बन्नी भैंस: कच्छ के घासभूमि क्षेत्र की जलवायु-अनुकूल दुग्ध नस्ल
16 फरवरी 2026, नई दिल्ली: बन्नी भैंस: कच्छ के घासभूमि क्षेत्र की जलवायु-अनुकूल दुग्ध नस्ल – बन्नी भैंस भारत की एक विशिष्ट स्वदेशी दुग्ध नस्ल है, जिसका मूल निवास गुजरात के कच्छ जिले का बन्नी घासभूमि क्षेत्र है। यह क्षेत्र अत्यधिक कैल्शियमयुक्त, लवणीय तथा रेतीली-दोमट मिट्टी वाला है, जहाँ जल धारण क्षमता कम, पारगम्यता कम और मृदा क्षरण की संभावना अधिक रहती है। इतनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद यह नस्ल यहाँ के वातावरण में अद्भुत रूप से ढल चुकी है और स्थानीय मालधारी पशुपालकों की जीवन-पद्धति का अभिन्न हिस्सा है।
उत्पत्ति और इतिहास
मान्यता है कि लगभग 500 वर्ष पूर्व मालधारी समुदाय अफगानिस्तान के हलीएब क्षेत्र से अपने पशुओं के साथ चरागाह की खोज में कच्छ आया। समय के साथ ये भैंसें स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप विकसित हुईं और जिस क्षेत्र में इनका पालन हुआ, उसी के नाम पर इन्हें “बन्नी” कहा जाने लगा।
भौगोलिक विस्तार
यह नस्ल मुख्यतः गुजरात राज्य के कच्छ जिले में पाई जाती है, जो लगभग 68°56′ से 70°32′ पूर्व देशांतर और 23°19′ से 23°52′ उत्तर अक्षांश के बीच स्थित है। यहाँ का अर्ध-शुष्क और चरागाह आधारित पारिस्थितिकी तंत्र इस नस्ल के विकास में निर्णायक रहा है।
मुख्य उपयोग
बन्नी भैंस का प्रमुख उपयोग दूध उत्पादन है। सीमित संसाधनों में भी यह संतोषजनक उत्पादन देती है, इसलिए यह कम लागत वाली दुग्ध प्रणाली के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
शारीरिक विशेषताएँ
बन्नी भैंस का रंग सामान्यतः काला होता है, हालांकि कुछ पशुओं में तांबे जैसी आभा भी दिखाई देती है। इसके सींग मध्यम से बड़े आकार के, भारी तथा ऊपर की ओर मुड़े हुए होते हैं, जिनमें एकल या द्वि-घुमाव (coil) दिखाई देता है। वयस्क पशुओं में सींग का व्यास लगभग 24 से 30 सेमी तक होता है, जो इस नस्ल की पहचान है।
औसतन नर की ऊँचाई लगभग 138 सेमी और मादा की 137 सेमी होती है। मादा का शरीर अपेक्षाकृत लंबा होता है, जो दुग्ध उत्पादन के लिए अनुकूल माना जाता है। इनका वक्ष (heart girth) भी मजबूत होता है, जो लंबी दूरी तक चरने की क्षमता प्रदान करता है।
प्रबंधन पद्धति
इस नस्ल का पालन मुख्यतः विस्तृत (Extensive) प्रणाली में किया जाता है। बन्नी क्षेत्र की विशेषता है कि भैंसों को रात में चराया जाता है, जिससे दिन की तीव्र गर्मी से बचाव होता है और उपलब्ध प्राकृतिक घास का बेहतर उपयोग हो पाता है।
अधिकांश मालधारी 15 से 25 पशुओं के झुंड रखते हैं, हालांकि यह संख्या 10 से लेकर 100 या 150 तक भी हो सकती है। कच्छ के कुछ अन्य भागों में अर्ध-गहन (Semi-intensive) प्रणाली भी अपनाई जाती है, जहाँ दुग्ध देती या गर्भित भैंसों को अतिरिक्त आहार दिया जाता है।
उत्पादन क्षमता
बन्नी भैंस सीमित संसाधनों में भी अच्छी दुग्ध उत्पादक मानी जाती है। औसतन पहली बार ब्याने की आयु लगभग 40.3 माह है और बियान अंतराल लगभग 12.24 माह रहता है, जो इसकी प्रजनन क्षमता को दर्शाता है।
प्रति दुग्धावधि औसत दूध उत्पादन लगभग 2,857 किलोग्राम दर्ज किया गया है, जबकि यह 1,095 किलोग्राम से लेकर 6,054 किलोग्राम तक भी पाया गया है। इसके दूध में औसतन 6.65 प्रतिशत वसा होती है, जो कुछ मामलों में 12 प्रतिशत से अधिक तक पहुँच जाती है। उच्च वसा के कारण इसका दूध घी, मावा तथा पारंपरिक दुग्ध उत्पादों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
पर्यावरणीय अनुकूलन
यह नस्ल स्थानीय जलवायु और चरागाह आधारित जीवनशैली के अनुरूप अत्यधिक अनुकूलित है। लवणीय भूमि, सीमित जल संसाधन और प्राकृतिक चराई पर निर्भरता जैसी परिस्थितियों में भी यह जीवित रहकर उत्पादन देने की क्षमता रखती है। यही विशेषता इसे जलवायु परिवर्तन के दौर में एक महत्वपूर्ण “क्लाइमेट-रेजिलिएंट” पशुधन बनाती है।
संगठन और संरक्षण
इस नस्ल का पंजीकरण किया जा चुका है तथा इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए “बन्नी पशु उचेरक मालधार संघठन” कार्यरत है। यह संस्था समुदाय आधारित प्रजनन और नस्ल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
जनसंख्या स्थिति
2007 की 18वीं पशुधन गणना के अनुसार इस नस्ल की संख्या लगभग 5,25,115 थी। वर्ष 2013 के अनुमान में यह संख्या घटकर लगभग 2,39,572 रह गई, जो नस्ल संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
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