जंग में भी मददगार है मनरेगा

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बेरोजगारी के साथ जलवायु परिवर्तन से

  • मनु मोदगिल

18 अक्टूबर 2021, भोपाल । जंग में भी मददगार है मनरेगा – जब भी देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनता है तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत काम की मांग बढ़ जाती है। वह सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा हो, नोटबंदी हो या कोविड महामारी की वजह से लगाया गया लॉकडाउन हो। इससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में गरीबी उन्मूलन और रोजगार के लिए चलाया जाने वाले विश्व का सबसे बड़ा कार्यक्रम मनरेगा का क्या महत्व है। अब नए शोध में पता चला है कि यह कार्यक्रम देश को कार्बन अवशोषण में भी मदद कर रहा है। जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते के तहत भारत के लिए कार्बन अवशोषण का लक्ष्य भी निर्धारित है। इसके तहत, वर्ष 2030 तक 250-300 करोड़ टन कार्बन अवशोषित किया जाना है। इसमें मनरेगा जैसे कार्यक्रम की महती भूमिका हो सकती है।

एक शोध में पाया गया कि मनरेगा के तहत चली गतिविधियों से वर्ष 2017-18 में 10.2 करोड़ टन कार्बन डायऑक्साइड का अवशोषण हुआ। इंडियन इंस्टीट्यूट साइंस, बैंगलुरु के शोधकर्ताओं के द्वारा किये इस अध्ययन में पता चला कि वर्ष 2030 तक कार्बन अवशोषण की यह मात्रा 24.9 करोड़ मीट्रिक टन तक हो जाने की संभावना है।

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत देशभर के ग्रामीण क्षेत्र में प्राकृतिक संपदा बचाने की कोशिश से कार्बन का अवशोषण भी होता है। अनुमान है कि 2030 तक इस योजना की वजह से 24.9 मीट्रिक टन कार्बन डायऑक्साइट का अवशोषण किया जा सकता है।
  • इस योजना से होने वाले कुल कार्बन अवशोषण का 40 फ़ीसदी तो सूखे से बचने की कवायद से हो गयी। इसमें पौधारोपण, वनीकरण जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
  • इसके अतिरिक्त इस कार्यक्रम से जाहिर तौर पर कमजोर तबके के लोगों को आर्थिक मदद भी मिलती है। सनद रहे कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित भी यही तबका रहने
    वाला है।

शोधकर्ताओं ने इस जानकारी को हासिल करने के लिए मनरेगा के तहत काम होने वाले 158 गांवों में मिट्टी का परिक्षण किया। देश के कुछ 18 एग्रो इकोलॉजिकल जोन में स्थित इन गांवों की मिट्टी में कार्बन की अवशोषित मात्रा को परखा गया। ये इलाके हैं पश्चिमी हिमालय, लद्दाख, पूर्वी कश्मीर, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप आदि। मनरेगा के तहत वर्ष 2006 से ही असंगठित और अकुशल मजदूरों को काम दिया जाता है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को रोजगार मिल रहा है। सूखा प्रभावित इलाकों में मनरेगा काफी महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना का महत्व तब और बढ़ गया जब कोविड-19 के लिए लगाए गए देशव्यापी तालाबंदी के दौरान मजदूरों को मजबूरी में शहर छोडक़र गांव जाना पड़ा। तब उनके रोजगार का मनरेगा एक प्रमुख साधन बना।

आईआईएससी के शोधकर्ताओं ने पाया कि सूखे की समस्या से निजात के लिए मनरेगा में कई काम किए गए। इसके तहत पौधरोपण हुआ और घास के मैदानों का विकास भी किया गया। मनरेगा के तहत होने वाले कुल कार्बन अवशोषण का 40 फीसदी अवशोषण, वृक्षारोपण या घास के मैदानों के विकास से हो गया।
सूखे से निपटने को लेकर की गई गतिविधियों की वजह से कार्बन उत्सर्जन अलग-अलग इलाकों में 0.29 टन प्रति हेक्टेयर से लेकर 4.50 टन प्रति हेक्टेयर तक हो रहा है। जमीन के विकास के लिए किए गए काम, मिट्टी के बाड़बंदी और मिट्टी को सपाट करने के काम में भी 0.1 से 1.97 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष का कार्बन अवशोषण हता है। इसके अलावा सिंचाई के लिए किए गए प्रबंध से 0.08 से 1.93 टन प्रति हेक्टेयर का कार्बन अवशोषण होता है।

मनरेगा एक रोजगार प्रदान करने वाली योजना है पर इससे पर्यावरण को भी फायदा होता है। खासकर मनरेगा के तहत होने वाले पानी, जमीन और पेड़ लगाने से संबंधित काम, पर्यावरण के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं। पहली बार हमने मनरेगा के तहत होने वाले काम के पर्यावरण पर पडऩे वाले सकारात्मक प्रभावों की राष्ट्रीय स्तर पर गणना की है, कहते हैं इंदु के मुर्ती जो सेंटर फॉर स्टडी साइंस, टेक्नालॉजी एंड पॉलिसी (सीएसटीईपी) के प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं। वह इस अध्ययन के सह लेखक भी हैं।

भारत ने कार्बन अवशोषण में मनरेगा का योगदान मानते हुए जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) को इस साल की शुरुआत में सौंपी एक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है। यह शोध मनरेगा के माध्यम से हुए कार्बन अवशोषण के अतिरिक्त लाभ को दिखाता है। यह ऐसे वक्त में काफी महत्वपूर्ण है जब वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को देखते हुए ऐसे विकास को प्रोत्साहित करने की बात कर रहे हैं जो जलवायु के अनुकूल हो।

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