मध्यप्रदेश में क्यों मरने को मजबूर अन्नदाता ?

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प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के पदाधिकारी और अन्य नुमाइदे सरकार की शान में कशीदे पढ़ रहे हैं कि राज्य की जनता के घर का आधा खर्च शिवराज सरकार द्वारा उठाने की बात कर रहे हैं। वहीं राज्य का अन्नदाता इन दावों को झुठलाते हुये आत्महत्या कर रहा है। मुख्यमंत्री के गृह जिले विदिशा की गंजबसौदा तहसील का किसान आत्महत्या के पूर्व पत्र लिखकर उस कड़वी सच्चाई को बयां कर गया, जिसके कारण उसे मौत के लिये विवश होना पड़ा है। मृतक ने लिखे पत्र में कहा कि उसने बर्बाद हुई फसल का बीमा पाने की लिये एड़ी चोटी का जोर लगा लिया। लेकिन सीएम हेल्पलाइन सहित प्रदेश का सम्पूर्ण सरकारी तंत्र असंवेदनशील रहकर तनिक भी मददगार नहीं हो सका है। इसके पूर्व गणतंत्र दिवस के दिन बड़वानी जिले के सेंधवा के किसान ने ऐसे ही आरोप लगाकर कर्जा वसूली में बैंक की ज्यादती के कारण आत्महत्या कर ली थी।

विगत 05 वर्षों से लगातार फसलों में नुकसान के कारण राज्य का किसान विषम परिस्थितियों में जीवनयापन को मजबूर है। वही राज्य का सरकारी तंत्र से लेकर बैंकें एवं बीमा कम्पनियां उसके शोषण में जुटी हुई हैं। राज्य के किसानों को राष्ट्रीय फसल बीमा का कवच मिलने के बाद भी गत बर्ष खरीफ फसल का बीमा क्लेम प्रदेश में राष्ट्रीयकृत बैंकों की 255 शाखाओं ने किसानों को नहीं दिया है। जिसके कारण लगभग 244 करोड़ की बीमा राशि से प्रदेश का किसान, फसल नुकसान के सवा साल बाद भी वंचित बना हुआ है। बैंकों की इस लापरवाही की भरपाई प्रदेश का काश्तकार अपने जीवन को समाप्त करके कर रहा है। यह तो भला हो मीडिया का उसने बैंकों की लाफरवाही को सरकार तक पहुंचाया है। तब जाकर सरकार हरकत में आयी है। नहीं तो अभी तक प्रदेश सरकार इन बैंकों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय प्रदेश की जनता को सरकार के रहमो कर्म पर पलने का ही डंका पीटती नजर आ रही थी। इस राज्य में बैंकों की कार्यप्रणाली तो देखिए कि किसान के एक ही खसरा नबंर पर अलग-अलग बैंकें एक से अधिक क्रेडिट कार्ड के द्वारा किसान को तय मात्रा से कई गुना अधिक का कर्जदार बना रही है और अपने टारगेट पूरा कर रही हैं। प्रदेश के 60 फीसदी किसानों के पास एक ही जमीन रकबे पर अलग-अलग बैंकों से क्षमता से अधिक का ऋण है। सधारण सी बात है कि चादर की लम्बाई से अधिक पैर फैलाकर किसान सभी बैंकों का एक समय पर ऋण अदा करने की स्थिति में नहीं हुआ करता है। लेकिन वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में सभी बैंकों की एक साथ सख्त वसूली उसे मौत के मुंह में जबरिया धकेल रही है। बैंक की इस भ्रष्ट व्यवस्था का नुकसान केन्द्र और राज्य सरकार को फसल बीमा प्रीमियम पर एक ही खसरा नंबर पर एक से अधिक बार अंशदान देकर भी करना पड़ा रहा है। जिससे अनावश्यक राष्ट्रीय धन की क्षति हो रही है। प्रदेश से कर्जे में डूबे किसानों की मौत की वजह कम खेतिहर भूमि पर बहुत अधिक कर्ज का होना है। वर्तमान में प्रदेश के मात्र 52 लाख किसानों पर 82 हजार करोड़ का बैंक कर्ज मात्र किसान क्रेडिट कार्ड के द्वारा ही है। जिसमें से अदा न करने के कारण लगभग 40 फीसदी किसानों को कम से कम एक बैंक से डिफालटर घोषित किया जा चुका है। इस आंकड़े के द्वारा प्रदेश का औसतन एक किसान 1.80 लाख के कर्जे के बोझ के साथ जी रहा है।

बैंकों की मनमानी
राज्य एवं केन्द्र सरकारें जहां किसान हितैषी होने का दावा करती हंै, वहीं इन्टरनेट के इस युग में किसानों को उसके काटे गये बीमा प्रीमियम को बीमा कम्पनी में भेजने, जारी की गई पॉलिसी जानकारी नहीं दी जाती है। जबकि इस जानकारी को डिजिटल माघ्यम से प्रत्येक हितग्राही तक मोबाइल संदेश द्वारा पहुंचाने के साथ उसे वेबसाइट पर डाला जाना आवश्यक किया जाना चहिये। ताकि किसानों को समय-समय पर उसके फसल बीमा की सटीक जानकारी प्राप्त होती रहे। राष्ट्रीयकृत बैंकें अपने बीमा प्रोडक्ट की ऊंची प्रीमियम को जबरदस्ती किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ऋणी किसान को बेच रही है। वहीं कुछ बैंकों ने मौसम एवं मंडी भावों की जानकारी देने किसानों पर बेहद महंगा सालाना सरचार्ज लगा रही है। जहां बैंकों को ऋण देकर किसानों का मददगार होना चाहिये वहां बैंकें जबरदस्ती अपने उत्पाद थोपकर बेवश किसान में अपना व्यापार एवं कमाई को तलाशने में जुटी हैै। किसान क्रेडिट कार्ड पर कई मनमाफिक सरचार्ज लगाकर बैंकें किसानों की खाल नोच रही है। दूसरी तरफ सरकार पूर्णत: बेखबर होकर तमाशबीन की भूमिका में है। ऐसे में बेबसी एवं अवसाद से डूबे प्रदेश के किसान को कैसे आत्महत्या से रोका जा सकता है?

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