उड़द की वैज्ञानिक खेती

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भूमि का चुनाव:- हल्की रेतीली दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि जिसका पी.एच. 7- 8 के मध्य हो व पानी का निकास की समुचित व्यवस्था हो वह उड़द के लिये उपयुक्त है।
खेतों को ट्रैक्टर या देशी हल से दो-तीन बार जुताई कर पाटा लगाकर समतल करें, तत्पश्चात् बुवाई करें। दोमट, हल्की एवं कछारी भूमि कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती हेतु उपयुक्त होती है। अच्छी जुताई कर भुरभुरी मिट्टी वाला समतल खरपतवार रहित खेत तैयार करना चाहिए। सिंचाई हेतु नालियों एवं क्यारियों की व्यवस्था करनी चाहिए।
बीज की मात्रा:- प्रमाणित बीज जिसकी अंकुुरण क्षमता 70-80 प्रतिशत हो उसका 15-20 कि.ग्रा. बीज प्रति हे. के मान से उपयोग करें।
बीज उपचार:-यह बीज जन्य रोगों की रोकथाम की सबसे आसान, सस्ती और लाभकारी विधि है। बीज को कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) अथवा कार्बोक्सिन थायरम (वीटावैक्स पावर) की 2 ग्राम मात्रा अथवा जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा विरिडी की 5-10 ग्राम मात्रा द्वारा द्वारा उपचारित करने के बाद बोयें ।
पीला मोजेक से बचाव के लिये इमिडाक्लोप्रिड 48 प्रतिशत अथवा थायोमेथोक्साम 70 डब्लू. पी. की 3 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति कि.ग्रा. बीज को उपचारित कर बुवाई करने पर शुरूआत में 30 दिनों तक पीला मोजेक से वचाव में बेहतर परिणाम मिलते है।
फफूंदनाशक दवा से उपचार के पश्चात् 5 ग्राम राइजोबियम व 5 ग्राम पी.एम.बी. से बीज को निवेशित करना चाहिये। राइजोबियम जीवाणु, पौधों में जड़ ग्रंथियों की संख्या बढ़ाने में सहायक होते हैं जिससे भूमि में लगभग 20 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर वायुमंडल से स्थिर की जाती है तथा पी.एस.बी. कल्चर जमीन में स्थिर स्फुर को घुलनशील अवस्था में लाकर पौधों को उपलब्ध करवाता है।
बीज की बुआई:- कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखना चाहिये साथ ही ध्यान रहे कि बीज डेढ़ से दो इंच गहराई पर बोये।
खाद एवं उर्वरक:-मृदा परीक्षण के उपरांत खाद एवं उवर्रक की सुझाई गई मात्रा का उपयोग करें। नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश की 20:50:20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर के मान से उपयोग करें। इस हेतु 40 किग्रा. डीएपी व 15 किग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति एकड़ उपयोग करें।
खरपतवार नियंत्रण:- फसल एवं खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की अंतिम अवधि वुआई के 20-30 दिनों तक रहती है इस बीच निंदाई करने या डोरा चलाने से खरपतवार नष्ट हो जाते है साथ ही भूमि में वायु का संचार होता है । रसायनिक नियंत्रण हेतु खेत तैयार करते समय, बोने से पहले पेंडीमिथालीन 3 ली. को 500 ली. पानी में मिलाकर बोने के बाद व अंकुरण से पूर्ण भूमि में फ्लेट फेन नोजल युक्त पम्प से मिलायें। खड़ी फसल में नींदा नियंत्रण हेतु इमेजाथायपर 1.0 ली. फसल के 12-15 दिन की अवस्था पर छिड़काव निम्न उपाय खरपतवारों की तीव्रता के हिसाब से करें।
उन्नतशील जातियाँ:- उन्नतशील जातियों जवाहर उड़द-2, आई. पी. यू. 94-1 (उत्तरा), आजाद-3, पी. यू.-31, यू.-30, पी. यू.-19, शेखर-2, एल. बी. जी.-20 का स्वस्थ, सुडौल, रोगरोधी बीज उपयोग करें।
एकीकृत कीट प्रबंधक के उपाय:-

  • खेत की सफाई समय पर करें, पूर्व फसल के अवशेषों को एकत्र कर नष्ट करें, खेत के आस-पास खरपतवारों को न उगने दें।
  • ग्रीष्मकालीन जुताई करें ताकि कीड़ों के अण्ड समूह व प्यूपा धूप में नष्ट हो जायें। खेत के पुराने डण्ठलों को एकत्र कर नष्ट करे एवं खेत के आसपास से खरपतवारों को निकालते रहे।
  • भूमि में जल निकास की ठीक व्यवस्था करे।

कटाई एवं गहाई:-
जब 70-80 प्रतिशत फलियाँ पक जाये तक कटाई आंरम्भ करें। फसल को खलिहान में 3-4 दिन तक सुखाकर गहाई करें। इस प्रकार उन्नत तरीके से खेती करने पर 10-12 क्विन्टल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में बनने वाली गांठों में उपस्थित जीवाणु वायुमण्डलीय नत्रजन को भूमि में स्थिर करके भूमि को उपजाऊ बनाती है। इस प्रकार यह फसल भूमि की उर्वराशक्ति को बनाये रखने में भी सहायक है। उड़द में 25 प्रतिशत प्रोटीन व प्रचुर मात्रा में फास्फोरिक अम्ल पाया जाता है। इस फसल का चारा पशुओं में दूध की मात्रा बढ़ाता है।

 

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