दर्द कहाँ दवा कहाँ ?

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यह सही है कि पांच सौ-साढ़े पांच सौ साल की गुलामी के सामने सत्तर साल की आजादी कुछ मायने नहीं रखती। हम जिस देश में जन्में हैं उसे समझकर, उस पर अमल कर आने वाली पीढ़ी को मार्गदर्शन देने के बजाए हम हमारे नौजवानों को पश्चिमी देशों की ओर ढकेल रहे हैं। क्या है हमारे जंगल, क्या है हमारी मिट्टी, क्या है भगवान सूर्य नारायण, क्या है सतत तीन माह इस धरती को तपाने वाले सूर्य भगवान की महिमा और क्या है फिर उसे शीतल करती वर्षा की जल धारा?यह सही है कि पांच सौ-साढ़े पांच सौ साल की गुलामी के सामने सत्तर साल की आजादी कुछ मायने नहीं रखती। हम जिस देश में जन्में हैं उसे समझकर, उस पर अमल कर आने वाली पीढ़ी को मार्गदर्शन देने के बजाए हम हमारे नौजवानों को पश्चिमी देशों की ओर ढकेल रहे हैं। क्या है हमारे जंगल, क्या है हमारी मिट्टी, क्या है भगवान सूर्य नारायण, क्या है सतत तीन माह इस धरती को तपाने वाले सूर्य भगवान की महिमा और क्या है फिर उसे शीतल करती वर्षा की जल धारा?जिस वरूण देवता और सूर्य नारायण ने इस धरती को पिचहत्तर हजार वृक्षों और वनस्पतियों से आच्छादित कर हरियाली फैलायी उस हरियाली के नीचे गिरे पत्तों, फूलों और टहनियों को कचरा समझ कर जलाने वाले नासमझ लोग और उसके स्थान पर सीमेंट की परतें चढ़ाकर नगर को खूबसूरत बनाने वाले दिग्भ्रमित योजनाकार, नेता, तथाकथित वैज्ञानिक और शिक्षण शास्त्री इस धरती से ही ठीक से परीचित नहीं है। ये लोग न तो भगवान को ठीक से जानते हैं, न जंगली इवापदों को और उनके निवास को ठीक से समझ पाते हैं। इसीलिये जनता पीडि़त हैं।पूरी दुनिया की भुखमरी मिटाने की क्षमता हमारी इस भूमि में है क्योंकि पाराशर, कश्यप, वराह मिहिर चरक, सुश्रुत, सूरपाल, सारंगधर जैसे हजारों ऋषि-मुनियों ने प्राकृतिक संसाधनों ने पैदा किये भरे पूरे जंगलों से वो खाद्यान्न, वो जड़ी-बूटियां और तो ताग निकाले जो आसानी से आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए सामग्री उपलब्ध करा देते थे। उसी हमारी बेशकीमती विरासत को छीन झपटकर पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, नीदरलैंड और अंग्रेजों ने अपनी ताकत बढ़ाई और हम पर साढ़े पांच सौ साल राज किया।हमारे वेद पुराण कहते हैं कि इस धरती पर पैदा हर एक पौधा उस पर्यावरण की रक्षा करता है, जिसको प्रदूषित कर खड़ी बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के वातानुकूलित सभागृह में पर्यावरण कैसे संरक्षित हो इस पर चर्चा होती है। यह हमारे वेदों ने बताया है कि उस पौधे की जड़ें मिट्टी के नीचे कार्यरत खरबों सूक्ष्म जीवाणुओं को भोजन के रूप में कर्बन देती है और उससे पौधों के लिए नत्रजन भी लेती हैं। पौधे का तना और नीचे उग रहा चारा पशुओं का खाद्य होता है। पत्ते पककर और नीचे गिरकर मिट्टी में मिल जाते हैं। वर्षा उन्हें सड़ा गलाकर और कीड़े-मकोड़ों का मल उसे खाद में परिवर्तित कर फिर से पौधे को खाद उपलब्ध कराता है। पौधे पर लगे फूल, तितलियों और मधुमक्खियों का भोजन है। (दोनों बदले में परागीकरण कर बीज बनाने में मददगार होते हैं) पौधे के फल पर लगे दाने पक्षियों का भोजन है, गांव में साधु-संतों का अन्न है, घर के बड़े-बूढ़ों का भोजन है और बचा किसान के परिवार का अन्न है। बताईये इससे अधिक सुंदर पर्यावरण की परिभाषा और क्या हो सकती है। भारत गांवों में बसता है यह हकीकत है और हमारे विकास के सभी केंद्र शहर है। इन शहरों में बसी सभी शिक्षण संस्थाओं का पाठ्यक्रम ग्राम व्यवस्था को जोड़ता नहीं तोड़ता है। गांवों में उत्पादन बढ़े ये सब चाहते हैं, लेकिन उस उत्पादन का निर्मित मूल्य क्या हो इस पर कोई शिक्षा स्कूलों या कालेजों में नहीं दी जाती हैं।एक छोटा सा उदाहरण देखें- मिट्टी में कार्बन की मात्रा अधिक हो तो वह नत्र को क्रियाशील बनाता है हमारे यहां मिट्टी में वह एक प्रतिशत से भी कम है। उसको बढ़ाने का एक मात्र स्त्रोत खेत की हरतिमा  है जो खेत की छोटी-छोटी जोतों में झाड़ी झंखाड़ों में स्थिर थी। खेत की बागड़ में लगे वृक्षों में स्थिर थी। खेतों में ट्रैक्टर घुमाने के लिये हमने उन मेढ़ों को तोड़ा और प्राकृतिक हरतिमा नष्ट कर दी। नत्र का प्राकृतिक स्त्रोत खत्म हो गया और रसायनिक खादों के रूप में हमने मिट्टी की प्राकृतिक रचना नष्ट कर उसे बेजान बना दिया। मिट्टी के साथ-साथ फसलों का और अन्तत: उसका सेवन करने वाले उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य दांव पर लग गया।

दूसरा उदाहरण – जैव प्रौद्योगिकी शिक्षा का- इसका पाठ्यक्रम खेती को नहीं उद्योगों को ध्यान में रखकर बनाया गया है और इन उद्योगों ने न केवल खेती महंगी की है, लेकिन खेती में बुरी तरह प्रदूषण फैलाया है। इस जैव प्रौद्योगिकी से उत्पादित बी.टी. कपास भारत में बुरी तरह फेल हो गया है वहीं हाल बीटी बैंगन, जी.एम, सरसों का होने वाला है। वर्ष 1995 में हमारी जनसंख्या 35 करोड़ थी, जबकि विषम चिकित्सा (एलोपैथ) की निर्मित मात्र 12 करोड़ थी। वर्ष 2009 के सर्वेक्षण के अनुसार जनसंख्या सवा करोड़ यानी लगभग तीन साढ़े तीन गुना बढ़ी जबकि विषम चिकित्सा (एलोपेथिक) दवाईयों की निर्मितक 13 हजार करोड़ पहुंच गई। यानी एक हजार गुना। बताईये क्या ये स्वस्थ समाज के लक्षण है? तो इसका इलाज क्या है? इसका इलाज ग्राम आधारित शिक्षा पद्धति ही है जो स्थानीय संसाधनों से विकास खोजेगी। दर्द यदि गांवों में होगा तो उसका इलाज भी गांव में ही खोजना पड़ेगा शहरों में नहीं।

इसमें रत्ती मात्र अतिश्योक्ति नहीं है कि आज भुखमरी, मौसम बदलाव, आर्थिक असमानता और उससे उपजे आतंकवाद से भारत ही नहीं विश्व का हर संवेदनशील नागरिक परेशान है और उसका इलाज न अमेरिका ना रूस और ना चीन के पास है। यह इलाज भारत की इस पावन धरती पर उपलब्ध है। दुर्भाग्य इस बात का है कि हम भारतवासी ही इसे समझ नहीं पा रहे हैं।
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