ओलावृष्टि – नुकसान की भरपाई कौन करे ?

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मध्यप्रदेश में एक बार फिर मौसम की मार से किसानों की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, प्रदेश के 13 जिलों के 621 गांवों में ओलावृष्टि से किसानों की फसलों को हानि पहुंची है। भोपाल संभाग के जिलों भोपाल, विदिशा तथा सीहोर जिलों में यह हानि अधिक हुई है। इन जिलों के अतिरिक्त सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, देवास, होशंगाबाद जिलों में भी ओलावृष्टि से भी नुकसान पहुंचा है। कुल मिलाकर 27,000 हेक्टर खेती क्षेत्र में ओलावृष्टि का प्रभाव पड़ा है। अचानक बदलते मौसम की पूर्व में कोई सटीक भविष्यवाणी नहीं की गयी थी। फसलों में नुकसान की खबर आते ही किसानों को नुकसान की भरपाई के आश्वासन भी राज नेताओं की ओर से आने लगे। उच्च-स्तरीय बैठक कर तत्काल फसल नुकसान सर्वेक्षण के निर्देश भी दे दिये गये। जब-जब इस प्रकार की स्थिति बनती है तब-तब यह प्रक्रिया फिर से अपनाये जाने का आश्वासन किसानों को मिल जाता है। परंतु अभी तक प्राकृतिक विपदा से जूझ रहे किसानों के लिए कोई सटीक व्यवस्था नहीं बन पायी।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनवरी 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का शुभारंभ किया था। इस योजना में 8800 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जाने की बात की थी। किसानों को रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत प्रीमियम भुगतान पर बीमा किये जाने का प्रावधान है। मध्यप्रदेश में मात्र 23 प्रतिशत किसान ही बीमा योजना का लाभ उठा रहे हैं। यदि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का प्रचार-प्रसार कर इसे प्रदेश के सभी किसानों तक पहुंचाने के प्रयास इन दो वर्षों में किये जाते तथा पूर्व में लागू फसल बीमा योजना का सही व समय पर भुगतान किया गया होता तो सरकार को वर्तमान में किसानों का नुकसान की आपूर्ति करने की बात भी नहीं करनी पड़ती न ही इसकी चिंता करनी पड़ती। सरकार का दायित्व मात्र बीमा कम्पनियों पर ही नजर रखने का रहता है कि किसानों के हितों को कोई आंच तो नहीं आ रही।
अब जब सरकार प्रभावित क्षेत्रों का हानि के लिये सर्वेक्षण करा ही रही है तो खासतौर पर गेहूं के खेतों में हुए नुकसान को आंकते समय वह उसमें दिये गये उर्वरकों की मात्रा के आंकड़े एकत्रित कर पोटाश की मात्रा व फसल नुकसान से कुछ निष्कर्ष निकाल कर किसानों को पोटाश के प्रयोग के लिये प्रेरित कर सकती है।

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