सब्जियों में एकीकृत कीट-रोग प्रबंधन

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नर्सरी के समय :

  •  जड़ सडऩ तथा मृदाजनित रोगों से बचाव हेतु पौधशाला की क्यारियों में अच्छे जल निकास का प्रबंध करें।
  •  मृदाजनित नाशीजीव को कम करने में भू-तपन काफी लाभकारी होता है। इसके लिए क्यारियों को 0.45 मि. मी. मोटी पालीथिन शीट से कम से कम 3 हफ्तों के लिए ढकना चाहिए। भू-तपन करने के लिए मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  • 1 कि.ग्रा. गोबर की खाद में 50 ग्राम फफूंदनाशक ट्राइकोडर्मा हरजेनियम को मिलाकर 7 दिन तक छाया में रखकर 1 वर्गमीटर क्यारी की मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें।
  • बीज का शोधन ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से करें।
  • पाला तथा ठण्डा से बचाव के लिए दिसम्बर – जनवरी के मध्य पौधशाला की क्यारियों को पालीथिन की चादर से ढकें जिसे दिन के समय अवश्य हटा दें।
  • पत्ती मोड़क बीमारी से बचाव के लिए 0.40 मि. मी. की मोटाई वाली नायलॉन जाल से नर्सरी को ढकें।
  • डाउनी मिल्डयू नामक बीमारी जो कि नर्सरी में दिखती है, से बचाव के लिए डायथेन एम-45 का छिड़काव करें।
  • यदि नर्सरी में एफिड, सफेद मक्खी या थ्रिप्स का आक्रमण हो तो डाइमिथिएट 1 ग्राम प्रति लीटर या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. का 2 ग्राम प्रति लीटर के घोल का छिड़काव करें।

मुख्य फसल :

  • पौधरोपण के पहले पौधों को इमीडाक्लोप्रिड के 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी के घोल में 15 मिनट तक डुबोकर रखें। इससे एफिड , सफेद मक्खी तथा लीफ माइनर के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
  • पौधरोपण के समय पौधों को स्यूडोमोनॉस फ्लूयोरेसेंस के 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी के घोल में 10 मिनट तक डुबोकर रखें। इससे फफूंद व जीवाणु जनित बीमारियों के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
  • मेरीगोल्ड या गेंदा के पौधों की एक पंक्ति टमाटर की 16 पंक्तियों के बाद ट्रेप फसल के रूप में लगायें। गेंदा की पौधा टमाटर के पौधे से 15 दिन पहले ही होनी चाहिए। इससे फसल छेदक कीट तथा नेमेटोड जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
  • पौधों से पौधों तथा कतार से कतार के बीच अच्छी दूरी रखने से रोगों के प्रसार में अवरोध उत्पन्न होता है। अत: टमाटर की सामान्य प्रजातियों की दूरी 60&45  तथा हाइब्रिड प्रजातियों की दूरी 90&60 सेन्टीमीटर रखें।
  • 10 बर्ड पर्च स्टैण्ड प्रति एकड़ की दर से लगाएं ताकि कीटों को खाने वाले पक्षियों (परजीवी) का आगमन सुगम हो सके।
  • नीम की खली 250 किलोग्राम प्रति हेक्टर को रोपाई के 20 दिन पहले प्रयोग करें। इससे फल भेदक, पत्ती खाने वाले कीट तथा नेमेटोड के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
  • 2 डेल्टा स्ट्रिकी ट्रेप प्रति एकड़ की दर से लगाएं यह ट्रेप टिड्डों, एफिड तथा सफेद मक्खी आदि के प्रबंधन में सहायता होते है।
  • दो कि.ग्रा. नीम की निबोली को 10 लीटर पानी में डालकर 4-6 दिन तक रखें। यदि निबोली जम जाए तो बीच – बीच में लकड़ी से हिलाते रहे। इसे 100 मिली. प्रति लीटर का छिड़काव आवश्यकतानुसार सफेद मक्खी , एफिड व थ्रिप्स के लिए जब इसका स्तर 1-2 हो, पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल में करें।
  • स्पाईनोसेड या फिप्रोनिल या इमिडाक्लोरोप्रिड का 0.5 मिली. प्रति लीटर अथवा एसीफेट का 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी के घोल में मिलाकर छिड़काव करें।
  • माइट की उपस्थिति होने पर वरटीमेक (सिन्जेन्टा) या मेटाराइजम एनीसोपलिएई (टी-स्टेंस) को 6 मिली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • पांच फेरोमेन प्रपंच प्रति हेक्टेयर की दर से पॉलीहाउस में लगाएं ताकि चने की/तम्बाकू की इल्ली अण्डे न दे सकें। हर 20 से 25 दिन पर पुराने ल्यूर को नये ल्यूर से बदलते रहें।
  • पौधों में फूल आने के समय अण्डे का परजीवी ट्राइकोग्रामा प्रजाति को एक लाख प्रति हैक्टेयर की दर से एक सप्ताह के अन्तराल पर 4-5 बार छोड़ें।
  • समय-समय पर एच.एन.पी.व्ही. या एस.एल.पी.व्ही. का 250 इल्ली बसवर का प्रति हेक्टेयर पौध रोपण के 60 दिन पर या प्रारम्भिक अवस्था में 2, 3 बार छिड़काव करें।
  • जैव कीटनाशकों (जैसे प्रोक्लेम 5 प्रतिशत प्रति डब्ल्यू.डी.सी.) प्रति 0.25 ग्राम प्रति लीटर अथवा स्पाइनोसैड 0.6 मि.ली. प्रति लीटर की दर से जब सूंडी छोटी हो छिड़काव करें। इन जैव कीटनाशकों का छिड़काव शाम के समय करें।
  • समय-समय पर फल भेदक से ग्रसित फलों तथा पौधों के रोग ग्रसित भागों को अलग करके नष्ट करते रहने से कीट तथा रोगों के प्रकोप को कम कर सकते हैं। फसल के अवशेषों को नष्ट करने से कीट एवं बीमारियों को बढऩे से रोका जा सकता है। फसल की कटाई के बाद अवशेषों को तुरन्त ही नष्ट करें।
  • समय-समय पर पत्ती मोड़क , चितकबरा रोग (मोजेक) या उकठा रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ कर नष्ट करते रहें।
  • 2 ग्राम प्रति लीटर मेन्कोजेब/कैप्टन का छिड़काव पत्ती झुलसा तथा फल गलन का नियंत्रण करने के लिए करें।
  • पर्याप्त उर्वरकता एवं जल प्रबंधन पत्तियों के विकास में सहायक होते हैं। इस तरह से पत्तियों का पर्याप्त विकास सूर्य तपन से फल को होने वाली सूर्य तपन या सन स्केल्ड क्षति कम कर सकते हैं।
  • दवा छिड़काव के बाद फलों की तुड़ाई दवा पैकेट पर लिखे गये निर्धारित समय के बाद ही करें।
  • दवा छिड़काव के पहले तैयार फलों की तुड़ाई अवश्य कर लें।
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