राज्य कृषि समाचार (State News)

ग्रीष्मकालीन मूंग में खरपतवार नाशकों का खतरा: पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सवाल

09 मई 2025, भोपाल: ग्रीष्मकालीन मूंग में खरपतवार नाशकों का खतरा: पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सवाल – मध्यप्रदेश ने खाद्यान्न उत्पादन में भले ही उल्लेखनीय प्रगति की हो, लेकिन ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती में खरपतवार नाशकों के बढ़ते उपयोग ने पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर और राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) विजय सिंह तोमर ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है.

मूंग की खेती: वरदान या चुनौती?

मध्यप्रदेश दलहन उत्पादन में देश के शीर्ष तीन राज्यों में शामिल है. मूंग, जो कभी खरीफ के मौसम में वर्षा आधारित खेती के रूप में उगाई जाती थी, अब गर्मियों में बड़े पैमाने पर बोई जा रही है. डॉ. तोमर के अनुसार, पिछले एक दशक में मूंग की खेती का क्षेत्रफल तीन गुना से अधिक बढ़ा है. मूंग की जड़ों में नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, लेकिन ग्रीष्मकालीन खेती ने नई समस्याएं खड़ी की हैं.

गर्मियों में मूंग की खेती के लिए अत्यधिक भू-जल दोहन और बिजली की खपत बढ़ रही है. इसके अलावा, फसल अवशेषों को जलाने की प्रथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है. राज्य सरकार ने नरवाई जलाने पर प्रतिबंध लगाया है और किसानों को इसके उचित उपयोग के लिए प्रशिक्षण देने की बात कही है.

खरपतवार नाशकों का दुष्प्रभाव

किसान मूंग को जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वेट और ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवार नाशकों का उपयोग कर रहे हैं. ये रसायन फसल को तेजी से पकाने में मदद तो करते हैं, लेकिन इनके गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. डॉ. तोमर बताते हैं कि इन रसायनों का उपयोग मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देता है, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता घट रही है. साथ ही, इन रसायनों के अवशेष मूंग में बने रहते हैं, जो इसे खाने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं.

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“लगातार खरपतवार नाशकों का उपयोग न केवल मिट्टी को बंजर बना रहा है, बल्कि इससे विभिन्न बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है,” डॉ. तोमर ने कहा.

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भू-जल और बिजली पर बढ़ता दबाव

ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती में 3-4 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है, जिससे भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है. इसके साथ ही, अतिरिक्त सिंचाई के लिए बिजली की मांग भी बढ़ रही है. यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से खेती की स्थिरता को भी प्रभावित कर रही है.

टिकाऊ खेती की ओर कदम

कृषि विशेषज्ञ किसानों को पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ खेती की पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. डॉ. तोमर का सुझाव है कि ग्रीष्मकालीन मूंग को प्राकृतिक रूप से पकने दिया जाए और कीटनाशकों व खरपतवार नाशकों का उपयोग न्यूनतम किया जाए.

“यदि डॉ. स्वामीनाथन आज जीवित होते, तो वे भी इस बात से सहमत होते कि हरित क्रांति ने देश को बहुत कुछ दिया, लेकिन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग ने मिट्टी, पानी और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया है,” डॉ. तोमर ने कहा.

किसानों को नरवाई जलाने की बजाय जैविक खाद बनाने और मूंग की खेती को खरीफ के मौसम में वापस लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. साथ ही, भू-जल संरक्षण और बिजली की बचत के लिए ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत है.

मध्यप्रदेश के किसानों ने खेती में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य की कीमत पर यह प्रगति टिकाऊ नहीं हो सकती. अब समय है कि खेती की ऐसी पद्धतियों को अपनाया जाए, जो न केवल उत्पादन बढ़ाएं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन को भी संरक्षित करें.

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