कृषि विकास के दावे कितने सच?

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एक ओर सरकार लगातार कृषि उपज में उत्पादन वृद्धि को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही हैं वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री आमसभाओं में कहते फिर रहे हैं कि मध्यप्रदेश में फसल उत्पादन में नुकसान के कारण अब तक की सर्वाधिक फसल बीमा क्षतिपूर्ति की राशि 4416 करोड़ रु. किसानों को केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही है, आखिर सच क्या है? बढ़ता कृषि उत्पादन या बढ़ती कृषि बीमा क्षतिपूर्ति की राशि? यह कैसा कृषि विकास है?
म.प्र. सरकार निरंतर कृषि को लाभ का धंधा बनाने के दावे करती है वहीं केंद्र शासन द्वारा किसानों को दी जा रही कृषि सहायता राशि भी किसानों तक ठीक से नहीं पहुंचा पा रही। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत केंद्र शासन द्वारा दी गई राशि विगत तीन वर्षों से पूरी तौर पर किसानों तक पहुंच ही नहीं रही। बीज वितरण कृषि मशीनरी, पंपसेट, कीट प्रबंधन, फसल पद्धति  आधारित प्रदर्शन/प्रशिक्षण आदि के लिए केंद्र शासन ने वर्ष 2013 से 2015 तक मध्यप्रदेश को 689 करोड़ रु. इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये दिये जिनमें से सरकार 635 करोड़ ही खर्च कर पाई, 53 करोड़ 66 लाख रु. बिना खर्च के ही बचे हुए हैं।
प्रदेश सरकार ने किसानों को खेती के लिये किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से 0 प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण देने का काम किया है लेकिन लोक लुभावन इस योजना की यह सच्चाई नहीं बताती कि क्रेडिट कार्ड की पूरी लिमिट (ऋण) पर नहीं केवल जो खाद-बीज सहकारी समिति से खरीदोगे उतनी राशि पर ही 0 प्रतिशत ब्याज देय है बाकी नकद आहरण पर तो पूरा ब्याज देना होगा। इस संदर्भ में यह जानना भी दिलचस्प है कि इन सहकारी समितियों में मिलने वाला खाद-बीज प्रचलित बाजार मूल्य से महंगा व अमानक स्तर का होता है। सरकारी अधिकारी निजी क्षेत्र के कृषि आदान विक्रेताओं को तो खाद-बीज के अमानक विक्रय के लिये दोषी ठहराते हैं परंतु कभी भी सहकारी समिति के माध्यम से बिकने वाले घटिया खाद-बीज के व्यापक स्तर पर नमूने लेकर जाँच नहीं कराते। यह भी कड़वी सच्चाई है कि कृषि विकास के दावों के बीच प्रदेश के इक्यावन लाख छियत्तर हजार छ: सौ अठहत्तर किसान क्रेडिट कार्ड धारी किसानों पर सतहत्तर हजार नौ सौ छियत्तर करोड़ रु. बकाया है और लगभग इक्यावन लाख किसान कर्जदार बनकर डिफाल्टर की श्रेणी में आ रहे हैं। प्रदेश की 38 में से 27 जिला सहकारी बैंक बढ़ते घाटे के कारण बंद होने की कगार पर हैं। यह कैसा कृषि विकास है?
प्रदेश में अब हरित क्रांति निगम खोलने की शासकीय योजना है। यह निगम किसानों को स्प्रिंकलर व ड्रिप सिंचाई सिस्टम उपलब्ध करायेगा। यह कार्य अभी तक मार्कफेड और एम.पी. एग्रो इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड कर रहा था, इस  कार्य के लिये नये निगम को बनाने का उद्देश्य मात्र एक और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का पुनर्वास कराना है और इसके स्थापन के लिए ही म.प्र. शासन ने इस कार्य हेतु अपनी ओर से दी जा रही सहायता राशि घटा दी है।
हर वर्ष शासन द्वारा जोर-शोर से वृक्षारोपण अभियान वृहद रूप से चलाया जाता है इसके बावजूद वन मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय संसद में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर म.प्र. में 60 वर्ग किलोमीटर वनक्षेत्र कम होना बतलाया है। इसी प्रकार पिछली पशुगणना के आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि प्रदेश में 10.33 प्रतिशत गौवंशीय पशुधन कम हो गया है। प्रदेश में पिछले तेरह साल में 65 कत्लखाने नये खुल गये हैं, इस दौरान पशु मांस का उत्पादन चार गुना हो गया है। जबकि दूध उत्पादन दो गुना ही हुआ है। प्रदेश में माँस उत्पादन 14.8 हजार टन सालाना से बढ़कर 58.39 हजार टन पहुंच गया है। और पशुपालन विभाग की कार्ययोजना वर्ष 2025 तक माँस उत्पादन लक्ष्य 153 लाख टन तक पहुंचाने की है। इसका तात्पर्य वर्तमान से तीन गुना वृद्धि।
एक ओर हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री कृषि विकास को लेकर चिंतित व संवेदनशील हैं वहीं दूसरी ओर कर्ज के बोझ तले किसान आत्महत्यायें कर रहा है, इसका कारण प्रमुखत: कृषि विकास के झूठे दावे हैं। प्रदेश की अफसरशाही वातानुकूलित कक्षों में बैठकर ई गवर्नेन्स के जरिये आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है और इन रिपोर्टों के आधार पर पुरस्कार पर पुरस्कार बटोर रही है वहीं किसान त्रस्त हैं। ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के पास किसानों को कृषि के नये ज्ञान को बताने के लिये कोई जानकारी भी विभाग द्वारा नहीं दी जाती और न ही ये काम करने के लिये तैयार हैं। प्रदेश के जिलास्तरीय अधिकारी घटिया कृषि आदानों की पूर्ति के माध्यम से कमीशन खोरी में जुटे हैं और संभागीय स्तर के अधिकारी केवल सहकारी समितियों तक खाद-बीज पहुंचाने की व्यवस्था के पर्यवेक्षण में जुटे हैं। प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालय मुनाफाखोरी के फेर में अपने कृषि प्रक्षेत्रों पर उत्पादित बीज ब्रीडर सीड के नाम पर बीज उत्पादक संस्थाओं को बेच रहे हैं, सीधे तौर पर किसान को नये बीज दस-पांच किलो भी उपलब्ध नहीं कराते। एम.पी. एग्रो, मार्कफेड जैसी संस्थायें  भी किसानों को सस्ते कृषि आदान उपलब्ध कराने की बजाय घटिया और महंगे आदान बेचकर चांदी काट रहे हैं।
संवेदनशील मुख्यमंत्री अफसरशाही को ग्रामीण क्षेत्रों में भेजकर किसानों के हाल-चाल जानने व मैदानी कठिनाईयों को दूर करने के निर्देश देते हैं और नौकरशाही मुख्यमंत्री के आदमकद तस्वीरें लगाकर कृषि ज्ञान बांटने की बजाए नौकरी में तरक्की के सपने बुनती हैं।
इस धमाचौकड़ी से निजात दिलाने के लिये न तो कोई प्रशासनिक नियंत्रण ही बचा है, न ही जवाबदेही और न ही दंडात्मक व्यवस्था, इसके परिणाम आये दिन जनप्रतिनिधियों और अफसरशाही के मध्य विवादों से लक्षित हो    रहे हैं।
सरकार कागजों में प्रगति दिखाकर शाबासी बटोर रही है, कांग्रेसी मुख्यमंत्री  के विदाई कार्यकाल में भी यही परिदृश्य था और वर्तमान  में भी इसका दोहराव प्रतीत हो रहा है। ग्रामीण जनता हताश और निराश होकर प्रजातंत्र में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही है।

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