तरबूज की उन्नत खेती: अधिक उत्पादन और बेहतर लाभ
लेखक: अनुराग शर्मा, दिव्या राठोड, योगेश राजवाड़े, भा.कृ. अनु. प. केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल
30 मार्च 2026, भोपाल: तरबूज की उन्नत खेती: अधिक उत्पादन और बेहतर लाभ –
परिचय और महत्व
तरबूज गर्मी के मौसम की एक प्रमुख नकदी फसल है, जो अपने मीठे स्वाद, अधिक जल मात्रा और पोषण गुणों के कारण व्यापक रूप से उगाई जाती है। यह फसल कम अवधि में तैयार होकर किसानों को जल्दी आय प्रदान करती है, इसलिए इसे लाभकारी खेती के रूप में जाना जाता है। बढ़ती शहरी मांग और ताजे फलों की खपत में वृद्धि ने तरबूज की खेती को और अधिक आकर्षक बना दिया है। इसके अलावा, तरबूज का उपयोग केवल ताजे फल के रूप में ही नहीं बल्कि जूस, सलाद और प्रसंस्कृत उत्पादों में भी किया जाता है। इसकी बाजार में निरंतर मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। यदि वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाए, तो यह फसल कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली सिद्ध हो सकती है।
जलवायु, मिट्टी एवं खेत की तैयारी
तरबूज की सफल खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त होती है। इसके लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है, जबकि पाला और अत्यधिक ठंड इसकी वृद्धि को प्रभावित करते हैं। यह फसल बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी तरह विकसित होती है, जहां जल निकास की उचित व्यवस्था हो और मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो। खेत की तैयारी के दौरान 2–3 गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाया जाता है। अंतिम जुताई के समय 20–25 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। आधुनिक खेती में उठी हुई क्यारियों या मेड़ों पर बुवाई करने से जल निकास बेहतर होता है और पौधों की जड़ों का विकास मजबूत होता है।
बीज, बुवाई एवं पोषण प्रबंधन
उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 2–3 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशक से उपचारित करने पर अंकुरण अच्छा होता है और प्रारंभिक रोगों से सुरक्षा मिलती है। बुवाई जनवरी से मार्च के बीच की जाती है, जबकि पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखना आवश्यक है ताकि बेलों को फैलने का स्थान मिल सके। उर्वरक प्रबंधन के अंतर्गत नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि में सहायक होती है, जबकि फास्फोरस जड़ों के विकास और पोटाश फल की गुणवत्ता को सुधारता है। नाइट्रोजन को विभाजित खुराकों में देने से पौधों को निरंतर पोषण मिलता है और उत्पादन में वृद्धि होती है।
तरबूज की उन्नत किस्में
तरबूज की खेती में अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता के लिए उन्नत एवं लोकप्रिय किस्मों का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। भारत में खुले परागण (OP), हाइब्रिड और बीजरहित (seedless) कई किस्में प्रचलित हैं जैसे शुगर बेबी, आसाही यामाटो, किरण, माधुरी 64, जुबिली, क्रिमसन स्वीट, शुगर 75, आदि
उन्नत तकनीक: ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग
आधुनिक कृषि में ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक तरबूज की खेती को अधिक लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक नियंत्रित मात्रा में पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की 40–60% तक बचत होती है और पौधों को निरंतर नमी मिलती रहती है। इसके साथ ही, उर्वरकों को पानी के साथ देने (फर्टिगेशन) से पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है और पौधों की वृद्धि तेज होती है। मल्चिंग तकनीक में खेत की सतह को प्लास्टिक शीट या जैविक पदार्थों से ढक दिया जाता है, जिससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवारों की वृद्धि कम होती है। काली/चंदेरी पॉलीथीन मल्च का उपयोग विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह मिट्टी के तापमान को संतुलित रखता है और जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है। प्रति हेक्टर मल्चिंग की कीमत रु. ४०००० – रु. ५०००० तक आ सकती है। किन्तु खरपतवार नियंत्रण, मृदा में संतुलित नमी रखने के कारन उत्पादन और उत्पादकता दोनों में वृद्धि होती है, जिससे अधिक लागत की भरपाई आसानी से हो जाती है। ड्रिप और मल्चिंग के संयुक्त उपयोग से न केवल उत्पादन में 20–30% तक वृद्धि होती है, बल्कि फलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। इस तकनीक से श्रम लागत कम होती है और जल संसाधनों का कुशल उपयोग संभव होता है, जिससे यह तकनीक किसानों के लिए अधिक लाभदायक और टिकाऊ विकल्प बनती है।
महीना अनुसार फसल की जल आवश्यकता(मिमी³/हेक्टेयर) तथा सिंचाई की संख्या
| फसल | विवरण | महीना अनुसार फसल की जल आवश्यकता (मिमी) तथा सिंचाई की संख्या | ||||
| फ़रवरी | मार्च | अप्रैल | मई | कुल (मिमी) | ||
| तरबूज | जल आवश्यकता | 25-40 | 60-65 | 100-120 | 120-125 | 330-350 |
| सिंचाई की संख्या | 3-4 | 7-9 | 7-9 | 7-9 | 24-31 | |
तरबूज फसल की जल आवश्यकता माह के अनुसार अलग-अलग होती है। फरवरी माह में फसल को लगभग 25–40 मिमी जल की आवश्यकता होती है, जिसके लिए 6–7 बार सिंचाई की जाती है। मार्च में जल की आवश्यकता बढ़कर 60–65 मिमी हो जाती है तथा 8–10 सिंचाइयों की जरूरत होती है। अप्रैल माह में यह आवश्यकता और बढ़कर 100–120 मिमी हो जाती है, जिसमें 8–10 बार सिंचाई करनी पड़ती है। मई में फसल को सर्वाधिक 120–125 मिमी जल की आवश्यकता होती है और इस दौरान भी 8–10 सिंचाइयाँ की जाती हैं। इस प्रकार पूरे मौसम में तरबूज फसल की कुल जल आवश्यकता लगभग 330–350 मिमी होती है तथा कुल 35–40 बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
तरबूज की फसल के लिए उर्वरक सिंचाई(फर्टिगेशन) का समय निर्धारण
| फसल | दूरी | पौध (प्रति हेक्टेयर) | उर्वरक सिंचाई कार्यक्रम | कुल | उपज | |||
| पौधे से पौधे की दूरी (मीटर) | पंक्ति से पंक्ति की दूरी (मीटर) | N | P | K | क्विंटल/हेक्टेयर | |||
| कि.ग्रा./हेक्टेयर | कि.ग्रा./हेक्टेयर | कि.ग्रा./हेक्टेयर | ||||||
| तरबूज | 0.9 | 1.2 | 9259 | शाकीय अवस्था – फरवरी | 90 | 50 | 130 | 250 |
| पुष्पन अवस्था – मार्च | ||||||||
| कटाई – अप्रैल से मई | ||||||||
तरबूज की खेती में उचित दूरी (0.9 × 1.2 मीटर) रखने से प्रति हेक्टेयर लगभग 9200 पौधे लगाए जाते हैं, जिससे पौधों को पर्याप्त जगह और पोषण मिलता है। फर्टिगेशन कार्यक्रम के अनुसार, प्रारंभिक अवस्था में पौधों की वृद्धि के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मध्यम मात्रा में दी जाती है। तरबूज की फसल में उर्वरकों को साप्ताहिक रूप से विभाजित करके देना अधिक प्रभावी माना जाता है। लगभग 12 सप्ताह की फसल अवधि को तीन अवस्थाओ में बाँटकर उर्वरक दिया जाता है। प्रारंभिक 4 सप्ताह में पौधों की वृद्धि के लिए प्रति सप्ताह लगभग 5.5–6 kg/ha नाइट्रोजन, 3–3.5 kg/ha फास्फोरस तथा 8–8.5 kg/ha पोटाश दिया जाता है। इसके बाद अगले 4 सप्ताह में फूल एवं फल बनने की प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा बढ़ाकर क्रमशः लगभग 11–12 kg/ha नाइट्रोजन, 3–3.5 kg/ha फास्फोरस और 9–10 kg/ha पोटाश प्रति सप्ताह दिया जाता है। अंतिम 4 सप्ताह में फलों की गुणवत्ता, आकार और मिठास सुधारने हेतु पोटाश की मात्रा सबसे अधिक रखी जाती है, जिसमें प्रति सप्ताह लगभग 5.5–6 kg/ha नाइट्रोजन, 6.5–7 kg/ha फास्फोरस तथा 14–15 kg/ha पोटाश दिया जाता है। इस प्रकार साप्ताहिक फर्टिगेशन प्रबंधन से पौधों को निरंतर पोषण मिलता है और उच्च गुणवत्ता के साथ बेहतर उपज प्राप्त होती है।
प्रमुख सिंचाई एवं खर पतवार प्रबंधन
तरबूज की फसल में सिंचाई का विशेष महत्व होता है। प्रारंभिक अवस्था में हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि फूल और फल बनने के समय नियमित सिंचाई करनी चाहिए। अत्यधिक पानी से जड़ों में सड़न हो सकती है, इसलिए संतुलित सिंचाई जरूरी है। खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। खरपतवार पौधों से पोषक तत्व और नमी छीन लेते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक अपनाने से न केवल खरपतवार कम होते हैं, बल्कि मिट्टी की नमी भी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है।
कीट एवं रोग प्रबंधन
तरबूज की फसल में विभिन्न कीट और रोग नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिनका समय पर नियंत्रण जरूरी है। प्रमुख कीटों में लाल कद्दू बीटल, एफिड्स और फल मक्खी शामिल हैं, जो पत्तियों और फलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके नियंत्रण के लिए जैविक या रासायनिक कीटनाशकों का संतुलित उपयोग किया जाता है।

रोगों में डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू प्रमुख हैं, जो पौधों की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित करते हैं। इनसे बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन, उचित फसल चक्र और समय पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करना आवश्यक है। सही प्रबंधन से इन समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
तुड़ाई, उपज एवं लाभ
तरबूज के फल सामान्यतः बुवाई के 75–90 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। पकने के संकेत जैसे- फल का गहरा रंग, जमीन से संपर्क वाले भाग का पीला होना और थपथपाने पर खोखली आवाज आना। सही समय पर तुड़ाई करने से फल की गुणवत्ता बनी रहती है और बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं।
उन्नत तकनीकों को अपनाकर किसान 250–300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, जबकि बेहतर प्रबंधन से यह 350 क्विंटल तक भी पहुंच सकता है। अच्छी गुणवत्ता के फल बाजार में ऊंचे दाम पर बिकते हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है। इस प्रकार, तरबूज की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी और टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती है।
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