भोपाल मंडी में एक दिन किस्मत का मारा, गेहूं बेचारा
‘मैं गेहूं हूं।’ किसान की मेहनत, लगन, परिश्रम से पैदा होकर खेत, खलिहान से मंडी होते हुए भूख शांत करता हूं। मैंने किसान का खून -पसीना खेतों में बहता देखा, मंडी में दलालों द्वारा रौंदा गया। ओला, वर्षा, आंधी-तूफान सभी
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