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किसान ही दण्डित क्यों ?

अवशेष जलाना आवश्यक क्यों

  • आज से लगभग 40 वर्षों पूर्व फसलों की बुआई, निकाई, गुड़ाई तथा कटाई बैलों की मदद से और हाथों द्वारा की जाती थी परंतु यंत्रीकरण होने के कारण कृषि के अधिकतम कार्य मशीनों से होने लगे। गेहूं, धान की कटाई जब हाथ से की जाती थी उस समय खेत में कुछ अवशेष खेतों में रह जाते हैं और इन अवशेषों को गहरी जुताई कर खेत में सड़ाने में कम से कम एक से डेढ़ माह लगता है और किसान की बाध्यता है कि उसे एक से डेढ़ माह अवशेषों के सडऩे का इंतजार किये बिना अगली फसल बोने की आतुरता है अत: कृषक के पास फसल के अवशेषों को जलाकर नयी फसल बोने का विकल्प ही शेष बचता है और वह अवशेषों को जलाकर अगली फसल बो देता है।
  • खेत में बचे अवशेषों का जलाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इन अवशेषों के खेत में पड़े रहने या प्राकृतिक रूप से सडऩे में समय लगने के कारण, हानिकारक कीटों के अंडे, लार्वा, प्यूपा आश्रय ले लेते है अत: अवशेष जलने से कीट नियंत्रण हो जाता है।
  • कुछ कीट जैसे मिलीबग के लार्वा अंडे, खेतों के इर्द-गिर्द खड़ी झाडिय़ों में आश्रय लिये होते है और अवशेषों के जलने से ये भी नष्ट हो जाते है और अगली फसल को हानि नहीं पहुंचा पाते।
  • अवशेष को खेतों में जलाने का यह भी लाभ होता है कि बहुवर्षीय, निष्ठुर खरपतवार जैसे पारथेनियम, कांग्रेस घास, बथुआ, जंगली जई, गेहूं का मामा आदि कीट तथा खरपतवार नियंत्रण में कम व्यय करना पड़ता है और उत्पादन लागत कम आती है।
  • खेतों में अवशेष न जलाये जाये तो उनको एकत्र करने में कृषक का श्रम और समय दोनों लगते हैं जिससे अगली फसल की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। खेत के किनारे इन अवशेषों में कीट और व्याधियों के जीवाणु आश्रय लेते हैं और अगली फसल में हानि करते है।
    प्रदूषण – फसलों के अवशेष जलाने से वायुमंडल प्रदूषित हो जाता है। और कार्बन मोनो आक्साईड तथा कार्बन डाईआक्साईड गैसों की वातावरणन में अधिकता हो जाती है। यह प्रदूषण पी.एम. 2.5 तक हो जाता है। ग्रामीण आंचल के प्रदूषण से वातावरण में स्मोग बनता है जिससे दृश्यता बाधित होती है परंतु शहरों में दीवाली, होली, दशहरा, गुरू महोत्सव त्यौहारों पर, शादी के अवसर पर पटाखे पटखाने से प्रदूषण होता है। राजनैतिक पार्टियों के विजय अवसर पर अत्याधिक आतिशबाजी होती है जो टी.वी. के माध्यम से दिखाई भी जाती है जिससेसल्फर आक्साईड तथा डाईआक्साइड गैसे निकलती है जो घनी बस्तियों में प्रदूषण करती है और जनजीवन के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है।
मनुष्य का अच्छा स्वास्थ्य अमूल्य थाती है। स्वस्थ जीवन के लिये आवश्यक कारकों जैसे खान-पान, रहन-सहन आदि के अलावा स्वस्थ वातावरण भी आवश्यक है। प्रदूषित वातावरण स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। प्रदूषण कई प्रकार का होता है जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, बी.टी. प्रदूषण, वायु प्रदूषण अत्यंत हानिकारक है क्योंकि हर क्षण श्वास लेने से प्रदूषित वायु प्राणों में जाती है। वायु शुद्ध रहे इसके लिये सरकारें नियम बनाती हैं और समय-समय पर अभियान चलाकर जनमानस को जागृत करती रहती हैं। इसी क्रम में आजकल किसानों को अपने खेतों में फसल के अवशेष न जलाने का अभियान चला रखा है अभियान ही नहीं बल्कि जो किसान फसल का अवशेष जलाते हैं सरकार उनको दंडित भी कर रही है।

प्रदूषण रोकने के प्रयास – आजकल प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वरा राज प्रमुखों तथा राजनेताओं के चित्रों के साथ प्रदूषण को रोकने के लिये कृषकों द्वारा फसलों के अवशेषों को जलाने से होने वाले प्रदूषण के दुष्प्रभावों से अवगत कराया जा रहा साथ ही कृषकों को अपराधिक दंड संहिता की धारा 188 के तहत दंड से अवगत किया जा रहा है। जिला अधिकारियों को ऐसे कृषकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश देकर कृषकों को दंड देने जुर्माना या सजा के आदेश दिये जा रहे हैं। मलेरिया उन्मूलन अभियान, जनसंख्या नियंत्रण अभियान या पोलियो नियंत्रण जैसे अभियान के रूप में कृषकों की फसल अवशेषों को न जलाने के प्रति जागृत करने तक तो ठीक है। परंतु इसे अपराधिक कार्यवाही कर जुर्माना या हर्जाना देने और सजा देने की कार्यवाही करना अनुचित है। ये कार्यवाही उन कृषकों के प्रति किये जा रहे जो तपती धूप और हाड़ फोड़ ठंड में फसलों में विभिन्न तरीके से अपनी सामथ्र्य से ज्यादा धन लगाकर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास कराते हैं और देश की जनता को खाने के लिये अन्न, सब्जी, फल, दालें तथा तन ढकने के लिये वस्त्र उपलब्ध करता है इतना ही नहीं सामथ्र्य न होने पर ऋण लेकर धन लगाते हैं और उस पर फसल न आने पर असमय मृत्यु का आलिंगन करना पड़ता है। उस निरीह किसान पर जुर्माना लगाना, एफ.आई.आर. करना तथा सजा देना उसके दुखों/जख्मों पर नमक छिड़कना नहीं है?
शहरियों पर ऐसी कार्यवाही क्यों नहीं ? – शहरों में विभिन्न त्यौहारों विवाहोत्सव तथा राजनैतिक पार्टियों द्वारा विजयोत्सव पर पटाखों से होने वाला वायु तथा ध्वनि प्रदूषण गांव में फसल के अवशेषों से उत्पन्न प्रदूषण से अधिक घातक है क्योंकि उसमें गंधक मिश्रित गैसों की अधिकता होती है परंतु कृषकों की तरह शहरियों पर अपराधित दंड संहिता की धारा 188 के तहत कार्यवाही क्यों नहीं? पंजाब में 575 कृषकों से अब तक 4.12 लाख जुर्माना वसूला गया। हरियाणा में एक समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ है कि 296 किसानों को खेतों के अवशेष जलाने के लिये नोटिस दिया गया तथा 43 कृषकों से 1.27 लाख रुपये जुर्माना भी वसूला गया। ऐसा करना वास्तव में सही होता यदि शहरों में भी प्रदूषण को फैलाने वालों से जुर्माना लिया जाता। कृषकों के बारे में ऐसे समाचार देकर वाहवाही लूटने वाले शहरों में घनी आबादियों में होने वाले प्रदूषण के बारे में भी दंड के लिये क्यों नहीं बोलते। किसान और शहर में रहने वाले दोनों अपराध तो एक समान ही करते है। शहरों में प्रदूषण फैलाने पर कोई अर्थदंड नहीं लगाया गया है। अत: प्रश्न उठता है कि प्रदूषण के लिये कृषक ही अपराधी क्यों माना जाता है?
राष्ट्रीय वनों में आग लगने से भी प्रदूषण होता है। वनों के संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार की होती है अत: वनों के जलने से होने वाले प्रदूषण के लिए किसी वन अधिकारी को आज तक जिम्मेदार नहीं ठहाराया गया। शहर में वाहनों की अधिकता के कारण वाहन चालक या ट्रैफिक इंस्पैक्टर को आज तक दोषी नहीं माना जाता फिर कृषक पर ही खूंटी या अवशेष जलाने पर आपराधिक कार्यवाही क्यों?

  • आर.बी. सिंह, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत्त),  नेशनल सीड्स कारपोरेशन लि., हिसार (हरियाणा)
  • मो.: 9466746625, 8607275991

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