जरबेरा फूल की खेती

भारत में जरबेरा कटफूल के प्रमुख उत्पादक राज्य
पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, गुजरात, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल और अरुणाचल प्रदेश।
मिट्टी
मिट्टी अच्छी तरह से सूखी, हल्की, उपजाऊ, हल्की क्षारीय या प्रकृति में तटस्थ हो। जरबेरा की खेती के लिए पीएच का मान 5.5 से 6.5 सबसे उपयुक्त मानी जाती है। जरबेरा पौधे की जड़ें मिट्टी के काफी अंदर तक जाती है (करीब 60 सेमी), ऐसे में मिट्टी सुराखदार होनी चाहिए और आंतरिक जल निकासी (50 सेमी गहराई) अच्छी होनी चाहिए ताकि जड़ों का विकास सर्वोत्कृष्ट हो सके।
खेत की तैयारी
देसी हल या ट्रैक्टर से खेत की तीन बार अच्छी तरह से जुताई करें ताकि खेत अच्छी तरह से तैयार हो जाए। क्यारी को 30 सेमी ऊंचा, एक मीटर से डेढ़ मीटर तक चौड़ा और दो क्यारियों के बीच 35 से 50 सेमी की जगह छोड़ते हुए तैयार करें। अच्छी तरह से गला हुआ फार्म की खाद, बालू और धान की भूसी को 2:1:1 के अनुपात में मिलाकर तैयार की हुई क्यारियों पर डालें।
पौध रोपण का मौसम
जरबेरा की खेती बसन्त ऋतु के साथ-साथ ग्रीष्म ऋतु में भी की जा सकती है। जरबेरा को अच्छी और अधिकता के साथ रोशनी की जरूरत होती है, डेढ़ वर्षीय ऊतक संवर्धन के लिए इसकी रोपाई बसन्त ऋतु में (जनवरी से मार्च) करने से बहुत अच्छा रहता है। एक, डेढ़ और दो वर्षीय ऊतक संवर्धन के लिए ग्रीष्म ऋतु (जून से जुलाई) अनुकूल मानी जाती है। रोपाई या पौधा रोपण के लिए शरद और शीत ऋतु (नवंबर से दिसंबर) की अनुशंसा नहीं की जाती है क्योंकि इस दौरान उच्च तापमान खर्च होता है और रोशनी की अधिकता में कमी पाई जाती है। अगस्त के आखिरी में या सितंबर में रोपाई के काम को नजरअंदाज करना चाहिए क्योंकि यह शीत ऋतु को बर्दाश्त नहीं कर सकता है।
प्रजनन या प्रसारण
व्यावसायिक तौर पर जरबेरा के पौधा का प्रजनन पौधे की महीन जड़ (चूसक) और ऊतक संवर्धन के माध्यम से होता है। जरबेरा की खेती में दो तरीके के प्रजनन का इस्तेमाल किया जाता है, विभाजन और सूक्ष्म प्रजनन का। विभाजन- इस पद्धति में, प्रजनन जून-जुलाई महीने में पेड़ों के झुरमुट या गुच्छ में विभाजन करके किया जाता है और इसी पद्धति का आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
सूक्ष्म प्रजनन
तेज और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए यह पद्धति दिन-ब-दिन बहुत तेजी से लोकप्रिय होती जा रही है। इस पद्धति में फूल का सिर, शाखा का सिरा, फूल की कली, पुष्पवृन्त, फुनगी (बाली) और पत्ती की बीच वाली नस का इस्तेमाल पूर्ववर्ती पौधे के तौर पर की जाती है।
पौध रोपण की पद्धति
क्यारी में जरबेरा की खेती हवा के बहाव और जल निकास को बेहतर करता है। पौध रोपण के दौरान जब जड़ की व्यवस्था स्थापित होती है उस वक्त जरबेरा के पौधे के शिखर को मिट्टी के स्तर से एक से दो सेमी ऊपर रखना चाहिए और जमीन के स्तर से नीचे रखना चाहिए।
दो पौधों में अंतराल
पंक्तियां कतार के भीतर 25 से 30 सेमी का अंतराल और कतारों के बीच 30 से 40 सेमी की दूरी होनी चाहिए ताकि प्रति वर्गमीटर 7 से 10 पौधे आ जाएं।

जरबेरा एक विदेशी और सजावटी फूल का पौधा है जो पूरी दुनिया में उगाया जाता है और इसे ‘अफ्रीकन डेजी या ट्रांसवाल डेजी’ के नाम से जाना जाता है। इस फूल की उत्पत्ति अफ्रीका और एशिया महादेश से हुई है और यह कंपोजिटा परिवार से संबंध रखता है। भारतीय महाद्वीप में जरबेरा कश्मीर से लेकर नेपाल तक 1200 मीटर से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसकी ताजगी और ज्यादा समय तक टिकने की खासियत की वजह से इस फूल का इस्तेमाल पार्टियों, समारोहों और बुके में किया जाता है। भारत के घरेलू बाजार में इसकी कीमत काफी अच्छी है।

खाद और उर्वरक
जरबेरा फूल की अच्छी बढ़त और बेहतरीन पैदावार के लिए खेत में भरपूर मात्रा में जैव खाद और दूसरे महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण पोषक तत्व इस्तेमाल करें। जरबेरा की खेती में डाले जाने वाले खाद और ऊर्वरक की मात्रा निम्न है-

  • प्रति वर्गमीटर 8 से 9 किलोग्राम फार्म की खाद का इस्तेमाल करें।
  • पौधा रोपन के शुरुआती तीन महीनों के दौरान नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश (एनपीके) का 12:15:20 ग्राम इस्तेमाल करें।
  • चौथे महीने के बाद जब फूल आना शुरू हो जाता है तब नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश (एनपीके) 15:10:13 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रति महीना इस्तेमाल करें। इन्हें दो-दो टुकड़े में बांट दें और प्रति दो सप्ताह के अंतराल पर इस्तेमाल करें।
  • सूक्ष्म-पोषक तत्वों का इस्तेमाल करें- कैल्सियम, बोरान, कॉपर और मैग्नेशियम 0.15 फीसदी की दर से प्रति लीटर 1.5 ग्राम होना चाहिए जिन्हें चार सप्ताह में एक बार छिड़काव करें। इससे जरबेरा फूल की गुणवत्ता काफी बढ़ जाती है।

सिंचाई
पौध रोपण के तुरंत बाद सिंचाई की जरूरत होती है और जड़ें अच्छी तरह से जड़ जमा ले इसके लिए एक महीने तक लगातार सिंचाई करते रहें। उसके बाद प्रति दो दिन पर एक बार टपक सिंचाई की जानी चाहिए। इसमें ंप्रति पौधा 4 लीटर 15 मिनट के लिए सिंचाई की जानी चाहिए। प्रति पौधा प्रतिदिन पानी की औसत जरूरत 700 मिली लीटर होती है।
घास-फूस नियंत्रण
जरबेरा की खेती में घास-फूस नियंत्रण एक महत्वपूर्ण अभियान है और यह कार्य पौधा रोपन की शुरुआत के तीन महीने तक दो सप्ताह में एक बार करना चाहिए। तीन महीने के बाद, अगला घास-फूस नियंत्रण का कार्य 30 दिनों के अंतराल पर किया जाना चाहिए। जब कभी जरूरत हो हाथ से घास-फूस को निकालने का काम करना चाहिए। निम्न घास-फूस नियंत्रण अभियान का पालन करें-

  • आठ सप्ताह (दो महीने) के जरबेरा फूल की कली को निकाल दें और उसके बाद पुष्पन यानी विकसित होने के लिए छोड़ दें।
  • जड़ों में पानी, खाद के अच्छी तरह अवशोषण के लिए और जड़ों में हवा के अच्छी तरह आवागमन के लिए दो सप्ताह में एक बार मिट्टी को उलट-पलटकर दें।
  • हमेशा पुरानी पत्तियों को हटा दें ताकि नई पत्तियां विकास कर सकें।

फसल कटाई
आमतौर पर पौधा रोपन के तीन महीने के बाद जरबेरा के पौधे में पुष्पण शुरू हो जाता है। जब फूल पूरी तरह खुले हुए होते हैं या डंठल में बाहरी फूल की दो से तीन कतारें सीधी खड़ी रेखा में आ जाती हैं तब फसल की कटाई की जाती है। फूल की जिंदगी को और लंबा करने के लिए फूल के डंठल को सोडियम हाइपोक्लोराइड (6 से 7 मिली प्रति एकली टर में) के घोल में पांच घंटे के लिए डूबा देना चाहिए।
फसल कटाई के बाद
डंठल के आधार से करीब दो से तीन सेमी ऊपर काटना चाहिए और उसे ताजा क्लोरीन मिले पानी में रखना चाहिए। फूल को छांट लेना चाहिए, एकरुपता के लिए क्रम में लगा देना चाहिए और कार्टून के बक्से में पैक कर देना चाहिए।
पैदावार
कोई भी फसल की पैदावार खेत प्रबंधन के तौर-तरीकों और मिट्टी की किस्मों पर निर्भर करता है। खुले तौर पर और पौधा घरों में जरबेरा की खेती करने से निम्न पैदावार होती है-

  • खुले मैदान में या जालीदार शेड की खेती- 140 से 150 कटे हुए फूल प्रति वर्गमीटर प्रति साल पैदावार की आस होती है।
  • पौधा घरों में खेती- 225 से 250 कटे हुए फूल प्रति वर्गमीटर प्रति साल हासिल किया जा सकता है।

यह एक बेहतरीन फायदेमंद उगाई जाने वाली फसल है जिसका पूरे भारत में और स्थानीय बाजार में भी बेहतरीन मूल्य मिलता है।

भारत में जरबेरा की अधिक उपजाऊ वाली संकर किस्में-
लाल रंगीन- रुबीरेड, डस्टी, शानिया, साल्वाडोर, तमारा, फ्रेडोरेल्ला, वेस्टा और रेड इम्पल्स
पीला रंगीन- सुपरनोवा, नाडजा, डोनी, मेमूट, यूरेनस, फ्रेडकिंग, फूलमून, तलासा और पनामा
नारंगी रंगीन- कोजक, केरैरा, मारासोल, ऑरेंज क्लासिक और गोलियाथ
गुलाबी रंगीन- रोजलिन और सल्वाडोर
मलाई रंगीन- फरीदा, डालमा, स्नोफ्लेक और विंटरक्वीन
सफेद रंगीन– डेल्फी और व्हाइट मारिया
बैंगनी रंगीन- ट्रीजर और ब्लैक जैक
गुलाबी रंगीन– टेराक्वीन, पिंक एलीगेंस, एसमारा, वेलेंटाइन और मारमारा
  • मनीष कुमार मीना
  • जगदीश प्रसाद राठौर
  • राहुल बायडवाल
  • मनोज कुमार मीना
  • पवन कुमार नागर
    email : jagdishrathore300@gmail.com

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