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दूध की भ्रांतियां और वास्तविकताएं

दूध के संबंध में समाज में, ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरी इलाकों में भी कुछ भ्रांतियां पाई जाती हैं। इनमें से कुछ भ्रांतियां तथा उनके विषय में वैज्ञानिक तथ्य तथा सच्चाईयां यहां प्रस्तुत हैं।
दूध जादू या मंत्र-तंत्र से फटता है (खराब होता हैं)
दूध किसी भी तरह के जादू या मंत्र-तंत्र से कभी भी फटता नहीं हैं या खराब नहीं होता है। दूध फटने या खराब होने का महत्वपूर्ण कारण यह है कि उसमें दुग्धआम्ल यानि लैक्टिक अॅसीड पैदा करने वाले जीवाणुओं की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं तो उसकी क्रिया दूध में मौजूद प्रोटीन केसीन पर हो जाती है। जिसके फलस्वरुप उसका विघटन हो जाता हैं। इसे सर्वसामान्य भाषा में दूध फटना या खराब होना कहते हैं।
सर्दियों में कच्चा दूध 3 से 4 घंटे तक और गर्मियों में 1-2 घंटे रह सकता है लेकिन तापमान बढऩे पर उसमें लैक्टिक जीवाणुओं की तादाद तेजी से बढ़ती हैं और साथ ही उनके द्वारा लैक्टिक अम्ल का निर्माण तथा प्रतिशत बढ़ता है। ऐसा दूध जल्दी फट जाता हैं। अगर ऐसे दूध को गर्म करने हेतु आंच पर रखें तो वह कुछ ही सेकंड में फट जाता हैं।
दूध कच्चा (बिना गर्म किये) पीना चाहिए
हमारे देश में कई लोगों के मन में यह गलत धारणा है कि गाय का दूध शुद्ध होता हैं और उसे कच्चा (बिना गर्म किये) पीना चाहिए। असल में गाय के शरीर में कोई संक्रामक रोग जैसे क्षयरोग (टीबी), विषज्वर, खूनचरी, पेचिश के जीवाणु मौजूद हैं तो ऐसा संक्रमणयुक्त दूध पीने से यह बीमारी हो सकती हैं। दूध में वैसे भी कई तरह के सूक्ष्मजीव तेजी से पनपते हैं अत: उसे उबालने से ज्यादातर घातक सूक्ष्मजीव मर जाते हैं और दूध पीने के लिए सुरक्षित हो जाता हैं।
दूध पीना सबके लिए अच्छा होता है
कई लोगों की यह धारणा है कि दूध सभी को पीना चाहिए। यह धारण पूर्णत: सच नहीं हैं। दूध में जो वसा मौजूद होती हैं उसमें ट्राईग्लिसेरॉइडस होते हंै और जिन लोगों को खून में नुकसानदायक कोलेस्ट्रॉल बढऩे की शिकायत होती हैं उनके लिए गाढ़ा, ज्यादा मलाईदार दूध तथा ऐसे दूध से बने मलाईयुक्त व्यंजन सेवन करना खतरनाक साबित हो सकता हंै। खून में तथा खून की नलिकाओं में कोलेस्ट्रॉल का जमाव होने से वह संकरी हो जाती है तथा इससे हृदय तथा अन्य अवयवों को खून की आपूर्ति ठीक से न होने से हृदय संबंधी तकलीफ हो सकती हैं। उच्च रक्तचाप, अंथेरोस्कलेरोसीस, दिल का दौरा पडऩा लकवा आदि व्यधियों का सामना करना पड़ सकता है।
दूध खूब, ज्यादा से ज्यादा पिएं
हमारे देश के कुछ इलाकों में विशेषकर उत्तर भारत में यह धारणा हैं कि खूब, ज्यादा से ज्यादा दूध पीना चाहिए। लेकिन शास्त्रानुसार अति सर्वत्र वर्जयेत इस उक्ति अनुसार किसी भी चीज का अति मात्रा में सेवन घातक होता है। दूध में वसा होती हैं। जिसका अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। दूध में कैल्शियम भी ज्यादा होता हैं अत: ज्यादा दूध हमेशा पीने से शरीर में कैल्शियम का जमाव होकर मूत्र पथरी गॉल ब्लॅडर स्टोन, किडनी स्टोन इत्यादि विकार होने की संभावना बढ़ती है। अत: सीमित मात्रा में ही दूध का सेवन करें।
भैंस का दूध गाय के दूध से बेहतर
कुछ लोगों में यह धारणा हैं कि भैंस का दूध गाय के दूध से बेहतर होता हैं। अब अगर भैंस के दूध का रसायनिक संघठन देखें तो इसमें गाय के दूध के मुकाबले में प्रोटीन तथा वसा और कुल ठोस पदार्थ ज्यादा होते हैं अत: वह गाढ़ा होता हैं। उससे मावा ज्यादा प्राप्त होता है। उसे ग्राहकों द्वारा ज्यादा पंसद किया जाता है और भाव भी ज्यादा मिलता है।
उपरोक्त लिखित भ्रांतियों के अलावा एक सवाल कई लोगों के जेहन में आता हैं कि ग्वाले द्वारा बेचे जाने वाला खुला दूध अच्छा या संघटित डेयरी द्वारा बेचा जानेवाला बोतल या पॉलीथिन थैलियों में भरा दूध अच्छा हैं। इसका जवाब जरा लंबा हैं। अगर दोनों दूध का रसायनिक संघठन देखा जाये तो निम्रलिखित चित्र हो सकता है।

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