फसलों में कुशल जल प्रबंधन

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  • डॉ. टीकम सिंह , डॉ. अंचल दास
  • डॉ. जी.ए. राजन्ना , डॉ. वी.के. सिंह
    सस्य विज्ञान संभाग
    भा.कृ.अनु.ए.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली

5 अगस्त 2021, भोपाल । फसलों में कुशल जल प्रबंधन – जल कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण आदान है जिसके बिना सफलतापूर्वक खेती नहीं की जा सकती है। भारत में पानी का सर्वाधिक उपयोग कृषि में सिंचाई के रूप में किया जाता है परन्तु पानी का समुचित एवं पूर्ण क्षमता के अनुसार कुशल प्रबंधन नहीं हो रहा है जिससे कृषि में कई समस्याएं, जैसे जलमग्न मृदा एवं लवणीय मृदा का विस्तार, उत्पादन में कमी इत्यादि में लगातार वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से फसलों में जल प्रबंधन की कई तकनीकियाँ विकसित की हैं। जिनसे न केवल पानी की बचत कर सकते हैं बल्कि उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ अधिक क्षेत्र को सिंचित कर सकते हैं।

धान में जल प्रबंधन

धान की खेती के लिए पानी की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। धान की फसल में कुशल जल प्रबंधन से जल की बचत करके अधिक क्षेत्र में सिंचाई कर सकते हैं तथा धान के उत्पादन को बढ़ा सकते हैं।

  • नर्सरी में हमेशा नमी बनाए रखें तथा कभी भी नर्सरी में पानी खड़ा ना रहने दें।
  • नर्सरी में सिंचाई हमेशा शाम के समय में दें।
  • धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद जब कल्ला निकलता है, खेत में पानी बना रहे।
  • बाली निकलने, फूल निकलने तथा दाने आने के दौरान भी पानी भरा हो बाकी समय में खेत में पानी भरा रखने की आवश्यकता नहीं है।
  • वैज्ञानिक परीक्षण से स्पष्ट है कि धान की अच्छी उपज लेने हेतु सिंचाई की नवीनतम तकनीक जैसे बूँद-बूँद सिंचाई एवं उपसतही सिंचाई विधि से काफी पानी की मात्रा में बचत की जा सकती हैं।
मक्का में जल प्रबंधन
  • मक्का मुख्यतया: वर्षा आधारित फसल है इसलिए इसमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। खेत में नमी कम है या सूखाग्रस्त स्थिति होने पर मक्का की फसल को घुटने की ऊंचाई, नर मंजरी के निकलने, भुट्टे में दाना भरते समय सिंचाई अवश्य करें अन्यथा पौधों की बढ़वार कम होगी और उपज में कमी हो जायेगी।
  • सामान्यतया: मक्का की फसल में सिंचाई उपलबध नमी की 50 प्रतिशत मात्रा कम होने पर की जाती है।
  • खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होना अति आवश्यक है अन्यथा जलभराव की स्थिति में फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • मक्का की फसल को मेड़ों पर उगाकर अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल भराव की समस्या को कम कर सकते हैं तथा सूखा के समय नालियों में सिंचाई कर अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं।
  • किसान भाई मक्का में सिंचाई की नवीनतम तकनीक जैसे बूँद-बूँद सिंचाई एवं उपसतही सिंचाई विधि अपना अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं।
गेहूं में जल प्रबंधन
  • गेहूं में जल प्रबंधन एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, इसकी मात्रा और समय का ध्यान नहीं दिया गया तो उत्पादन पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है, फसल की पैदावार बहुत कम हो जाती है। गेहूं में सिंचाई मौसम, भूमि, स्थानीय परिस्थिति, प्रजाति आदि के आधार पर निर्धारित की जाती है।
  • गेहूं की फसल के लिए सामान्यतया 4-6 सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन रेतीली भूमि में 6-8 तथा भारी दोमट जमीन में 3-4 सिंचाई पर्याप्त होती है।
  • रेतीली भूमि में सिंचाई हल्की (लगभग 5-6 से.मी. जल) और दोमट व भारी भूमि में सिंचाई कुछ गहरी (6-7 से.मी. जल) करें।
  • यदि तीन सिंचाईयों की सुविधा ही उपलब्ध हो तो ताजमूल अवस्था, बाली निकलने से पूर्व और दुग्धावस्था पर करें, दो सिंचाईयाँ ही उपलब्ध हों तो क्राउन रूट बनने की अवस्था और पुष्पावस्था पर करें। एक ही सिंचाई उपलब्ध हो तो क्राउन रूट बनने की अवस्था पर करें।
  • गेहूं की फसल में सतही क्यारी विधि के स्थान पर सिंचाई की नवीनतम विधियों, जैसे नाली, बूँद-बूँद, फव्वारा एवं उपसतही सिंचाई को अपनाकर किसान भाई अधिक उपज पैदा कर सकते हैं।
  • गेहूं में चौड़ी मेढ़ एवं कूड़ सिंचाई से जल में बचत करके जल उपयोग दक्षता को बढ़ाया जा सकता है।
दलहन एवं तिलहन फसलोंं में जल प्रबंधन
  •  तिलहन एवं दलहनी फसलें अधिकतर वर्षा पर निर्भर होती हैं, परन्तु सूखाग्रस्त परिस्थितियों में शाखाएँ बनते समय एवं दाने के विकास के समय पानी की कमी इन फसलों की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव डालती है अत: इन क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करना आवश्यक है।
  • प्राय: यह देखा गया है कि इन फसलों को चौड़ी मेंड़ों पर बुवाई करना अधिक लाभकारी होता है।
  • फसल अवशेषों को मिट्टी की सतह पर छोडऩे से यह बिछावन की तरह काम करके नमी संरक्षित करती है।
  • जीवांश खाद के उपयोग से भी पोषक तत्वों के अलावा नमी लम्बे समय तक मृदा में बनी रहती है तथा वर्षा के जल भी संरक्षण में मदद करती हैं।

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