दलहनी फसलों मेें सिंचाई

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चना
प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि बुआई के 45 दिन (फूल आने के पहले) या 75 दिन के बाद एक सिंचाई करने से चने की उपज 30 से 35 प्रतिशत अधिक होती है। अगर रबी मौसम में सर्दियों में अच्छी वर्षा हो जाए तो शुरू की बढ़वार की अवस्था में सूखा नहीं पड़ता और घेंटियां बननी शुरू होनेे तक सिंचाई की जा सकती है। जब कम वर्षा हो और सूखी सर्दी पड़े तो चने की फसल में बुआई के 45-75 दिन बाद (फूल आने की अवस्था में) सिंचाई करना चाहिए। चने पर सिंचाई का भी बहुत लाभदायक प्रभाव पाया गया है। लकिन सिंचाई अधिक संख्या में करना या छोटी अवस्था में करना हानिप्रद सिद्ध हुआ है। इसका कारण यह है कि चने की जड़ों को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन नहीं मिल पाती और राइजोबियम जीवाणु भली प्रकार काम नहीं करते। इससे पौधे उकठा रोग से ग्रसित हो जाते हैं,जो अंत में सूख जाते हैं। सिंचाई वाले क्षेत्रों में बोई गई चने की फसल में पहली सिंचाई शाखाएँ निकलने पर (बुआई के 30 दिन बाद), दूसरी सिंचाई बुआई के 55-60 दिन बाद फल आते समय करना लाभदायक है। तीसरी सिंचाई फली (घेंटी) बनते समय बुआई के 80-90 दिन बाद करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में बुआई से पहले पलेवा करना भी लाभदायक है। शीतकालीन वर्षा अगर समय पर हो जाये तो सिंचाइयों की आवश्यकता नहीं होती। खेत मेें सिंचाई या वर्षा का जल अधिक समय तक नहीं रूकना चाहिए। इससे चने की जडें़ गल जाती हैं। यदि मौसम बहुत ठंडा रहे और पाला पडऩे का भय हो तो उस दिन संध्या समय चने की सिंचाई अवश्य कर देना चाहिये। नदियों या तालाबों की कछारी भूमि में पर्याप्त नमी रहती है, इसलिए कोई सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

मटर
साधारणतया मटर को 20-25 हेक्टेयर से.मी. पानी की आवश्यकता होती है। इस फसल पर सिंचाई का लाभदायक प्रभाव पड़ता है। परीक्षणों में मटर की फसल की 3 सिंचाइयां। (फूल आने के पहले, फूल निकलते समय और दाना बनते समय) करने से अधिकतम उपज प्राप्त हुई। किन्तु आर्थिक दृष्टि से दो सिंचाइयाँ (फूल निकलने के पहले और फूल निकलते समय) पर्याप्त पायी गयी। सिंचाई हल्की होना चाहिये क्योंकि अधिक पानी होने पर पौधे मरना आरंभ कर देते हैं। जब अधिक ठंड पड़ रही हो और पाला पडऩे की आशंका हो तो उस दिन संध्या समय एक सिंचाई अवश्य करना चाहिये। हरी फलियों की फसल में अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। यदि बुआई के समय भूमि में नमी की मात्रा कम हो तो पलेवा करके भूमि की तैयारी करना चाहिये। हरी फलियों के लिए दोमट भूमि जिसमें पलेवा कर मटर बोयी गयी हो,दो सिंचाइयाँ करना चाहिये। पहली बुआई के 30-35 दिन बाद और दूसरी 60 से 65 दिन बाद। दाल वाली मटर में दो सिंचाई क्रमश: फूल आने और फली बनने की अवस्था में सिंचाई करने से असिंचित फसल की तुलना में 6.43 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर अधिक उपज मिलती है, ऐसा परीक्षणों में देखा गया है।

मसूर
इस फसल में सूखा सहन करने की काफी क्षमता है, फिर भी उचित समय पर सिंचाई करने  पर असिंचित फसल की अपेक्षा सिंचित फसल की उपज में 2 से 2.5 गुना तक वद्धि हो जाती है। पहली सिंचाई शाखायें बनने पर (बुआई के 13 सप्ताह बाद) करें। खरीफ की फसल काटने के बाद यदि मिट्टी में नमी न हो अथवा कम हो, तो पलेवा करना जरूरी होता है।

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