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फूलों की खेती के साथ मखमली अहसास

एक छोटा सा दृश्य किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा को कैसे बदल देता है, इसे ग्राम नांदड़ा (मोरखेड़ा ) तहसील देपालपुर जिला इंदौर के उद्यमशील कृषक श्री राधेश्याम तंवर ( पटेल) के जीवन से समझा जा सकता है। जो इन दिनों अपने खेत में गुलाब और गेंदा के फूलों की खेती कर, न केवल अपनी जिंदगी महका रहे हैं , बल्कि अच्छी कमाई भी कर रहे हैं। इसके साथ ही केंचुआ खाद का निर्माण कर अपने खेत में मखमल का भी अहसास करवा रहे हैं।
दरअसल हुआ यूँ कि मंडी में फूलों की अच्छी आवक और होने वाली कमाई को देखकर श्री राधेश्याम पटेल के मन में भी ख्याल आया कि क्यों न अपने खेत में भी फूलों की खेती शुरू की जाए। जहां चाह, वहां राह बस, फिर क्या था सरकारी सुविधाओं का इंतजार करने के बजाय अपने व्यक्तिगत प्रयास शुरू किए। अपने मित्रों और अन्य सहयोगियों की मदद से नैनोद से गुलाब की 5 हजार कलमें खरीदी और अपनी 10 बीघा जमीन में से एक एकड़ के हिस्से में हैदराबादी गुलाब की कलमें और साथ में ईस्ट -वेस्ट नामक यलो गोल्ड गेंदे के लिए लाइन की दूरी 12 -12 फीट और पौधे की दूरी 3 -3 फीट रखी। इसका प्रारम्भिक खर्च मात्र दस हजार रूपए आया।
ड्रिप से सिंचाई
ड्रिप से सिंचाई की कहानी भी रोचक है। राऊ जाने के दौरान एक खेत में बैंगन की फसल देखी जहां ड्रिप लाइन डली देखकर सड़क से उतरकर उस खेत में पहुंचे और किसान से चर्चा की। बस तभी से अपने यहां भी ड्रिप डालने का विचार आया। क्योंकि खेत में पानी की कमी है। मित्रों के सहयोग से 16 एमएम वाली ड्रिप लगाई। जिसकी एक लाइन 180 फीट लम्बी है। ऐसी 21 लाइनें डाली और ड्रिप सिंचाई शुरू हो गई। समय बीतने के साथ गुलाब और गेंदे के पौधों में फूल लगने लगे।
निश्चित बाजार मिला
इन फूलों को बेचने के लिए देपालपुर के तीन दुकानदारों से 30 रुपए प्रति किलो की सालाना निश्चित दर से बेचने का करार कर लिया। जिससे फिलहाल दस हजार रुपए हर माह की कमाई कर रहे हैं। जबकि इस खेती को अभी एक साल ही हुआ है। समय के साथ फूलों की उपज बढ़ेगी तो कमाई भी और बढऩे लगेगी।
जैविक दवाईयों का उपयोग
अपने अल्प प्रयास में सफलता की सीढिय़ां चढऩे वाले श्री पटेल फूलों की इस खेती के लिए रसायनिक दवाइयों का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वह जैविक तरीके से दवाई तैयार करते हैं। इसके लिए उन्होंने नुस्खा कृषि विभाग की जीरो बजट वेबसाईट से लिया। इसके लिए वे निम्बोली, नीम के पत्ते, करंज, सीताफल और बेशरम के पत्तों को 20 – 25 दिन सड़ाते हैं। फिर झाइम नामक यह जो टॉनिक तैयार होता है। इस घोल को 25 लीटर वाले स्प्रे पंप में आधा लीटर की दर से मिलाकर पौधों पर छिड़काव करते हैं। श्री पटेल का कहना है कि इससे फूलों की गुणवत्ता तो बढ़ती ही है,लागत भी कम आती है। जबकि रासायनिक दवाइयों में कमाई का बड़ा हिस्सा चला जाता है।
वर्मी कम्पोस्ट भी बनाते हैं
आपको बता दें कि उन्नत कृषक श्री राधेश्याम पटेल अपनी शेष जमीन पर अन्य फसलें तो लेते ही हैं, साथ ही केंचुआ खाद भी बनाते हैं। हालांकि सरकारी योजना से परे श्री पटेल ने और भी कम लागत में नीचे बरसाती का बेस बनाकर और ऊपर लकड़ी-बांस का छज्जा बनाकर केंचुआ खाद बनाने की इकाई शुरू कर दी। इसके लिए खंडवा रोड की ग्वाला कॉलोनी से दो किलो केंचुए 500 प्रति किलो की दर से खरीदकर काम शुरू कर दिया। बीते चार माह में ये केंचुए 15-17 किलो हो चुके हैं और शुरू में 5 क्विंटल केंचुआ खाद अपने खेत में डाल चुके है,जो औसतन 15 क्विंटल सालाना से ज्यादा ही तैयार होगा। वे इस खाद का इस्तेमाल खेत में ही करते हैं जब भी कोई व्यक्ति श्री पटेल के खेत में कदम रखता है तो इस केंचुआ खाद से मुलायम बनी मिट्टी उन्हें मखमल का अहसास दिलाती है। खुशबू की खेती के साथ केंचुआ खाद निर्माण की यह कोशिश अनुकरणीय है।
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