अंडमान सागर से भारत की पहली ओपन-सी समुद्री मछली पालन परियोजना का शुभारंभ, ब्लू इकोनॉमी को मिली नई रफ्तार
19 जनवरी 2026, नई दिल्ली: अंडमान सागर से भारत की पहली ओपन-सी समुद्री मछली पालन परियोजना का शुभारंभ, ब्लू इकोनॉमी को मिली नई रफ्तार – भारत ने ब्लू इकोनॉमी की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अंडमान सागर से अपनी पहली ओपन-सी (खुले समुद्र में) समुद्री मछली पालन परियोजना की शुरुआत कर दी है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने नॉर्थ बे, श्री विजया पुरम में खुले समुद्र क्षेत्र के फील्ड दौरे के दौरान इस परियोजना का शुभारंभ किया। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप भारत के विशाल समुद्री संसाधनों के उपयोग की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम बताया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह परियोजना भारत के समुद्रों की आर्थिक क्षमता को साकार करने की शुरुआत है। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के बाद लगभग सात दशकों तक भारत के समुद्री संसाधनों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन 2014 के बाद राष्ट्रीय सोच में बड़ा बदलाव आया है और समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था को विकास का अहम आधार माना जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी तटों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, जो देश के आर्थिक विकास में अलग-अलग तरीके से योगदान दे सकती हैं।
यह पायलट परियोजना पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह प्रशासन के सहयोग से लागू की जा रही है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक नवाचार के जरिए आजीविका के नए अवसर सृजित करना और समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।
समुद्री फिनफिश और शैवाल की ओपन-सी खेती पर फोकस
परियोजना के तहत प्राकृतिक समुद्री परिस्थितियों में समुद्री फिनफिश और समुद्री शैवाल की ओपन-सी खेती की जा रही है। फील्ड विजिट के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्थानीय मछुआरा समुदायों को समुद्री शैवाल के बीज सौंपे, ताकि गहरे समुद्र में इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा सके। इसके साथ ही पिंजरा-आधारित पालन के लिए फिनफिश के बीज भी वितरित किए गए।
NIOT द्वारा विकसित ओपन-सी केज से मिलेगा तकनीकी सहयोग
फिनफिश पालन के लिए एनआईओटी द्वारा विकसित विशेष ओपन-सी केज का उपयोग किया जा रहा है, जिन्हें खुले समुद्री और प्राकृतिक परिस्थितियों में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह तकनीक समुद्री खेती को सुरक्षित, टिकाऊ और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने में मदद करेगी।
भविष्य में PPP मॉडल से विस्तार की संभावना
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान में यह परियोजना सरकारी सहयोग से संचालित की जा रही है, लेकिन इससे प्राप्त अनुभव और फिजिबिलिटी असेसमेंट भविष्य में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के जरिए इसके विस्तार का रास्ता खोल सकते हैं। इससे तकनीक के तेजी से प्रसार, रोजगार सृजन और ब्लू इकोनॉमी इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी।
महात्मा गांधी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान का भी किया दौरा
अंडमान यात्रा के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने वांडूर के पास स्थित महात्मा गांधी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान का भी भ्रमण किया। वर्ष 1983 में स्थापित यह देश के पहले समुद्री राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है, जो 15 द्वीपों में फैला हुआ है। उन्होंने यहां के समृद्ध समुद्री इकोसिस्टम, मूंगा चट्टानों, मैंग्रोव और विविध समुद्री जीवों का अवलोकन किया।
तटीय समुदायों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल
नॉर्थ बे से इस परियोजना का शुभारंभ यह दर्शाता है कि भारत सरकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सीधे जमीनी स्तर तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस पहल से तटीय और द्वीप समुदायों को समुद्र आधारित आर्थिक विकास का सक्रिय भागीदार बनाया जाएगा।
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