उपयोगी हरा चारा लोबिया

आजकल ज्यादातर दुग्ध व्यवसाय से जुड़े किसान भाइयों का कहना है कि लागत खर्च बहुत बढ़ गया है। इस लागत खर्च में चारा खर्च एक महत्वपूर्ण भाग है। पशुपालन में दुग्ध व्यवसाय के कुल खर्च का 70 प्रतिशत खर्च दुधारू पशु के पोषण पर होता है। अगर दुधारू पशु का पोषण खुद के खेत से उत्पादित चारे तथा वस्तुओं से किया जाये तो इस खर्च को काफी कम किया जा सकता है। अगर खेत पर वांछित हरा चारा उगाया जाये तो पशुओं को ताजा, पौष्टिक चारा जो सही समय पर काटा गया है वह मिलता है तो दूध उत्पादन बरकरार रहता है तथा उसमें धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होती है। उदाहरण ज्यादातर हरा चारा जब फूलवाली अवस्था में होता हैं तब उसमें प्रोटीन की मात्रा सर्वोच्च होती हैं और इस अवस्था में वह सर्वाधिक स्वादिष्ट पाचक और पौष्टिक होता है। पशु पोषण में हरा चारा 60 प्रतिशत और सूखा चारा 40 प्रतिशत होना चाहिए। इससे दूध उत्पादन तथा दूध में उपस्थित वसा की मात्रा दोनों सामान्य रहते हैं। हरा चारा तथा सूखा चारा दोनों वर्गों में एक दल चारा जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का आदि तथा दोदली यानि फलीधारी वनस्पति चारा जैसे लोबिया, बरसीम या ल्युसर्न आदि का समावेश होना चाहिए। खेत में हरा चारा कुछ इस तरह लगायें कि पूरे वर्ष में कोई ना कोई हरा चारा उपलब्ध हों अगर हम एक के बजाय दो या तीन भिन्न-भिन्न किस्म के हरे चारे की खेत में काश्त करें तो पशुओं को विभिन्न किस्म का चारा मिलेगा। इससे उन्हें बोरियत नहीं होगी। खाने का स्वाद बढ़ेगा जिससे उनका चारा ग्र्रहण और साथ ही शुष्क पदार्थों का ग्रहण बढ़ेगा। इसके अलावा हरे चारे में भिन्न-भिन्न मात्रा में पोषण द्रव्य होते हैं उनकी प्राप्ति होगी। समुचित वक्त कटे चारे मिलेंगे तो पोषक द्रव्य ज्यादा प्राप्त होंगे। कुल मिलाकर सही पोषण प्राप्त होगा। इससे पशु के शरीर में दूध का उत्पादन सही होगा और दूध उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी। रबी में लोबिया नामक हरे चारे के फसल की काश्त की जा सकती है। यह चारा साधारण तथा तेज बारिश वाले इलाके में उगाया जा सकता हैं लेकिन खेत में पानी भरा हो या अत्यधिक ठंड या बर्फ गिर रही है तो इसे नुकसान होता है।
जमीन की पूर्व तैयारी- खेत की 1 या 2 बार गहरी जुताई करने के बाद पाटा घुमाकर मिट्टी को समतल बना दें। पांच से दस टन अच्छी तरह पकी गोबर खाद तथा 250 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट खेत में डालें। यह जुताई से पहले करें। बुआई के समय 20 किलोग्राम यूरिया द्वारा तथा 33 किलोग्राम पोटॉश मिट्टी में डालकर अच्छी तरह मिलायें। इसके बाद बीज 20 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टर इस मात्रा में खेत में डालें या बिखेर दें या बुआई यंत्र द्वारा 22 से 45 सेंटीमीटर दूरी पर (दो कतारों के बीच का फासला) बोयें। चारे के लिए एक हेक्टर में जितना बीज बोते है उससे दुगना यानि 40 से 60 किलो बीज खेत में बो सकते हैं। फसल को आवश्यकतानुसार तीन या चार बार सिंचित कर सकते हैं।
उत्पादन तथा कटाई- अलग-अलग स्थानों पर मिट्टी का प्रकार, उत्पादकता जलवायु पर निर्भर 60 से 75 दिनों के बाद चारे की कटाई कर सकते हैं। सामान्यत: 10 से 15 टन हरा चारा प्रति हेक्टर मिलता है लेकिन खेत की मिट्टी अच्छी हैं, उर्वरक ठीक से डाले सिंचन समय से ठीक से किया हो तो ज्यादा यानि 25 से 30 टन प्रति हेक्टर इतना चारा उत्पादन भी प्राप्त हो सकता है।

  • डॉ. सुनील नीलकंठ रोकड़े
  • डॉ. रविन्द्र झिंझर्डे

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