खरीफ फसलों में खरपतवार की समस्या एवं समाधान

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खरपतवार फसलों के साथ प्रकाश, स्थान, नमी तथा पोषक तत्वों के साथ स्पर्धा करते हैं, यह प्रतिस्पर्धा प्रारंभिक अवस्था में अधिक होती है। जिसमें फसल की बढ़वार अत्यधिक प्रभावित होती है जिससे अन्तत: उपज में गुणात्मक नुकसान पहुंचता है। उपज में कमी के साथ-साथ खरपतवार फसल की गुणवत्ता में कमी लाते हैं, तथा इनके नियंत्रण से उपज का निर्धारित मूल्य प्राप्त नहीं होता है। इसके साथ-साथ खरपतवार कीट एवं रोग के संरक्षक का कार्य करते हैं। इन खरपतवारों को जानवरों के द्वारा खाने पर उनके उत्पाद की गुणवत्ता में भी कमी आती है। अत: खरपतवारों का फसल के प्रतिस्पर्धा को रोकना बहुत ही आवश्यक है। अनुसंधान परिणाम में यह पाया गया है कि खरपतवार सामान्यत: हमारे फसलों में 35-38 प्रतिशत तक उत्पादन में कमी लाते हैं। जबकि कुछ फसलों में यदि खरपतवार नियंत्रण सही समय पर नहीं किया जाये तो शत – प्रतिशत तक उत्पादन में कमी पाई गई है।
खरीफ फसलों में खरपतवार नियंत्रण
धान– धान की खेती मुख्यत: छिड़का विधि (सूखी एवं गीली), रोपाई तथा श्री पद्धति से की जाती हैं खरपतवारों का प्रकोप सबसे ज्यादा सूखी छिड़कवा विधि में होता है। इसके पश्चात् गीली छिड़कवा विधि तथा रोपाई में सबसे कम पाया गया है। अत: उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर खेती करने पर खरपतवारों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके बावजूद निम्न शस्य क्रियाओं को अपनाना आवश्यक है-

  • सूखी छिड़काव विधि से बुवाई की गई खेतों में 10-15 सेमी. के लगभग पानी भर जाये तो 30-35 दिन के बाद निकासी करनी चाहिये। इसके पश्चात् पौधों की उचित संख्या प्रति वर्ग भी सुनिश्चित किया जाये।
  • धान के खेत में अंकुरण पश्चात पानी भर दिया जाये।
  • प्रतिस्पर्धी किस्म या ऐसी किस्म जिसकी बढ़वार शीघ्र हो उसका चयन करना चाहिये।
  • पोषक तत्वों को सहजता से ग्रहण कर बढ़वार करने वाली किस्मों का चयन।
  • फसल की क्रांतिक अवस्था 25-50 दिन तक खरपतवार प्रबंधन।
    इसके बावजूद खेतो ंमें खरपतवार का समूल नाश असंभव है तथा विभिन्न प्रयास के बाद भी खेतों में खरपतवार उगते एवं बढ़ते हैं। इन परिस्थिति में रसायनों का उपयोग महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि अन्य विधियां बहुत खर्चीली एवं समय पर कर पाना बहुत मुश्किल होती है।
खरपतवार नियंत्रण की विधियां

  • खरपतवार को खेत में प्रवेश से बचाना
  • खरपतवार को समूल नष्ट करना 
  • शष्य क्रियाओं के माध्यम से खरपतवार नियंत्रण
  • जैविक विधि
  • यांत्रिक विधियों से खरपतवारों की रोकथाम
  • रसायनिक विधि
  • समन्वित/एकीकृत खरपतवार प्रबंधन

फसलों के सुनिश्चित उत्पादन हेतु सही किस्मों का चयन, संतुलित खाद एवं उर्वरक का उपयोग, उचित कर्षण क्रिया, सही समय में सिंचाई, फसलों की कीट एवं रोग से रोकथाम के साथ-साथ उचित खरपतवार प्रबंधन बहुत ही आवश्यक है। सामान्यत: खरीफ के मौसम में अधिक वर्षा तथा वातावरण में नमी के कारण खरपतवारों की वृद्धि एवं विकास अधिक तीव्र गति से होता है। अत: इन खरपतवारों का शुरू में ही दमन आवश्यक है, अन्यथा उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

रसायनिक विधि

  • बुआई के 0-3 दिन के भीतर पेण्डीमिथालीन 1.0 कि.ग्रा./हे. या पायरेजोसल्फ्यूरॉन 20 ग्रा./हे. की दर से 375 ली. पानी में मिलाकर नेपसेक स्प्रेयर में फ्लेटफेन नोजल लगाकर छिड़काव करें।
  • बुआई के 15-20 दिन की अवस्था में विस्पायरीबेक सोडियम की 25 ग्रा./हे. या पिनाक्सुलम 22.5 ग्रा./हे. या फिनाक्साप्रॉप + इथाक्सीसल्फ्यूरॉन (60+18 ग्रा./हे.) का उपयोग करना चाहिये।
  • इसके बावजूद भी खेतों में खरपतवार दिखाई दें तो हाथ से एक निराई करनी चाहिये जिससे की खेतों में खरपतवार के बीज-वर्षा को रोका जा सके तथा खरपतवार बीज भंडार को कम कर सके।
    नोट
  • रसायनों के उपयोग के समय इस बात का ध्यान रखें कि अंकुरण पश्चात् उपयोग होने वाले खरपतवारनाशियों के उपयोग के समय खरपतवार का कम से कम 75 प्रतिशत भाग पानी से ऊपर हो।
  • यदि संभव हो तो खरपतवारनाशी के उपयोग के तीन दिन पश्चात खेतों में पानी भर दिया जाये।
  • जिन रोपाई वाले खेतों में लेप्टोक्लोआ या जंगली धान का प्रकोप हो वहां प्रेटीलाक्लोर 750 ग्रा./हे. का प्रयोग लाभकारी होता है।
    मक्का – मक्के की फसल को 60 से 75 से.मी. की कतार से कतार की दूरी पर लगाया जाता है। प्रारंभिक अवस्था में फसल के साथ खरपतवार का भी प्रकोप बहुत होता है। अत: प्रारंभिक अवस्था से ही खरपतवार नियंत्रण करने पर उचित उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इस हेतु निम्न विधियों का प्रयोग करना चाहिये-
  • बुआई के 0.3 दिन की अवस्था में एट्राजिन 1.0 कि.ग्रा./हे. की दर से 375 लीटर पानी के साथ उपयोग करना चाहिये।
  • बुआई के 20-25 दिन या खरपतवार के 3-4 पत्ती की अवस्था में टोप्रामेजोन 25 ग्रा./हे. या टेम्बोट्रियान 120 ग्रा./हे. उपयोग करने पर खरपतवारों का उचित नियंत्रण संभव है।
    सोयाबीन – सोयाबीन में घासदल, चौड़ी पत्ती तथा मोथा प्रजाति के खरपतवार उगते हैं तथा शुरू से ही फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते है। अत: इन रसायनों के प्रयोग से खरपतवारों का उचित निदान संभव है।
  • बुआई के 0.3 दिन के भीतर पेण्डीमिथालिन 1.0 कि.ग्रा./हे. या मेट्रीबुजीन 0.5 किग्रा/हे. की दर से 375 लीटर पानी के साथ छिड़काव घटें।
  • बुआई के 10-15 दिन पश्चात इमेजेथायपर 100 ग्रा./हे. या इमेजेथायपर+इमेजामोक्सा 100 ग्रा./हे. या एसीफ्लोरफेन + क्लोडिनोफॉप (80+165) ग्रा./हे. (1.0 लीटर व्यापारिक) का उपयोग कर खरपतवारों का निदान संभव है।
    मूंग एवं उड़द – मूंग एवं उड़द की क्रांतिक अवस्था 20 दिन तक रहती है। इस अवस्था में फसल खरपतवारों के साथ अधिकतम प्रतिस्पर्धा करती है। अत: खरपतवारों का नियंत्रण इस अवस्था में आवश्यक है। इस हेतु निम्न उपाय करना चाहिये।
  • बुआई के 0.3 दिन की अवस्था में पेण्डीमेथालीन की 1.0 कि.ग्रा./हे.को 375 से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बुआई से 15-20 दिन की अवस्था में इमेजाथायपर 100 ग्रा./हे. या इमेजेथायपर+इमेजामोक्स 100 ग्रा./हे. या केवल घासकुल के खरपतवार है तो क्विजालोफॉप की 75 ग्रा./हे. का उपयोग कर खरपतवारों से निदान प्राप्त किया जा सकता है।
    अरहर – अरहर की बढ़वार शुरूआत में बहुत धीमी होती है तथा इस अवस्था में खरपतवार का प्रकोप अत्यधिक रहता है। इसकी क्रांतिक अवस्था 20-50 दिनों तक होती है। अत: निम्न माध्यम से खरपतवारों का निदान करना आवश्यक है।
  • बुआई के 0-3 दिन की अवस्था में पेण्डीमेथालिन 1.0 कि.ग्रा./हे. की दर से + 1 नेपसेक स्प्रेयर में फ्लेटफेन नोजल का उपयोग कर छिड़काव करें।
  • बुआई के 15-20 दिन पश्चात क्विजालोफॉप 40-50 ग्रा./हे. का उपयोग सकरी पत्ती के खरपतवारों के नियंत्रण हेतु करें।
    मूंगफली – मूंगफली खरीफ ऋतु की एक प्रमुख फसल है शुरूआत के दिनों में वृद्धि कम होने की वजह से खरपतवारों का भयंकर प्रकोप होता है। अत: शुरूआत से ही खरपतवारों का नियंत्रण उचित उपज हेतु आवश्यक है।
  • बुआई के 0-3 दिन के भीतर एलाक्लोर 1.5-2.0 कि.ग्रा./हे. या इमेजेथायपर 100 ग्रा./हे. या पेण्डीमिथालिन 1.0 कि.ग्रा./हे. की दर से उपयोग करें।
  • बुआई के 15-20 दिन के पश्चात क्विजालोफॉप 40-45 ग्रा./हे. के उपयोग से संकरी पत्ती वाले खरपतवार से निजात मिलती है।
    सूरजमुखी – सूरजमुखी के फसल में कतार से कतार की दूरी अधिक होने के कारण शुरूआत के दिनों में खरपतवार की संख्या अधिक होती है अत: शुरूआत से ही खरपतवार के नियंत्रण हेतु निम्न रसायनों का उपयोग किया जा सकता है।
  • बुआई के 0-3 दिन की अवस्था में पेण्डीमिथालिन 1.0 कि.ग्रा./हे. या आक्साडायजोन 0.5-1.0 कि.ग्रा./हे. का उपयोग करें। बुवाई के 25-30 दिन पश्चात संकरी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु क्विजालोफॉप 50 ग्रा./हे. का छिड़काव करें।
    तिल एवं रामतिल – पेण्डीमिथालीन 1.0 कि.ग्रा./हे. या आक्साडाइजोन 500 ग्रा./हे. तिल एवं रामतिल में बहुतायत में घासकुल तथा कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करती है।
    कपास – कपास की फसल की आरंभिक 60 दिनों की अवस्था में खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। कतार से कतार की दूरी अधिक होने से हर 15-20 दिन के अंतराल में एक निराई गुड़ाई करनी चाहिये। पेण्डीमिथालीन 1.5 कि.ग्रा./हे. या एलाक्लोर 2.0 कि.ग्रा./हे. का छिड़काव फसल बोने के 2-3 दिनों के पश्चात कर दें। बुवाई के 25-30 दिन बाद कतारों के मध्य ऊगे खरपतवारों को नष्ट करने हेतु पेराक्वाट 0.75 कि.ग्रा./हे. या ग्लायफोसेट 1.0 कि.ग्रा./हे. का नियंत्रित छिड़काव करें, ध्यान रहे कि इन खरपतवारनाशी का छिड़काव कपास के पौधों पर ना पड़े। इसके अतिरिक्त फ्लूआजिफॉप 0.5 कि.ग्रा./हे. या पाइरिथियोबैक सोडियम 62-75 ग्रा./हे. का छिड़काव कर खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।
    गन्ना – गन्ने की फसल में शुरूआती 90 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण अति आवश्यक है। 15-20 दिन के अंतराल पर हल द्वारा या यंत्रों द्वारा गुड़ाई करते रहें। बुवाई के 2-3 दिन बाद एट्राजिन 1.2 कि.ग्रा./हे. या मेट्रीब्यूजिन 0.5 कि.ग्रा./हे. का छिड़काव करें। फसल के बुवाई के 40-50 दिन बाद 2,4 -डी 0.75 कि.ग्रा./हे. या कारफेन्ट्राजोन 40 ग्रा./हे. का छिड़काव करें। खेत में यदि मोथा की समस्या हो तो हेलोसल्फ्यूरॉन 67.5 ग्रा./हे. का छिड़काव पहली सिंचाई के बाद जब मोथा की 4-5 पत्तियां आ चुकी हों, तब करें।
    खरपतवार प्रबंधन, एकीकृत फसल प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर खरपतवारों की समस्या खरीफ मौसम में ज्यादा ही गंभीर होती है। अतएव कृषक बंधु इसका बताई गई विधियों की जानकारी लेकर उचित रूप से प्रयोग करें तो उनकी फसल की बढ़वार अच्छी होने के साथ ही अधिक उपज भी प्राप्त होगी।
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