राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

आईसीएआर जलवायु-अनुकूल गेहूं और जौ की किस्मों पर कर रहा अनुसंधान, किसानों की आय और सुरक्षा होगी मजबूत  

11 अप्रैल 2026, नई दिल्ली: आईसीएआर जलवायु-अनुकूल गेहूं और जौ की किस्मों पर कर रहा अनुसंधान, किसानों की आय और सुरक्षा होगी मजबूत – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) आत्मनिर्भर भारत को आगे बढ़ाने और वर्ष 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। परिषद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ आजीविका और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष रूप से जलवायु-अनुकूल गेहूं और जौ फसलों पर अनुसंधान कर रहा है।

आईसीएआर और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने हाल ही में आईसीएआर-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई), करनाल का दौरा किया और अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की। डॉ. जाट ने किसानों की आय बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसलों के विकास और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर विशेष जोर दिया।

उन्होंने बताया कि बीएनआई (Bio-Nitrification Inhibition) जैसी तकनीक के माध्यम से उर्वरक की खपत में 25 प्रतिशत तक की कमी संभव हो रही है, जिससे किसानों और पर्यावरण दोनों को लाभ मिलेगा। इसके साथ ही आईसीएआर के प्रयासों से उर्वरक और पानी की बचत, फसल अवशेष जलाने में कमी, और उत्पादकता में वृद्धि जैसी उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं।

प्रमुख अनुसंधान और लाभ

आईसीएआर ने भारत-गंगा के मैदानों में जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल गेहूं-जौ प्रणालियों पर काम करते हुए किसानों के लिए लाभकारी तकनीक विकसित की है। संरक्षण कृषि के माध्यम से सिंचाई में 85 प्रतिशत तक बचत, उर्वरक में 28 प्रतिशत की कमी और ईंधन की खपत में 51 प्रतिशत तक कमी हासिल की गई है। इस अनुसंधान से फसल की उत्पादन क्षमता 33 प्रतिशत तक बढ़ी और किसानों की घरेलू आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

साथ ही, पोषण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लोहे, जिंक और प्रोटीन युक्त 55 जैव-संरक्षित गेहूं किस्में तैयार की गई हैं। गेहूं की लगभग 45 प्रतिशत खेती अब इन किस्मों के अंतर्गत आ रही है, जिससे किसानों में अपनाने की दर बढ़ी है।

जौ और प्राकृतिक खेती में नवाचार

जौ की फसलों में कम पानी और कम उर्वरक के उपयोग की तकनीक विकसित की जा रही है, जो स्वास्थ्य-केंद्रित खाद्य और पशु आहार के लिए उपयुक्त है। आईसीएआर किसानों को सशक्त बनाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने और युवाओं एवं महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक नवाचारों को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित कर रहा है।

संरक्षण कृषि पद्धतियों, शून्य जुताई और मशीनीकृत बुवाई से प्रणाली की उत्पादकता में 6-10 प्रतिशत सुधार हुआ है और मृदा कार्बनिक कार्बन में वृद्धि हुई है। इससे समय, ईंधन और संसाधनों की 70-75 प्रतिशत तक बचत होती है।

आईसीएआर का यह अनुसंधान किसानों को सुरक्षित और टिकाऊ कृषि पद्धति अपनाने के लिए तैयार कर रहा है। जलवायु-प्रतिरोधी और पोषक तत्वों से भरपूर फसल किस्मों के विकास से भारत की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों की आय स्थिर रहेगी।

डॉ. जाट ने यह भी बताया कि इन प्रयासों से फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, फसल अवशेष प्रबंधन और मशीनीकरण जैसी नीतियों को और मजबूत किया जा रहा है, जिससे भारत में कृषि क्षेत्र अधिक आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनेगा।

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