पीला मोजेक वायरस फैलने का कारण सफेद मक्खी

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रोग फैलने का कारण :
यह रोग खरीफ मौसम की सोयाबीन, मूंग, उड़द, अरहर, फ्रेंचबीन व कुछ अन्य खरपतवारों जैसे-गोखरू पर भी आता है। अरहर लम्बी अवधि की होने के कारण इस रोग का मुख्य जरिया है। जिन क्षेत्रों में मूंग, गर्मियों में लगाते हंै, वहां इस रोग का विषाणु सोयाबीन पर आसानी से आकर रोग फैलाता है। इस रोग का संचारण सफेद मक्खी द्वारा होता है। यह सफेद पंख व पीले शरीर वाली छोटी मक्खी 1 मिली मीटर से भी छोटी होती है। सफेद मक्खी (व्हाइट फ्लाय) वायरस स्थानांतरण द्वारा बीमारी फैला रही है। इसमें फ्लाई मक्खी पौधों के पत्ते पर बैठकर रस चूस लेते हैं। लार वहीं छोड़ देने से बीमारी का प्रकोप बढ़ता है।

फसलों में विषाणु रोगों के प्रकोप से काफी नुकसान होता है। विषाणु रोगों का महत्व इसलिये भी अधिक है क्योंकि इनके रोगकारक विषाणु का दायरा विस्तृत होता है तथा कई फसलों पर रोग उत्पन्न करते हैं। साथ ही इनका प्रसारण भी सुगमता से कीटों द्वारा, यांत्रिक विधियों व अन्य माध्यम से हो जाता है । इससे पैदावार कम हो रही है और 3-4 दिन के अन्दर पूरे खेत में फैल जाता है और सम्पूर्ण फसल पीली पड़ जाती है। 90 प्रतिशत से ज्यादा मिर्च की फसल में वायरस को फैलाने में सफेद मक्खी की भूमिका रही है। बीजों का उचित उपचार नहीं किया जाना, साथ ही जानकारी का अभाव, लंबे समय तक पडऩे वाला सूखा भी वायरस को फैलाने में सहयोगी रहता है। किसानों द्वारा अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग, बिना जानकारी के कीटनाशकों के मिश्रण का छिड़काव, किसानों द्वारा लगातार एक ही फसल का लिए जाना एवं फसल चक्र का न अपनाया जाना आदि कारण है। सब्जी की फसलों पर कीटाणु और वायरस अटैक से उड़द, सोयाबीन, मूंग, भिंडी, पपीता, मिर्च, आलू, कद्दूवर्गीय सब्जियों आदि को नुकसान हो रहा है। सब्जी की फसलों में वायरस आक्रमण एवं कीटों के प्रकोप से गुणवत्ता प्रभावित हुई है। वायरस आक्रमण की स्थिति में विभिन्न सावधानियों द्वारा सब्जियों को प्रतिकूल प्रभाव से बचाया जा सकता है।

रोग के लक्षण :
रोगग्रस्त पौधे की पत्तियों की नसें साफ दिखाई देने लगती हैं। उनका नरम पन कम होना, बदशक्ल होना, ऐंठ जाना, सिकुडऩे सहित अन्य लक्षण साफ दिखाई देते हैं। इसमें पौधों की पत्तियां भी खुरदुरी हो जाती हैं। मोटापन लिए गहरा रंग धारण कर लेती हैं और पत्तियों पर सलवट पड़ जाती है। कुछ पौधों में चितकबरे गहरे हरे-पीले धब्बे दिखाई देते हैं और एक-दो दिन बाद में संपूर्ण पौधे ऊपर से बिल्कुल पीले हो जाते हैं। उड़द मूंग की फसल में इस रोग के प्रति अति संवेदनशील हैं। जबकि सेमीलूपर कीट में इल्लियों का प्रकोप देखा जाता है। यह इल्लियां गहरे भूरे रंग की शरीर के ऊपरी भाग पर लम्बवत होती हैं। कीट को ऊपर उठाकर अद्र्ध लूप बनाती हुई चलती हैं। यह इल्लियां पत्तियों को कुतरकर छन्नी कर देती हैं। इस कीट का अग्र भाग पतला और पिछला भाग मोटा होता है जो अद्र्ध कुंडली बनाकर चलती है। अधिक प्रकोप की स्थिति में इस कीट की इल्लियों द्वारा कली, फूल, फली को खाकर खेत में नमी कम होने से फसल में बांझपन भी जाता है।

 

 

 

 

 

रोकथाम के उपाय:
कर्षण क्रिया विधि :
  • किसानों को खेत में रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर पर्णकुंचित पौधे को उखाड़कर गड्डे में डालकर मिट्टी से ढंक दे।
  • खेत में सफेद मक्खी को आकर्षित करने के लिए प्रति हेक्टेयर 5-6 पीले प्रपंच चिपचिपे टेग लगाये।
  • मिर्च की फसल के आस-पास या जाल के रूप में गेंदे को रोपे। मिर्च की 15 लाईन के बाद एक लाईन गेंदे की लगाये।
  • परभक्षी पक्षियों को आकर्षित करने के लिए टी आकार के बांस के डंडे 15 नग प्रति एकड़ गाड़ें।

जैविक उपचार :
रोग की प्रारंभिक अवस्था में पौधे में नीम तेल छिडकाव 1-1.5 ली. प्रति एकड़ चिपकने वाले पदार्थ मिलाकर 200- 250 ली. पानी का घोल बनाकर करें, 20 लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती, 3 किलो धतूरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो बेशर्म की पत्ती, 2 किलो अकौआ की पत्ती, 200 ग्राम अदरक की पत्ती (यदि नहीं मिले तो 50 ग्राम अदरक), 250 ग्राम लहसुन, 1 किलो गुड़, 25 ग्राम लाल मिर्च डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें, यह घोले 1 एकड़ के लिए तैयार है इसे दो बार में 7-10 दिनों के अंतर से छिडकाव करना है प्रति 15 लीटर पानी में 3 लीटर घोल मिलाना है छिड़काव पूरी तरह से तर करके करना होगा नाइट्रोजन का प्रयोग बिल्कुल ही नही करें यह जहर का कार्य करती है
रसायनिक नियंत्रण विधि :
सफ़ेद मक्खी का प्रकोप दिखाई देने पर कीट नाशक दवाएं डाइमिथिएट 250 से 300 मिली. या थायोमेथाक्सम 25 डब्ल्यूपी 40 ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 40 मिली या एसिटामिप्रिड 40 मिली प्रति एकड़ के दर से 200- 250 ली पानी का घोल बनाकर छिडकाव करें।

  • धर्मपाल केरकेट्टा
  • सचिन कुमार
  • रजनी आगासे
    email : kvksurguja@gmail.com
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