रबी मक्का लाभकारी क्यों ?

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रबी मौसम कृषि कार्य योजना बनाकर सभी कार्य समय पर कर सकते हैं। जिसमें बुआई, सिंचाई, जल निकास, खरपतवार प्रबंधन, अन्तराशस्य क्रियायें, मिट्टी चढ़ाना, खाद/उर्वरक देना एवं सूर्य प्रकाश की उपलब्धता का होना, जिससे पौधों के बढ़वार में पूरी अनुकूलता मिलने से बीमारी एवं हानिकारक कीटों से होने वाले पौधों को नुकसान कम होता है, परिणामस्वरूप अधिक उत्पादन की प्राप्ति की जा सकती है।
रबी मौसम में अनुकूल वातावरण (तापमान)
रबी मौसम में दिन छोटे परंतु कम तापमान के साथ ही साथ पूर्ण सूर्य ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इसी कारण रबी मौसम में पौधा अपनी क्षमता का उत्पादन देने में सक्षम हो जाता है। जिससे फसल की अवधि बढ़कर उत्पादन का स्तर बढ़ाने में सहायक होता है। इसके विपरीत खरीफ मौसम में अधिक तापमान, बादल वाले दिन एवं धूप-छांव वाली परिस्थिति के कारण पौधों की बढ़वार अच्छी तरह नहीं हो पाती। फलस्वरूप उत्पादन में कमी आती है और फसल अवधि भी कम हो जाती है।

भारत में वर्तमान में खरीफ मक्का फसल 60 लाख हेक्टर क्षेत्र में उगाई जाती है। नित नये होने वाले अनुसंधान से यह सिद्ध हो गया है कि मध्यप्रदेश में मक्का की फसल वर्ष भर सफलतापूर्वक ली जा सकती है और उत्पादकता का उच्चांक प्राप्त किया जा सकता है। खरीफ की तुलना में रबी फसल का उत्पादन अधिक हैं। मक्का अनुसंधान निदेशालय द्वारा विकसित/अनुशंसित जातियाँ एवं क्षेत्र विशेष में क्षेत्रवार फसल पद्धति में अनुसंधान कर बेहतर कृषि फसल प्रबंधन द्वारा अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

आवश्यक पौध संख्या की प्राप्ति
उचित समय पर कृषि कार्य होने के कारण एवं कीट एवं रोगों की कमी में उचित पौध संख्या बनी रहती है क्योंकि पोषण तत्वों की अधिक उपलब्धता एवं सिंचाई व्यवस्था अच्छी होने से पौधे कम नहीं होते तथा उचित पौध संख्या के कारण पौधों को बढ़वार का पूरा अवसर मिलता है। जिससे कुल उत्पादन अधिक प्राप्त होता है।
किस्में – जे.एम.-13, ज.ने.कृ.वि.वि. द्वारा विकसित अवधि 135-150 दिन, 60-65 क्वि./हे. रबी खरीफ दोनों के लिये उपयुक्त।
बुलंद – रबी मक्का का 178 दिन में पकने वाली किस्म उपज 31 क्विंटल/हेक्टर।
प्रताप-1 – पकने की अवधि 180 दिन, उपज 25 क्विंटल/हेक्टर
पी.एम.एच.-9- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित अवधि- 180 दिन, उपज 32 क्विं./हे.।
खरपतवार समस्या में कमी
रबी मौसम में खरीफ की अपेक्षा खरपतवार कम निकलते हंै। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को रसायनिक विधि से नींदा नियंत्रण आसानी से किया जा सकता है। नियंत्रित सिंचाई के होने से, समय पर निंदाई कार्य आसानी से कर सकते हैं जिससे परोक्ष रूप से होने वाले पोषक तत्वों का सद्पयोग प्रभावी रूप से होता है।
उचित जल प्रबंधन
आवश्यकतानुसार सिंचाई एवं जल निकास का उचित प्रबंध होने से पानी का भराव पौधों के पास न होने के कारण पौधों का नुकसान नहीं हो पाता जबकि खरीफ में अतिवर्षा या असमय वर्षा फसल को काफी प्राभावित करते हैं। नियंत्रित सिंचाई एवं जल निकास की व्यवस्था से फसल को बढऩे के लिये अच्छा वातावरण प्रदाय किया जा सकता है।
खाद
खाद हेतु उपलब्ध सड़ी हुई गोबर खाद, कम्पोस्ट या केंचुआ द्वारा बनी खाद का प्रयोग करना जरूरी है। क्योंकि मक्का को पानी का भराव एवं पानी की कमी इन दोनों दशाओं के प्रति अति संवेदनशील है। इन परिस्थितियों में खाद ही एक मात्र उपाय है। जो भी मात्रा दें बुवाई के समय कतारों में दे जिससे फसल को सीधा फायदा हो। मात्रा हेतु अनुमानत: 8 से 10 टन की आवश्यकता होती है।
जहां संभव हो हरी खाद का प्रयोग भी अवश्य करें। मक्का फसल में हरी खाद के रूप में एक अनुपात में ढेंचा या बोरु (सन) लगाकर 35 से 55 दिन में 5 से 9 टन हरी खाद की प्राप्ति की जा सकती है जबकि मक्का फसल की प्राप्ति 100 प्रतिशत होती है।
अन्तरवर्तीय फसल पद्धति
मौसम एवं जाति की अवधि के अनुसार मक्का को एक अंतरवर्तीय फसल के अनुसार अलग से खाद दें।
रसायनिक खाद देने की पद्धति
नत्रजन की एक तिहाई मात्रा एवं पूरी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश बुवाई करते समय सस्ते से कतार में दें। शेष दो तिहाई में से एक तिहाई नत्रजन 25 से 30 दिन पर एवं गुड़ाई 45 से 50 दिन पर खड़ी मक्का फसल में दें। खेत में पानी भरने की दशा में एवं निंदाई गुड़ाई में देरी होने पर नत्रजन 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर निश्चित रूप से दें। अन्यथा एक से दो छिड़काव 2 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव करना फायदेमंद होगा।
पोषक तत्वों का फसल द्वारा समुचित उपयोग
सिंचाई एवं जल निकास नियंत्रित होने से पोषक तत्वों का हृास नहीं होता है, एवं सही उपयुक्त समय पर पोषक तत्वों को फसल को देने की कार्ययोजना बनाई जा सकती है। इसलिये रबी में नत्रजन एवं अन्य पोषक तत्वों के परिणाम अच्छे मिलते हैं। वर्षाकाल में सूखे की अवस्था के कारण कई बार खाद देने का समय निकल जाता है। वहीं अतिवृष्टि में जलमग्नता के कारण भूमि तथा उर्वरकों, पोषक तत्वों का हृास होता है, परिणाम में प्रति इकाई खाद उपयोग फसल नहीं कर पाती हैं।

कीट एवं बीमारियों की कमी
रबी मौसम में खरीफ की तुलना में कम कीट एवं बीमारियाँ आती हैं, जिसका मुख्य कारण है कम तापमान, उचित नमी खरपतवारों की कमी एवं अच्छा फसल प्रबंधन के कारण फसलों की कम हानि होती है तथा उत्पादन पूरा मिलता है।
रबी में प्रदेश की मुख्य फसल है, गेहूं जो कि वर्षों से खेती करते आ रहे हैं। रबी में मक्का बोने के लिए जब किसानों से कहा जाता है तो उनका एक ही स्वाभाविक प्रश्न है कि क्या हम परम्परागत गेहूं की खेती छोड़कर रबी में मक्का अपनाएं। अत: उसकी शंका के समाधान या मार्गदर्शन में निम्न तथ्य प्रस्तुत हैं:-
  • गेहूं फसल के समय ही, अनाज मक्का फसल लेकर अनाज एवं चारा दोनों प्राप्त कर सकते हैं।
  • गेहूं की तुलना में बीज की लागत कम लगती है जबकि खाद एवं बुआई कार्य का समय एक ही है।
  • जहां वर्षों से गेहूं उगाया जा रहा है वहां जंगली जई एवं गेहूं का मामा जैसे खरपतवार एक समस्या मूलक बन जाते हैं जिनको 1-2 वर्षों में मक्का लेने पर समस्या का समाधान हो पाता है। गेहूं फसल में प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार पहचानना संभव नहीं है तथा बीज बनने पर किसान उसको उखाड़ नहीं पाता है जबकि मक्का फसल में पहचानकर हाथ से उखाड़ सकते हैं जबकि चौड़ी कतार होने से बखर डोरा से नियंत्रण कर सकते हैं।
  • मक्का फसल 100 प्रतिशत लेकर उसमें 50 प्रतिशत सब्जी, फूल के पौधे, मटर, प्याज या आलू आदि ले सकते हैं जबकि गेहूं फसल में अंतरवर्तीय फसल लेने पर मुख्य फसल गेहूं 100 प्रतिशत नहीं ले पाते हैं।

  • सब्जी उगाने वाले किसान मक्का में 50 प्रतिशत भाग में सब्जी ले सकते हैं जबकि मक्का का उत्पाद 100 प्रतिशत प्राप्त होता है।
  • आर्थिक विश्लेषण करने पर पाया गया है कि सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर गेहूं की फसल की तुलना में मक्का फसल से अधिक लाभ है।
  • गेहूं फसल कटाई के बाद भूसा (चारा सूखा) प्राप्त होना है किंतु मक्का के भुट्टे तुड़ाई कर हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं।
  • पानी की कमी की दशा में मक्का को 35-55 दिन पर हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं। 85-90 दिन पर बेबीकार्न के साथ हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं एवं 120-125 दिन पर हरे भुट्टे के साथ हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं। जबकि सिंचाई की कमी होने पर गेहूं से सिर्फ भूसा एवं थोड़ा सा कम गुणवत्ता का अनाज प्राप्त कर सकते हैं।
  • विशेष परिस्थिति में जब तेज हवा, तूफान या ओले गिरने की दशा में मक्का फसल में न के बराबर हानि होती है जबकि गेहूं फसल गिर जाती है, जिससे दानों की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
  • सिंचाई की कमी की दशा में एक कतार छोड़ पद्धति से सिंचाई कर 40-60 प्रतिशत तक जल की बचत कर सकते हैं जो कि गेहूं में संभव नहीं है।
  • गेहूं फसल समान ही मक्का फसल की गहाई थ्रेसर से कर सकते हैं। मात्र थोड़ा सा सुधार करना पड़ता है। थ्रेसर में दाने निकालते समय मक्का के भुट्टे के छिलके निकालने की आवश्यकता नहीं रहती है अत: इसमें श्रम की बचत भी होती है एवं दाने टूटते नहीं है।
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