। कैबिनेट बैठक के एक फैसले में प्रदेश के किसानों को 15722 करोड़ रूपये बिजली सब्सिडी के रूप में देने का निर्णय भी शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने लिया है। साथ ही उन्होंने कहा कि बेमौसम बारिश से हुए नुकसान का सर्वे जल्द होगा। हाल में जम्मू और कश्मीर में कठुआ जिले के एक कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने कहा कि केंद्र ने कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 1,31,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है क्योंकि भारत में वैश्विक मांग को पूरा करने की जबरदस्त क्षमता है। मंत्री केंद्र के जनसंपर्क कार्यक्रम के तहत जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में थे। कुछ हाल की घोषणाओं में किसानों को सिंचित पानी उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए रू. 4,000 करोड़ का आवंटन 2022 तक कृषि आय को दोगुना करने के सरकार के महत्वाकांक्षी लक्ष्य का हिस्सा है।

पिछले कई सालों से भारत और विभिन्न राज्यों में खेती में निवेश, योजनाएं और किसानों के लिए सब्सिडी जैसी योजनाओं और वायदों को छोडक़र राजनीतिक दलों और सरकारी मातहतों के पास कुछ नया नहीं है। इन तमाम योजनाओं, निवेश और घोषणाओं के बाद भी भारत विश्व में भूख के हाल ही में जारी हुए सूचकांक में भारत नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे है। संभव है आँकड़े जुटाने का तरीका सही न हो, जैसा कि भारत सरकार ने इन्हे सिरे से खारिज किया है, भारत के किसान अभी भी बीज की कमी, नकली बीज, बेमौसम बरसात, पानी की कमी, खाद की कमी का सामना बरसों से कर रहे हैं और अब कुछ राज्यों में किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए नए कानूनों का विरोध कर रहे हैं जबकि सरकार इन कानूनों को किसानों का हितैषी बता रही है।

2020-21 के आर्थिक सर्वेक्षण में, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 19.9 प्रतिशत था। यह लगभग 2003-04 से लगभग स्थिर ही है।

भारत के कृषि क्षेत्र के आसपास रहने वाले मौजूदा राजनीतिक माहौल के बावजूद, पिछले एक सालो में तरह-तरह के निवेश और योजनाओं के बाद भी भारत में फसल उत्पादन में 2050 तक 60-100 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन क्या इन सालों से चली आ रही ढर्रेनुमा योजनाओं और इनके लिए आक्रामक तरीके से खेती करने से मसला हल हो जाएगा। शायद नहीं। भोजन की भविष्य की मांग को पूरा करने के लिए, डाटा पर भरोसा करने वाले वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कृषि व्यवसाय पर भरोसा कर रहे हैं। लेकिन क्या भारत सटीक क्षमता के लिए आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस या मशीनी अकल की शक्ति का उपयोग कर सकता है? सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन, वेब-जीआईएस फ्रेमवर्क, बिग डेटा, क्लाउड और मशीन लर्निंग से निकट भविष्य में जहाँ दुनिया कृषि उत्पादकता में सुधार की उम्मीद कर रही है, भारत की सरकारें सब्सिडी के अलावा कुछ सोच रही हैं ?

इंडियन जर्नल ऑफ फर्टिलाइजर्स के अनुसार, आज भारत में सटीक खेती करने की जरूरत है और उसके लिए जरूरी है सही वक्त पर किसानों के खेती के लिए सही मात्रा में सही राशि पर सही जगह पर खेती के लिए जरूरी सही सामान सही जगह पर मिल सके।

लेकिन इस तरह की सही खेती के लिए बड़ी मात्रा में डेटा जुटाने की आवश्यकता होती है। तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से पर्यावरणीय डेटा ने पहले से ही विकसित देशों में बेहतर कृषि तकनीकों को बढ़ावा दिया है। हालाँकि, यह कोई रहस्य नहीं है कि पर्यावरणीय डेटा व्याप्त हो गया है और भारतीय कृषि में सकारात्मक बदलाव ला रहा है मौसम, मिट्टी की नमी, मिट्टी का तापमान, उर्वरक दर, पानी का बहाव, और बारिश जैसी अनिश्चितताओं के मापने के जीपीएस जैसी आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से न केवल पर्यावरण का डेटा इकठ्ठा किया जा सकता है बल्कि फसल की उत्पादकता भी बढ़ाई जा सकती है।

ऐसी सटीक खेती के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) के साथ रिमोट सेंसिंग के उपयोग से बहुत कुछ सुधार किये जा सकते हैं। निजी क्षेत्र की कम्पनियां जैसा टाटा किसान केंद्र और फसल जैसी कंपनियां पहले से ही भारत में इन तकनीकों को लागू कर रही हैं। हाल ही में भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान ने गंगा कके मैदानों में अनाज आधारित प्रणाली में सटीक संरक्षण कृषि प्रथाओं का विकास किया। दो वर्षों के बाद, 2020 में पता चला कि इन परियोजना में लगभग 82 प्रतिशत पानी की बचत हुई है।

आजकल शोधकर्ता और वैज्ञानिकों ने मिट्टी पर काम करने के बजाय फसल सुधार की ओर रुख किया है। इसी तरह पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 2004-06 के दौरान ग्रीनसीकर ऑप्टिकल सेंसर का उपयोग करते हुए नाइट्रोजन उर्वरक के अनुप्रयोग के साथ-साथ इन-सीजन सेंसर प्रलेखन और गेहूं उत्पादन का निरीक्षण करने के लिए सात क्षेत्र प्रयोग किए। उन्होंने उच्च पैदावार और उर्वरक का अधिक कुशल उपयोग देखा। यह स्पष्ट है कि पर्यावरण डेटा, विश्लेषिकी और एआई के अनुप्रयोग के साथ, निश्चित रूप से वर्तमान मौन डेटा प्रबंधन में सुधार करेगा।

पर्यावरणीय डेटा वास्तविक समय के डैशबोर्ड का उपयोग करके कृषि को डिजिटल रूप से बदलने के लिए एक आदर्श बदलाव को प्रभावित करने में मदद कर सकता है जो फसलों, पानी की आवश्यकताओं, उर्वरक प्रभावशीलता, बाजार और आर्थिक स्थितियों की निगरानी भी कर सकता है। इस प्रकार पर्यावरण संबंधी आंकड़े कृषि के आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बेशक प्रौद्योगिकियां यहां हैं, लेकिन इसका व्यापक पैमाने पर कार्यान्वयन अभी भी एक सपना है जिसे साकार किया जाना है।

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