टिकाऊ उर्वरता के लिये हरी खाद

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बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये प्रति इकाई उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास में अंधाधुंध सिंचाई, असंतुलित उर्वरक उपयोग कृषि में होने के कारण भूमि के स्वास्थ्य पर विपरीत असर देखे जाने लगे जो वर्तमान में एक चुनौती बनकर उभरे हैं। कृषि में मशीनीकरण के चलते पशुपालन को भी पीछे हटना पड़ा। परिणामस्वरूप गोबर खाद का अभाव होने लगा और खेती केवल रसायनिक उर्वरकों के भरोसे टिक गई। हमें अनाज तो मिला परंतु चुनौती भी साथ में मिल गई गोबर खाद, हरी खाद, कम्पोस्ट जैविक खादों में प्रमुख है। परंतु पिछले दशकों में जैविक खादों की उपलब्धता तो पशुपालन के सीमांकन से घट गई साथ-साथ हरी खाद के उपयोग पर भी अल्प विराम सा लग गया। ग्रीष्मकाल में यदि खेतों का निरीक्षण किया जाये तो आंशिक क्षेत्रों में दलहनी फसल मूंग, उड़द के अलावा हरी खाद से लगे खेत शायद ही मिल सकें जबकि यह सभी को मालूम है कि दो फसली/तीन फसली फसल चक्र के चलते भूमि पर पोषक तत्वों के अवशोषण का दबाव दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। यदि समय रहते हरी खाद के महत्व को जानकर उसका विस्तार तत्परता से नहीं किया गया तो भूमि की दशा इस तरह बिगडऩे लगेगी की फिर सम्भालना हाथों के बाहर हो जायेगा। क्योंकि हरी खाद जैविक माध्यम से पोषक तत्वों की आपूर्ति द्वारा मृदा की उर्वराशक्ति बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। हरी वनस्पति सामग्री उसी खेत में उगाकर या बाहर से लाकर खेतों में मिलाने से भूमि की दशा में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे गये हैं। हरी खाद में दलहनों का उपयोग किया जाता है। क्योंकि इन फसलों में वायु मंडल से नत्रजन को समेटने की शक्ति रहती है। उनकी गांठों में सहजीवी जीवाणु रहते हंै जो नाईट्रोजन समेटने कीक्षमता रखते हैं। दलहनी फसलें भूमि में जीवांश पदार्थ एकत्रित करने के अलावा सूक्ष्म तत्व जैसे जिंक, आयरन, मैगनीज, कापर आदि का भी संग्रहण करते हैं। जिससे भूमि में पोषक तत्वों का भंडार भरा रहता है या यूं कहिये कि भूमि से फसलों द्वारा अवशोषित पोषक तत्वों की पूर्ति सरलता से की जा सकती है यदि भूमि में हरी खाद का उपयोग निरंतर किया जाता रहे तो ऐसा करने से आम के आम गुठलियों के दाम जैसी बात चरितार्थ होती है एक भूमि में पोषक तत्वों का संतुलन और दूसरा भरपूर उत्पादन। आमतौर पर हरी खाद के लिये कोई भी दलहनी फसल लगाई जा सकती है। परंतु विशेषकर ढेन्चा, सनई, मूंग, लोबिया, ग्वार, बरसीम अधिक उपयोगी होती है। बुआई के 40-50 दिनों बाद जब फसल बढ़वार पर होती है पर जुताई करके पाटा करने से पूरा हरा पदार्थ खेत में समा जाता है और बरसात में सड़-गल कर आने वाली फसल के लिये उपयोगी जीवांश की भरपूर मात्रा उपलब्ध करा देता है। इसके उपयोग के बाद रसायनिक उर्वरक (नत्रजन) के उपयोग में कटौती की जाकर लाभकारी खेती के लिये मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। आज की बढ़ती महंगाई और घटती जोत में टिकाऊ उत्पादन के लिये हरी खाद का विस्तार अनिवार्य होना चाहिये।

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