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कीटनाशकों पर तथ्य आधारित चर्चा जरूरी: क्रॉपलाइफ इंडिया

20 मार्च 2026, नई दिल्ली: कीटनाशकों पर तथ्य आधारित चर्चा जरूरी: क्रॉपलाइफ इंडिया – क्रॉपलाइफ इंडिया ने कीटनाशकों को लेकर ‘मिथक बनाम सच्चाई’ जानकारी जारी करते हुए कहा है कि फसल सुरक्षा पर चल रही बहस वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। संगठन ने बताया कि खाद्य अवशेष, पर्यावरण और सुरक्षा को लेकर कई गलतफहमियां फैल रही हैं, जबकि किसानों को कीट व रोगों से फसल बचाने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

श्री दुर्गेश चंद्र, महासचिव क्रॉपलाइफ इंडिया

भारत में लगभग 9.3 करोड़ परिवार और 15 करोड़ किसान खेती पर निर्भर हैं। देश में हर साल कीट एवं रोगों से 10-35 प्रतिशत तक फसल नुकसान होता है। इसके बावजूद भारत में कीटनाशकों का उपयोग कई देशों की तुलना में काफी कम (लगभग 0.3-0.6 किग्रा/हेक्टेयर) है।

श्री दुर्गेश चंद्र, महासचिव क्रॉपलाइफ इंडिया ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य कीटनाशकों पर संतुलित और तथ्य-आधारित चर्चा को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि फसल सुरक्षा उत्पाद किसानों को उपज बचाने में मदद करते हैं, साथ ही उद्योग सुरक्षित उपयोग, प्रशिक्षण और सख्त नियामक व्यवस्था का समर्थन करता है।

संगठन ने यह भी कहा कि भारत में कीटनाशकों के लिए कड़ी नियामक प्रक्रिया है, जहां उत्पादों की सुरक्षा, पर्यावरण प्रभाव और अवशेषों की जांच के बाद ही अनुमति दी जाती है। क्रॉपलाइफ इंडिया ने किसानों के प्रशिक्षण, जिम्मेदार उपयोग और बेहतर प्रबंधन को सुरक्षित व टिकाऊ खेती के लिए जरूरी बताया।

कीटनाशकों के बारे में भ्रम और सच्चाई: आसान भाषा में समझें

(किसानों, कृषि विक्रेताओं और विस्तार कर्मियों के लिए उपयोगी)

1. मिथक: ‘कीटनाशक कैंसर करते हैं’

सच्चाई: भारत में उपयोग होने वाले कीटनाशक सरकार की सख्त जांच के बाद ही मंजूर होते हैं। केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (CIB&RC) स्वास्थ्य, पर्यावरण और खाद्य अवशेषों का मूल्यांकन करता है।

  • सही मात्रा और लेबल के अनुसार उपयोग करने पर उपभोक्ताओं में कैंसर का खतरा नहीं पाया गया है।
  • किसानों को सुरक्षा उपकरण और सही प्रशिक्षण जरूरी है।

2. मिथक: ‘कीटनाशक कभी खत्म नहीं होते’

सच्चाई: आज के कई आधुनिक कीटनाशक मिट्टी और पानी में धीरे-धीरे टूट जाते हैं।

  • उनका असर दवा, मिट्टी और मौसम पर निर्भर करता है।
  • लेबल पर सही मात्रा और फसल कटाई से पहले का समय (वेटिंग पीरियड) दिया होता है।

3. मिथक: ‘सभी कीटनाशक जहर होते हैं’

सच्चाई: हर कीटनाशक की विषाक्तता अलग-अलग होती है।

  • हर दवा का अलग परीक्षण होता है और उसे सुरक्षा श्रेणी में रखा जाता है।
  • लेबल पर सुरक्षित उपयोग की पूरी जानकारी होती है।


4. मिथक: ‘जैविक खेती मतलब बिना केमिकल’

सच्चाई: जैविक खेती में भी कुछ प्राकृतिक कीटनाशक (जैसे नीम, पाइरेथ्रम) उपयोग होते हैं।

  • सभी उत्पाद (प्राकृतिक या रासायनिक) को सुरक्षा मानकों से गुजरना पड़ता है।

5. मिथक: ‘कीटनाशक लाभकारी कीटों को मार देते हैं’

सच्चाई: किसान अब इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM ) अपनाते हैं।

  • सही समय और सही मात्रा में उपयोग से मधुमक्खी जैसे लाभकारी कीटों पर कम असर पड़ता है।

6. मिथक: ‘खाने में कीटनाशक अवशेष खतरनाक हैं’

सच्चाई: भारत का खाद्य नियामक (FSSAI) अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) तय करता है।

  • 2022-2025 में जांचे गए 86,000 से अधिक नमूनों में से लगभग 97 प्रतिशत सुरक्षित पाए गए।
  • धोने, छीलने और पकाने से अवशेष और कम हो जाते हैं।

7. मिथक: ‘कीटनाशक से भूजल खराब हो जाता है’

सच्चाई: पर्यावरण पर असर इस बात पर निर्भर करता है कि कीटनाशक का उपयोग कैसे किया गया।

  • कई दवाएं मिट्टी में ही बंध जाती हैं और भूजल में नहीं जातीं।
  • समस्या गलत या ज्यादा उपयोग से होती है।

8. मिथक: ‘बिना कीटनाशक खेती संभव है’

सच्चाई: अगर फसल सुरक्षा न हो तो 30-50 प्रतिशत तक उत्पादन घट सकता है।

  • इससे किसान की आय और देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।

9. मिथक: ‘किसान कीटनाशक से जहर खा जाते हैं’

सच्चाई: सही उपयोग, प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण (मास्क, दस्ताने) से जोखिम बहुत कम हो जाता है।

10. मिथक: ‘कंपनियां सच्चाई छुपाती हैं’

सच्चाई: कीटनाशक रजिस्ट्रेशन के लिए कंपनियों को स्वास्थ्य, पर्यावरण और अवशेष से जुड़ी पूरी जानकारी देनी होती है।

  • नियामक जांच के बाद ही उत्पाद को मंजूरी मिलती है।

निष्कर्ष: कीटनाशकों का सही और जिम्मेदार उपयोग ही सुरक्षित खेती और बेहतर उत्पादन की कुंजी है।

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