गेंदे में लगने वाले कीट-रोग

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मुख्य कीट एवं रोकथाम:-
रेड स्पाइडर माईट (लाल माईट): माईट आठ पैर वाला जीव है जो कीटों से भिन्न होता है। इसके शिशु एवं वयस्क कोमल पत्तियों तथा नरम वृद्धि वाले भागों से रस चूस कर पौधे को नुकसान पहुंचाते हैं। समय पर नियंत्रण नहीं करने पर आर्थिक स्तर पर हानि होते इसके नियंत्रण के लिये 0.2 प्रतिशत मेलाथियान या 0.2 प्रतिशत मेटासिस्टॉक्स का छिड़काव करें। इसके अलावा डाईकोफॉल 17.5 ईसी 10 मिली अथवा मिथाइल डिमेटॉन 25 ईसी. 10 मिली प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर तने तथा पत्तियों पर छिड़क कर इसको समाप्त किया जा सकता है।
चेपा/माहू- ये कीड़े हरे रंग के होते हैं तथा पत्तों की निचली सतह से रस चूसकर काफी मात्रा में हानि पहुंचाते है। ये कीड़े विषाणु रोग भी फैलाते है। इसकी रोकथाम के लिये 300 मिली. मेटासिस्टॉक्स 25 ईसी. अथवा डाईमिथिएट 30 ईसी को 200 से 300 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर अगला छिड़काव करें।
प्रमुख व्याधियां एवं रोकथाम:-
आद्र्रगलन रोग- यह बीमारी नर्सरी में पौध तैयार करते समय आती है। इस बीमारी के प्रकोप से रोगग्रस्त पौधे का तना गलने लगता है और शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। रोगग्रसित पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये। इस रोग की रोकथाम करने के लिये 0.2 प्रतिशत कैप्टान अथवा बाविस्टीन के घोल से ड्रेंचिंग करें।
पाउडरी मिलड्यू रोग:- इस रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों के ऊपरी एवं निचले भागों में तथा तने पर सफेद पाउडर जमा हो जाता है। ग्रसित पौधों पर चकत्ते दिखाई देने लगते है जिसके फलस्वरूप पौधे की वृद्धि रुक जाती है और पौधा नष्ट होने लगता है। रोगग्रसित पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये। इस रोग की रोकथाम के लिये घुलनशील सल्फर (सल्फेक्स) एक लीटर अथवा कैराथेन 40 ई.सी. 150 मि.ली. प्रति हैक्टेयर के हिसाब से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर ग्रसित पौधों पर छिड़काव करें।

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