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राज्य कृषि समाचार (State News)

बैंक अधिकारी से किसान बने निहाल सिंह, जैविक अनार की खेती से जालोर में सालाना 70 लाख तक का कारोबार

22 अक्टूबर 2026, बावतरा (जालोर): बैंक अधिकारी से किसान बने निहाल सिंह, जैविक अनार की खेती से जालोर में सालाना 70 लाख तक का कारोबार – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से चीफ मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए निहाल सिंह आज जालोर जिले की सायला तहसील के बावतरा गांव में जैविक तरीकों से अनार की खेती कर रहे हैं, और उनका सालाना कारोबार 60 से 70 लाख रुपए तक पहुंच गया है। उनका परिवार लगभग छह साल से अनार की खेती कर रहा है।

निहाल सिंह के 20 एकड़ के बाग में करीब 5 हजार अनार के पौधे लगे हैं, जिनकी उम्र अलग-अलग है—कुछ तीन साल, कुछ पांच साल और कुछ छह साल पुराने। पौधे नागपुर से टिशू-कल्चर विधि से लाए गए थे। पहली फसल रोपाई के दो साल बाद मिली थी और अब तक बाग से पांच बार फल तोड़े जा चुके हैं, यह छठी फसल है। फिलहाल प्रति पौधा 100 से 250 तक फल लग रहे हैं, जिनका औसत वजन करीब 150 ग्राम है—हालांकि लक्ष्य इसे 300 से 400 ग्राम तक बढ़ाने का है।

बैंकिंग क्षेत्र में तीन दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद खेती में उतरना निहाल सिंह के लिए आसान नहीं रहा, लेकिन उनका कहना है कि अनार जैसी बागवानी फसल कम पानी और बारानी इलाकों में भी अच्छी आमदनी दे सकती है, बशर्ते पौधों की देखभाल वैज्ञानिक तरीके से हो। उन्होंने अलग-अलग उम्र के पौधे इसलिए लगाए ताकि हर साल कुछ न कुछ उत्पादन मिलता रहे और आमदनी में बहुत बड़ा उतार-चढ़ाव न आए।

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जैविक इनपुट अपनाने से खर्च आधे से भी कम

निहाल सिंह बताते हैं कि अनार का भाव उन्हें बाजार और गुणवत्ता के हिसाब से ₹50 से ₹125 प्रति किलो तक मिल जाता है, और ₹50 प्रति किलो से कम दाम कभी नहीं मिला। इस हिसाब से बाग से हर साल करीब 100 टन अनार का उत्पादन होता है। उनका कहना है कि पहले बाग पर सालाना करीब ₹20 लाख का खर्च आता था, जो जैविक इनपुट अपनाने के बाद इस साल अब तक सिर्फ ₹8 से ₹9 लाख रह गया है।

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इसके लिए वे सूरत की एक कंपनी के जैविक उत्पाद इस्तेमाल करते हैं—एक मिट्टी में डाला जाता है और दूसरा पत्तियों पर छिड़का जाता है। शुरुआत में उनके यहां रासायनिक और जैविक इनपुट का अनुपात लगभग 80:20 था, जो अब पलटकर करीब पूरी तरह जैविक की ओर बढ़ चुका है। कुछ खास परिस्थितियों में ही सीमित मात्रा में रासायनिक छिड़काव किया जाता है। मिट्टी में कार्बन की मात्रा पहले महज 0.25 से 0.30 प्रतिशत थी, जिसे जैविक पदार्थों से सुधारने की कोशिश लगातार जारी है। सिंचाई पूरी तरह ड्रिप प्रणाली से होती है, और यहां ट्यूबवेल करीब 900 फुट गहरा है जबकि पानी लगभग 700 फुट पर मिलता है।

निहाल सिंह का मानना है कि स्वस्थ पौधे बीमारियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं, इसलिए वे पोषक तत्वों के अलग-अलग छिड़काव के बजाय अब कम उत्पादों से ही बाग की सेहत बनाए रखने पर ध्यान दे रहे हैं। जालोर जैसे बारानी इलाके में, जहां पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती रहती है, उनका यह मॉडल आसपास के किसानों के लिए भी एक मिसाल बन रहा है।

फल के आकार और रंग को बेहतर बनाने के लिए वे अब बाग प्रबंधन में और सुधार करने की योजना बना रहे हैं, ताकि निर्यात गुणवत्ता के फल मिल सकें और भाव में भी बढ़ोतरी हो सके। जालोर जिला राजस्थान के उन इलाकों में शामिल है जहां अनार की खेती पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, और सेवानिवृत्त कर्मचारियों तथा शिक्षित युवाओं का खेती की ओर रुख करना इस बदलाव की एक बड़ी वजह माना जा रहा है। निहाल सिंह जैसे किसानों के अनुभव आसपास के गांवों के परंपरागत किसानों को भी जैविक तरीकों और उन्नत सिंचाई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

वे मानते हैं कि किसी भी नई फसल या तकनीक को अपनाने से पहले छोटे स्तर पर प्रयोग करना जरूरी है, ताकि मिट्टी और पानी की स्थिति को समझकर ही बड़े निवेश का फैसला लिया जाए। आने वाले वर्षों में वे पैदावार और गुणवत्ता दोनों को और बेहतर बनाने के लिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर जैविक इनपुट की मात्रा को और व्यवस्थित तरीके से तय करने पर काम कर रहे हैं।

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