संसाधन समाज के हैं – उजाडिय़े मत श्रीमान!

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7 करोड़ पौधों की पहेली : इस वर्षाकाल में नर्मदा किनारे सात करोड़ पौधे रोपे गये लेकिन इनकी देखभाल की जिम्मेदारी, किसी भी मंत्री, अधिकारी -विभाग की नहीं दी गई। सूखे के कारण आधे पौधे रोपण के बाद ही सूख गये और बहुत से रोपण के पहले ही कुप्रबंधन को शिकार हो गये। वर्षा समाप्ति के पश्चात कौन इन्हें पानी देगा, कौन रखवाली करेगा, कौन सुरक्षा के लिये ढोर भगायेगा, कोई इंतजाम ही नहीं है। पौधे नर्सरी में तैयार करने में, खरीदने में, लगाने में, परिवहन में शासकीय धन बड़े पैमाने पर खर्च किया गया। जरूरतमंद किसानों को शासकीय नर्सरी से पौधे नहीं मिले, वन विभाग भी विभिन्न स्थानों पर पूर्व निर्धारित रोपण कार्य नहीं कर सका। केवल दिखावे प्रचार में ही दो सौ करोड़ रु. का बजट स्वाहा हो गया।    (शेष पृष्ठ 2 पर)7 करोड़ पौधों की पहेली : इस वर्षाकाल में नर्मदा किनारे सात करोड़ पौधे रोपे गये लेकिन इनकी देखभाल की जिम्मेदारी, किसी भी मंत्री, अधिकारी -विभाग की नहीं दी गई। सूखे के कारण आधे पौधे रोपण के बाद ही सूख गये और बहुत से रोपण के पहले ही कुप्रबंधन को शिकार हो गये। वर्षा समाप्ति के पश्चात कौन इन्हें पानी देगा, कौन रखवाली करेगा, कौन सुरक्षा के लिये ढोर भगायेगा, कोई इंतजाम ही नहीं है। पौधे नर्सरी में तैयार करने में, खरीदने में, लगाने में, परिवहन में शासकीय धन बड़े पैमाने पर खर्च किया गया। जरूरतमंद किसानों को शासकीय नर्सरी से पौधे नहीं मिले, वन विभाग भी विभिन्न स्थानों पर पूर्व निर्धारित रोपण कार्य नहीं कर सका। केवल दिखावे प्रचार में ही दो सौ करोड़ रु. का बजट स्वाहा हो गया।

किसान आंदोलन का मुआवजा
इसी प्रकार किसान आंदोलन के समय मुख्यमंत्री ने एक-एक करोड़ रु. के मुआवजा की किस आधार पर घोषणा की इसका जवाब न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर भी देते नहीं बन रहा, पेशी की तारीखें बढ़वाई जा रही है।
प्याज के आंसू
हाल ही में प्याज खरीदी में भी करोड़ों रु. का घाटा शासन को लग चुका है। लगभग 850 करोड़ रु. का नुकसान होने की संभावना है। कुप्रबंधन के कारण प्याज सड़ गई और प्रदेश में इस कारण मांग और आपूर्ति में भारी अंतर आने के कारण अभी से फुटकर में 2-3 रु. किलो बिकने वाली प्याज 25-30 रु. किलो के दाम पर बिक रही है। शासन के पास खरीद, विक्रय और भंडारण की जब पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं थी तो क्यों इस व्यापार में हाथ डाला। सरकार का काम नीति बनाना और उसका नियमन करना है परंतु शासन इसे छोड़कर खुद व्यापारी बन जाता है। व्यापार के लिए अनुभवहीन और घोटालेबाज अधिकारी कर्मचारी पूरी व्यवस्था को चौपट कर केवल अपने फायदे के लिये काम करते हैं।
भाव फर्क योजना
इस नकारात्मक व्यवस्था से पीछा छुड़़ाने के लिये अधिकारियों ने एक नया सुझाव दिया है कि बाजार भाव से अंतर की राशि किसान के खाते में डाल दो, इससे किसान के नुकसान की भरपाई हो जाएगी। अंधेर नगरी में चौपट राज की ये शेख चिल्ली व्यवस्थायें न तो किसान का भला करेंगी और न ही शासन का मंतव्य पूरा होगा। विक्रय हेतु लाये गये माल की गुणवत्ता देखे बिना भाव फर्क का आकलन कैसे होगा? किसान और व्यापारी की मिली भगत से क्या भाव फर्क के फर्जी बिल नहीं बनेंगे? आखिर इन बिलों के आधार पर ही तो किसान को भाव फर्क का लाभ मिलने वाला है।
माले मुफ्त दिले बेरहम
जब बिना काम करें पंचायत सचिव, सरपंच से मिली भगत कर मनरेगा परियोजना में मजदूर को आधी मजदूरी मिल जाती है, जब बिना माल दिये शासकीय विभागों से फर्जी बिलों के आधार पर भुगतान हो जाता है तब भाव फर्क के आधार पर किसान को शासन द्वारा भुगतान करने में धांधली नहीं होगी? प्रदेश में कई जिलों में किसानों के नाम पर फर्जी रूप से दलहन खरीदे जाने की जांच क्या नहीं चल रही है? स्वच्छता अभियान में बिना शौचालय बनाये शासकीय एजेंसियों द्वारा फर्जी भुगतान की खबरें क्या आधारहीन हैं? न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत शासकीय खरीद व्यवस्था क्या कुप्रबंधन के घेरे में नहीं है? करोड़ों रु. के बोरे बिना उपयोग किये खराब हो गये, गोदामों में सड़ रहे अनाज की शराब कंपनियों को बिक्री मिलीभगत से हो रही है, इस पर भी केवल किसानों के हिमायती बनने के दिखावे में शासन घाटे का शिकार हो रहा है।
सरकार की नजरों में व्यापारी बेईमान
शासन की नजरों में व्यापारी कालाबाजारी, टैक्स चोरी, अनुचित भंडार संग्रहण का दोषी और निरा बेईमान है। यदि सूक्ष्मता से निरीक्षण करें तो शासन की आड़ में उससे जुड़ी एजेंसियां कहीं अधिक बड़े रूप से यही काम कर रही हैं। शासन की दोषपूर्ण नीतियों के कारण व्यापारी अनाज व्यवसाय से, प्रसंस्करण से दूर हो रहे हैं। वहीं शासन का इस व्यवसाय में एकाधिकार बढ़ता जा रहा है। इस प्रतिगामी व्यवस्था के चलते न तो किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है और न ही व्यवसायियों को कारोबार चलाये रखने के लिए कोई प्रोत्साहन ही मिल रहा है। व्यवसाय की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अभाव में किसानों को उसकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिलने से वो भी भरपूर उत्पादन के बावजूद फटेहाल बना हुआ है।
संसाधन समाज के हैं, उजाडि़ए मत
वस्तुत: राजनेता, प्रशासक, सरकारी अधिकारी जिन्होंने कभी व्यवसाय किया ही नहीं है वे ही नीति निर्माता और नियामक बन जायें और व्यवसायियों को चोर जमाखोर, कालाबाजारी का तमगा देते जायें, तो अव्यावहारिक नीति के अभाव में पूरी व्यवस्था चौपट होने से ‘शिवराज’ भी नहीं रोक सकता।

(श्रीकान्त काबरा, मो.: 9406523699)
आम नागरिक से विभिन्न करों के माध्यम से एकत्रित धनराशि से ही सरकार का खर्च और विकास कार्यों को साकार किया जाता है। सरकार के कर्णधार अनाप-शनाप कर लगाकर जनता पर करों का बोझ लाद रहे हैं, और मिले राजस्व का विवेकहीन दुरूपयोग भी कर रहे हैं। जनतांत्रिक राज व्यवस्था में जब भी विपक्ष कमजोर होगा, ऐसी मनमानियां बढ़ती ही रहेंगी।

 

क्या करे सरकार ?

निर्यात को बढ़ावा दे सरकार
किसानों को उसकी उपज का सही भाव दिलाना ही शासन का ध्येय है तो उसे शासकीय न्यूनतम हस्तक्षेप पर आधारित स्वस्थ व्यापार प्रणाली विकसित करना होगी। व्यापारियों को उनके व्यवसाय के लिये प्रोत्साहन देकर प्रदेश के बाहर कृषि उपज के निर्यात के प्रोत्साहन परक उपाय करना होंगे। शासन को स्वयं व्यापारी बनने की बजाय केवल व्यापार नीति नियमन नियंत्रण तक सीमित रहना होगा। शासन के अनुचित हस्तक्षेप और व्यापारियों के प्रति दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण हजारों व्यापारी भारी घाटे का शिकार होकर अनाज दाल-तिलहन व्यापार और उसके प्रसंस्करण से मुंह फेर चुके हैं। प्रदेश की आधी से अधिक दलहन-तिलहन व्यवसाय में संलग्न मिलें, बंद हो चुकी हैं।
परिवहन सब्सिडी दे सरकार
किसानों से आठ रु. किलो प्याज खरीद कर सड़ाने की बजाय यदि व्यापारियों को प्रदेश से बाहर निर्यात के लिये परिवहन लागत पर ही राज सहायता दे दी होती तो ऐसी विषम परिस्थितियां नहीं बनती। जब केन्द्र शासन निर्यात प्रोत्साहन के लिये राज सहायता व्यवसायियों को देता है तो क्या प्रदेश सरकार नहीं दे सकती?

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